सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 448 के तहत अपराधों के लिए स्पेशल कोर्ट (विशेष अदालत) किसी निजी शिकायत (Private Complaint) के आधार पर संज्ञान नहीं ले सकता है। कोर्ट ने माना कि धारा 448 के तहत अपराध “धारा 447 के अंतर्गत आने वाले अपराध” की श्रेणी में आते हैं, इसलिए इस पर धारा 212(6) की वैधानिक रोक लागू होती है।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपीलकर्ताओं की याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कंपनी अधिनियम की धारा 448 और 451 के तहत चल रही कार्यवाही को रद्द कर दिया। हालांकि, पीठ ने भारतीय दंड संहिता (IPC) से जुड़े अपराधों की सुनवाई को एक सक्षम क्षेत्राधिकार वाली अदालत में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य सवाल यह था कि क्या धारा 212(6) में दी गई रोक के बावजूद, कोई स्पेशल कोर्ट किसी निजी व्यक्ति द्वारा दायर शिकायत पर धारा 448 और 451 के तहत अपराधों का संज्ञान ले सकता है। न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि धारा 448 के तहत गलत बयान देने वाला व्यक्ति “धारा 447 के तहत उत्तरदायी” (धोखाधड़ी के लिए सजा) होता है, इसलिए यह मामला धारा 212(6) के दायरे में आता है। इसका अर्थ है कि ऐसे मामलों में केवल गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) के निदेशक या केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत अधिकारी की लिखित शिकायत पर ही संज्ञान लिया जा सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद मेसर्स श्रीमुख नमिता होम्स प्राइवेट लिमिटेड नामक कंपनी के प्रबंधन को लेकर शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता (प्रतिवादी संख्या 2) और उनकी पत्नी कंपनी के प्रमोटर और बहुसंख्यक शेयरधारक थे। अपीलकर्ता, येरम विजय कुमार और राजीव कुमार अग्रवाल, को क्रमशः 2016 और 2015 में निदेशक (Director) के रूप में शामिल किया गया था।
विवाद तब गहरा गया जब कंपनी के प्रबंधन और नियंत्रण को लेकर दोनों पक्षों में ठन गई। अपीलकर्ताओं का आरोप था कि ‘आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन’ (AoA) में निदेशकों के कार्यकाल को बदलने के लिए बिना उचित नोटिस के संशोधन किए गए। इसके बाद, 30 नवंबर 2021 को अपीलकर्ताओं की पुनर्नियुक्ति के प्रस्ताव गिर गए क्योंकि शिकायतकर्ता ने उनके खिलाफ मतदान किया।
हटाए जाने के बाद, अपीलकर्ताओं ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का दरवाजा खटखटाया। इसके जवाब में, शिकायतकर्ता ने 19 मई 2022 को हैदराबाद में आर्थिक अपराधों के लिए स्पेशल कोर्ट में एक निजी शिकायत दर्ज कराई। इसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ताओं ने 1 दिसंबर 2021 को अवैध रूप से एक असाधारण आम बैठक (EOGM) बुलाई, तीसरे पक्ष को निदेशक नियुक्त किया और फर्जी प्रस्ताव व दस्तावेज (फॉर्म DIR-12) तैयार किए।
स्पेशल कोर्ट ने कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 448 और 451 तथा IPC की धारा 420, 406, 426, 468, 470, 471 और 120B के तहत अपराधों का संज्ञान लिया। अपीलकर्ताओं ने इसे रद्द कराने के लिए तेलंगाना हाईकोर्ट का रुख किया, लेकिन उनकी याचिका खारिज कर दी गई, जिसके बाद वे सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री शैलेश मढियाल ने तर्क दिया कि कंपनी अधिनियम की धारा 448 स्पष्ट रूप से कहती है कि गलत बयान देने वाला व्यक्ति “धारा 447 के तहत उत्तरदायी होगा”। उन्होंने कहा कि धारा 212(6) के दूसरे परंतु (Proviso) की रोक यहां लागू होती है, जो यह स्पष्ट करती है कि “धारा 447 के अंतर्गत आने वाले अपराध” का संज्ञान केवल SFIO निदेशक या केंद्र सरकार के अधिकृत अधिकारी की शिकायत पर ही लिया जा सकता है, न कि निजी शिकायत पर। उन्होंने यह भी कहा कि धारा 206 के तहत अनिवार्य प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और यह विवाद मूल रूप से दीवानी (Civil) प्रकृति का है।
प्रतिवादियों की ओर से: शिकायतकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जयंत मुथ राज और राज्य के वकील ने तर्क दिया कि कंपनी (संशोधन) अधिनियम, 2015 ने धारा 212(6) में विशिष्ट धाराओं के उल्लेख को हटाकर “धारा 447 के अंतर्गत आने वाले अपराध” वाक्यांश को शामिल किया था। उनका कहना था कि चूंकि शिकायत सीधे धारा 447 के तहत नहीं बल्कि धारा 448 के तहत दर्ज की गई थी, इसलिए यह रोक लागू नहीं होनी चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि आरोप गंभीर धोखाधड़ी और दस्तावेजों में हेराफेरी के हैं, जिनकी सुनवाई होनी चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादियों की दलीलों को खारिज कर दिया। पीठ ने धारा 448 की शब्दावली का विश्लेषण किया, जिसमें कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति गलत बयान देता है, तो “वह धारा 447 के तहत उत्तरदायी होगा।”
धारा 448 और 212(6) पर: कोर्ट ने कहा:
“इसलिए, कंपनी अधिनियम की धारा 448 को अलग-थलग करके नहीं पढ़ा जा सकता है और इसे कंपनी अधिनियम की धारा 447 के साथ पढ़ा जाना चाहिए। अतः धारा 448 के तहत अपराध धारा 212(6) में वर्णित ‘धारा 447 के अंतर्गत आने वाले अपराध’ की श्रेणी में आता है, क्योंकि धारा 448 के तहत अपराध धारा 447 में उल्लिखित ‘धोखाधड़ी’ की सजा से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है…”
पीठ ने तर्क दिया कि धारा 447 धोखाधड़ी के लिए एक व्यापक प्रावधान है। संज्ञान आदेश में धारा 447 को शामिल न करना वैधानिक रोक से बचने का तरीका नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि जो काम सीधे तौर पर नहीं किया जा सकता, उसे परोक्ष रूप से भी नहीं किया जा सकता… स्पेशल कोर्ट का सजा की धारा (धारा 447) को लागू किए बिना केवल धारा 448 के तहत संज्ञान लेने का निर्णय स्वीकार्य नहीं है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 212(6) में दी गई सुरक्षा तुच्छ शिकायतों को रोकने के लिए है। धोखाधड़ी के आरोपों के लिए सही रास्ता NCLT के समक्ष कंपनी अधिनियम की धारा 213 के तहत आवेदन करना है।
IPC अपराधों पर अधिकार क्षेत्र: IPC के अपराधों के संबंध में, कोर्ट ने कंपनी अधिनियम की धारा 436(2) पर विचार किया। यह धारा स्पेशल कोर्ट को अन्य अधिनियमों (जैसे IPC) के तहत अपराधों की सुनवाई की अनुमति तभी देती है “जब वह इस अधिनियम (कंपनी अधिनियम) के तहत किसी अपराध की सुनवाई कर रहा हो।”
कोर्ट ने माना कि चूंकि कंपनी अधिनियम के अपराधों (धारा 448 और 451) को रद्द किया जा रहा है, इसलिए स्पेशल कोर्ट के पास अब शेष IPC अपराधों की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि केवल लंबित दीवानी मुकदमों के कारण IPC की आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी जानी चाहिए।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार किया:
- कंपनी अधिनियम की धारा 448 और 451 की सीमा तक शिकायत मामले और संज्ञान लेने वाले आदेश को रद्द कर दिया गया।
- IPC के अपराधों (धारा 420, 406, 468 आदि) के संबंध में, कोर्ट ने निर्देश दिया कि स्पेशल कोर्ट इस मामले को 4 सप्ताह के भीतर संबंधित क्षेत्राधिकार वाली अदालत में स्थानांतरित करे।
- स्थानांतरित अदालत को निर्देश दिया गया कि वह सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना, अपने गुणों-दोषों (Merits) के आधार पर शिकायत का निर्णय करे।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला: “इसलिए, ऐसे मामले में केवल निजी शिकायत दाखिल करने पर संज्ञान नहीं लिया जा सकता है।”
केस डीटेल्स:
- केस का नाम: येरम विजय कुमार बनाम तेलंगाना राज्य और अन्य (संबंधित अपील के साथ)
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2026 (एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 11530 ऑफ 2024 से उत्पन्न)
- कोरम: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

