सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि कानून बनाने का अधिकार संसद का विशेषाधिकार है और केंद्र सरकार द्वारा अदालत में दिए गए किसी आश्वासन से संसद बंधी नहीं रहती। यह टिप्पणी उस दौरान की गई जब अदालत में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ के समक्ष याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि धारा 152, जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है, दरअसल पुराने भारतीय दंड संहिता की धारा 124A (देशद्रोह) को नए रूप में वापस लाती है।
याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने देशद्रोह कानून पर रोक लगाते हुए केंद्र को इसकी समीक्षा करने को कहा था और सरकार ने इस संबंध में आश्वासन भी दिया था। ऐसे में नए कानून में समान प्रावधान लाना उस आश्वासन के विपरीत है।
पीठ ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि कार्यपालिका द्वारा दिया गया आश्वासन संसद की विधायी शक्ति को सीमित नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि संसद को कानून बनाने का “पूर्ण अधिकार” है।
सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 173 को भी चुनौती दी गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यह प्रावधान पुलिस को एफआईआर दर्ज करने से पहले प्रारंभिक जांच की अनुमति देता है, जो ललिता कुमारी फैसले के विपरीत है, जिसमें संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलने पर एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य बताया गया था।
इस पर पीठ ने कहा कि ललिता कुमारी निर्णय में भी कुछ परिस्थितियों में यह देखने के लिए प्रारंभिक जांच की अनुमति दी गई है कि संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि इस फैसले का कई बार गलत उपयोग हुआ है और कहा कि “कभी-कभी फैसले आइवरी टावर में बैठकर दिए जाते हैं।”
मामले की अगली सुनवाई होली की छुट्टियों के बाद निर्धारित की गई है।
धारा 152 को लेकर दायर एक अन्य जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चुका है।

