सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा 90 दिनों के भीतर मध्यस्थता कार्यवाही “शुरू” (Initiate) न करने के आधार पर अंतरिम निषेधाज्ञा (Interim Injunction) को हटा दिया गया था। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता कार्यवाही की “शुरुआत” (Commencement) केवल मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (“अधिनियम”) की धारा 21 द्वारा निर्धारित होती है, यानी वह तारीख जिस दिन प्रतिवादी को मध्यस्थता का अनुरोध प्राप्त होता है। कोर्ट ने कहा कि धारा 11 के तहत याचिका दायर करने की तारीख से इसका निर्धारण नहीं होता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने रीजेंटा होटल्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट ने मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए याचिका दायर करने को कार्यवाही की “शुरुआत” मानकर गलती की है।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की धारा 9(2) और मध्यस्थता (न्यायालयों के समक्ष कार्यवाही) नियम, 2001 (“2001 नियम”) के नियम 9(4) की व्याख्या पर विचार किया। मुख्य मुद्दा यह था कि क्या मध्यस्थता का नोटिस जारी करना और उसका प्राप्त होना ही अंतरिम आदेश को बनाए रखने के लिए कार्यवाही की “शुरुआत” मानने के लिए पर्याप्त है, या क्या 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर धारा 11 की याचिका दायर करना अनिवार्य है। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि धारा 21 के तहत नोटिस प्राप्त होने पर मध्यस्थता कार्यवाही शुरू हो जाती है, और यदि ऐसा नोटिस निर्धारित 90 दिनों के भीतर दिया जाता है, तो अंतरिम आदेश रद्द नहीं होता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद रीजेंटा होटल्स प्राइवेट लिमिटेड (अपीलकर्ता) और मैसर्स होटल ग्रैंड सेंटर पॉइंट (प्रतिवादी संख्या 1), जो एक साझेदारी फर्म है, के बीच था। पार्टियों ने 23 मार्च, 2019 को एक फ्रैंचाइज़ समझौता किया था, जिसके तहत अपीलकर्ता को श्रीनगर में प्रतिवादी के होटल के व्यवसाय को सुविधाजनक बनाना था।
विवाद तब उत्पन्न हुआ जब प्रतिवादी संख्या 2 (फर्म में एक भागीदार) ने कथित तौर पर होटल के संचालन में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। नतीजतन, अपीलकर्ता ने राहत की मांग करते हुए ट्रायल कोर्ट (IX अतिरिक्त सिटी सिविल और सत्र न्यायाधीश, बेंगलुरु) के समक्ष अधिनियम की धारा 9 के तहत एक आवेदन दायर किया।
- 17 फरवरी, 2024: ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादी संख्या 2 को होटल के कामकाज में हस्तक्षेप करने से रोकने के लिए एक तदर्थ अंतरिम निषेधाज्ञा (Ad-interim injunction) दी।
- 11 अप्रैल, 2024: अपीलकर्ता ने फ्रैंचाइज़ समझौते के क्लॉज 19.1 का हवाला देते हुए मध्यस्थता नोटिस जारी किया।
- 23 अप्रैल, 2024: प्रतिवादी संख्या 2 ने जवाब दिया, मध्यस्थ की नियुक्ति से इनकार किया और समझौते को मानने से मना कर दिया।
- 28 जून, 2024: अपीलकर्ता ने मध्यस्थ की नियुक्ति के लिए हाईकोर्ट के समक्ष अधिनियम की धारा 11(6) के तहत याचिका दायर की।
- 1 अक्टूबर, 2024: ट्रायल कोर्ट ने धारा 9 के आवेदन को खारिज कर दिया और अंतरिम आदेश को यह कहते हुए हटा दिया कि अपीलकर्ता ने निर्धारित अवधि के भीतर मध्यस्थता कार्यवाही शुरू नहीं की थी।
अपीलकर्ता ने इस आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। 14 नवंबर, 2024 को हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी, यह मानते हुए कि अधिनियम की धारा 9(2) और 2001 के नियम 9(4) के तहत, मध्यस्थता कार्यवाही 90 दिनों के भीतर “शुरू” (Initiated) की जानी चाहिए थी। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि चूंकि धारा 11 की याचिका 28 जून, 2024 को दायर की गई थी—जो 17 मई, 2024 को समाप्त होने वाली 90 दिनों की अवधि के बाद थी—इसलिए अंतरिम आदेश स्वचालित रूप से रद्द हो गया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि मध्यस्थता कार्यवाही अधिनियम की धारा 21 के तहत नोटिस की प्राप्ति की तारीख से शुरू होती है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सुंदरम फाइनेंस लिमिटेड बनाम एनईपीसी इंडिया लिमिटेड और आरिफ़ अज़ीम कंपनी लिमिटेड बनाम एप्टेक लिमिटेड जैसे फैसलों का हवाला दिया। वकील ने दलील दी कि धारा 11 की याचिका केवल एक अगला कदम है और इसके दायर करने की तारीख मध्यस्थता की “शुरुआत” तय नहीं करती।
प्रतिवादी संख्या 2 ने तर्क दिया कि धारा 21 मुख्य रूप से धारा 43(2) के तहत परिसीमा (Limitation) के उद्देश्य के लिए एक प्रावधान है। यह प्रस्तुत किया गया कि धारा 21 में “शुरुआत” का मतलब धारा 9(2) के उद्देश्यों के लिए नहीं है। प्रतिवादी ने आगे तर्क दिया कि चूंकि मध्यस्थ की नियुक्ति पर सहमति नहीं बनी थी, इसलिए कार्यवाही को केवल तभी “शुरू” (Initiated) माना जा सकता था जब धारा 11 की याचिका दायर की गई हो।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की धारा 9(2), धारा 21 और 2001 के नियमों के नियम 9(4) के बीच संबंध की जांच की।
1. धारा 21 के तहत शुरुआत (Commencement) कोर्ट ने मिल्कफूड लिमिटेड बनाम जीएमसी आइसक्रीम (प्रा) लिमिटेड और जियो मिलर एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड जैसे मामलों में स्थापित सिद्धांतों को दोहराया। पीठ ने टिप्पणी की:
“यह तय स्थिति है कि मध्यस्थता कार्यवाही की शुरुआत एक वैधानिक घटना है जिसे विशेष रूप से अधिनियम की धारा 21 के तहत परिभाषित किया गया है, जिसमें प्रतिवादी द्वारा विवाद को मध्यस्थता के लिए भेजने का अनुरोध प्राप्त करना ही मध्यस्थता कार्यवाही को गति प्रदान करता है और कोई भी न्यायिक आवेदन यानी चाहे धारा 9 या धारा 11 की याचिका, शुरुआत का गठन नहीं करती है।”
2. 2001 के नियमों के नियम 9(4) की व्याख्या हाईकोर्ट ने नियम 9(4) पर भरोसा किया था, जो कहता है कि यदि धारा 9 के आवेदन के तीन महीने के भीतर मध्यस्थता कार्यवाही “शुरू” (Initiated) नहीं की जाती है, तो कोई भी अंतरिम आदेश रद्द हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस संदर्भ में “शुरू” (Initiated) का अर्थ स्पष्ट किया:
“नियम 9 को अधिनियम की धारा 9 की सहायता और उसे प्रक्रियात्मक प्रभाव देने के लिए बनाया गया है… परिणामस्वरूप, नियम 9(4) के उद्देश्यों के लिए, ‘शुरू’ (Initiated) शब्द को अनिवार्य रूप से अधिनियम की धारा 21 के अर्थ के भीतर ‘प्रारंभ’ (Commenced) के रूप में पढ़ा जाना चाहिए।”
3. धारा 11 याचिका ‘शुरुआत’ नहीं है कोर्ट ने स्पष्ट रूप से हाईकोर्ट के उस दृष्टिकोण को खारिज कर दिया कि धारा 11 की याचिका दायर करना धारा 9(2) के उद्देश्य के लिए कार्यवाही की शुरुआत है।
“यदि धारा 11 की याचिका दायर करने की तारीख को मध्यस्थता कार्यवाही की शुरुआत की तारीख माना जाता है, जैसा कि हाईकोर्ट ने आक्षेपित निर्णय में देखा है, तो इसका परिणाम धारा 21 के तहत प्रदान की गई मध्यस्थता कार्यवाही की शुरुआत का विस्थापन होगा और यह अधिनियम के पाठ और उद्देश्य के विपरीत होगा।”
कोर्ट ने नोट किया कि अपीलकर्ता ने 11 अप्रैल, 2024 को मध्यस्थता का नोटिस दिया था और प्रतिवादी ने 23 अप्रैल, 2024 को जवाब दिया था। धारा 9(2) के तहत 90 दिन की अवधि 17 मई, 2024 को समाप्त हुई। चूंकि नोटिस इस तारीख से काफी पहले प्राप्त हो गया था, इसलिए वैधानिक समय सीमा के भीतर कार्यवाही वैध रूप से शुरू हो चुकी थी।
फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया और कर्नाटक हाईकोर्ट के 14 नवंबर, 2024 के फैसले को रद्द कर दिया।
- ट्रायल कोर्ट का 1 अक्टूबर, 2024 का आदेश, जिसने अंतरिम निषेधाज्ञा को रद्द कर दिया था, उसे भी खारिज कर दिया गया।
- 17 फरवरी, 2024 के पूर्व आदेश को बहाल कर दिया गया, जिससे अंतरिम निषेधाज्ञा फिर से लागू हो गई।
- कोर्ट ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह लंबित धारा 11 याचिका पर शीघ्र निर्णय ले।
पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस मसीह ने निष्कर्ष निकाला:
“अपीलकर्ता द्वारा शुरू की गई मध्यस्थता कार्यवाही अधिनियम की धारा 9(2) के तहत प्रदान की गई वैधानिक समय सीमा के भीतर है और 2001 के नियमों के नियम 9(4) की कठोरता अपीलकर्ता पर लागू नहीं की जा सकती।”
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: रीजेंटा होटल्स प्राइवेट लिमिटेड बनाम मैसर्स होटल ग्रैंड सेंटर पॉइंट और अन्य
- मामला संख्या: सिविल अपील संख्या 2026 (एसएलपी (सिविल) संख्या 30212/2024 से उत्पन्न)
- कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह

