बेनामी एक्ट के तहत जारी आदेशों को IBC अथॉरिटी के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती; सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रक्रिया के दुरुपयोग’ के लिए लिक्विडेटर्स पर लगाया 20 लाख का जुर्माना

इंसॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड, 2016 (IBC) और बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम, 1988 (Benami Act) के बीच क्षेत्राधिकार की सीमाओं को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के पास बेनामी अथॉरिटीज द्वारा पारित ‘अनंतिम कुर्की’ (Provisional Attachment) आदेशों की वैधता पर फैसला करने का अधिकार नहीं है।

न्यायमूर्ति पमिदिघंतम श्री नरसिम्हा और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने लिक्विडेटर्स द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने बेनामी अधिनियम के तहत निर्धारित मंचों के बजाय NCLT का रुख करने को “प्रक्रिया का पूर्ण दुरुपयोग” (Complete abuse of the process) करार दिया। कोर्ट ने प्रत्येक अपील पर 5 लाख रुपये का अनुकरणीय जुर्माना भी लगाया।

अदालत के सामने मुख्य प्रश्न यह था कि क्या बेनामी अधिनियम के तहत पारित कुर्की आदेशों की वैधता को IBC के तहत गठित वैधानिक न्यायाधिकरणों (NCLT/NCLAT) के समक्ष चुनौती दी जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद मेसर्स पद्मदेवी शुगर्स लिमिटेड (पटेल ग्रुप) के प्रमोटरों से जुड़े एक बेनामी लेनदेन की जांच से शुरू हुआ। आरोप था कि प्रमोटरों ने अपनी 100% शेयरहोल्डिंग एक बिचौलिए के माध्यम से वी.के. शशिकला को लगभग 450 करोड़ रुपये के विमुद्रीकृत (Demonetised) नोटों के बदले स्थानांतरित कर दी थी।

नवंबर 2017 में आयकर विभाग की छापेमारी में नोटबंदी के दौरान की गई संपत्तियों की खरीद से संबंधित दस्तावेज मिले। इसके बाद, बेनामी अधिनियम के तहत अधिकारियों ने कारण बताओ नोटिस और 1 नवंबर, 2019 को कॉर्पोरेट देनदार की अचल संपत्तियों को कुर्क करने का आदेश जारी किया।

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इसी बीच, कंपनी के खिलाफ इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया (CIRP) शुरू हुई और अप्रैल 2021 में इसके परिसमापन (Liquidation) का आदेश दिया गया। लिक्विडेटर ने इस आधार पर कुर्की आदेश को NCLT में चुनौती दी कि ये संपत्तियां “लिक्विडेशन एस्टेट” का हिस्सा हैं। NCLT और NCLAT दोनों ने इस चुनौती को खारिज करते हुए कहा कि इसका समाधान केवल बेनामी अधिनियम के तहत ही संभव है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं (लिक्विडेटर्स) की ओर से: दलील दी गई कि IBC एक बाद का और अधिक व्यापक कानून है, इसलिए इसकी धारा 238 के तहत इसे बेनामी अधिनियम पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह भी तर्क दिया गया कि समानांतर कुर्की की कार्यवाही से परिसंपत्तियों का मूल्य कम होता है और धारा 14 के तहत ‘मोरेटोरियम’ (Moratorium) लागू होने के कारण ऐसी कार्यवाही पर रोक लगनी चाहिए।

प्रतिवादी (राजस्व विभाग) की ओर से: राजस्व विभाग ने तर्क दिया कि बेनामी अधिनियम बेनामी संपत्ति की पहचान और जब्ती के लिए अपने आप में एक पूर्ण कोड (Self-contained code) है। उन्होंने कहा कि IBC की धारा 36 के तहत ‘फिडुशियरी कैपेसिटी’ (बेनामी) में रखी गई संपत्ति को लिक्विडेशन एस्टेट से बाहर रखा गया है। साथ ही, कुर्की एक संप्रभु दंडात्मक कार्य (Sovereign penal act) है, न कि ऋण वसूली की कार्यवाही।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

अदालत ने दोनों कानूनों का तुलनात्मक विश्लेषण करते हुए कहा कि दोनों ही विशेष कानून हैं लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में काम करते हैं।

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1. सार्वजनिक कानून और संप्रभु कार्य: अदालत ने गौर किया कि NCLT संप्रभु कार्यों की न्यायिक समीक्षा का मंच नहीं बन सकता।

“IBC के तहत अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र का विस्तार उन क्षेत्रों तक नहीं किया जा सकता जो सार्वजनिक कानून के दायरे में आते हैं… बेनामी अधिनियम बेनामी लेनदेन की पहचान करने और उन्हें समाप्त करने के उद्देश्य से एक संप्रभु शक्ति का प्रयोग है।”

2. ऋण वसूली और दागी संपत्तियों में अंतर: कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि धारा 14 का मोरेटोरियम बेनामी कुर्की पर लागू होता है।

“मोरेटोरियम का उद्देश्य कॉर्पोरेट देनदार को कर्ज वसूली के लिए की जाने वाली ‘लेनदार की कार्रवाइयों’ से बचाना है, न कि अपराध के विरुद्ध संप्रभु कार्रवाई से ‘दागी संपत्तियों’ (Tainted assets) को ढाल प्रदान करना है।”

3. लिक्विडेशन एस्टेट का दायरा: IBC की धारा 36 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि लिक्विडेशन एस्टेट में केवल वही संपत्तियां शामिल होती हैं जिनका वास्तविक स्वामित्व कॉर्पोरेट देनदार के पास हो।

“जहाँ कॉर्पोरेट देनदार केवल नाममात्र का धारक (Ostensible holder) है, वहां संपत्ति कभी भी उसकी संपदा का हिस्सा नहीं बनती और परिसमापन में उसका प्रबंधन नहीं किया जा सकता… वहां लाभकारी स्वामित्व (Beneficial ownership) समाप्त हो जाता है।”

4. कानूनों के बीच सामंजस्य: अदालत ने जोर दिया कि IBC का उपयोग विशेष वैधानिक तंत्रों को दरकिनार करने के लिए नहीं किया जा सकता। मेसर्स एम्बेसी प्रॉपर्टी डेवलपमेंट्स बनाम कर्नाटक राज्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब भी कोई कॉर्पोरेट देनदार सार्वजनिक कानून के क्षेत्र में किसी अधिकार का प्रयोग करता है, तो वह NCLT का शॉर्टकट नहीं ले सकता।

न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और NCLAT के फैसलों की पुष्टि की। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि IBC अथॉरिटी के समक्ष कुर्की आदेशों को चुनौती देने का लिक्विडेटर्स का प्रयास ‘नेक नीयती’ (Bona fide) पर आधारित नहीं था।

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“हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि यह कदम नेक नीयती से नहीं उठाया गया था और इसका उद्देश्य वास्तव में बेनामी अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं को बाधित करना था… कानून की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है और बेनामी अधिनियम के तहत वैधानिक उपचारों की उपलब्धता के बारे में कोई संदेह नहीं था।”

अदालत ने सभी अपीलों को खारिज करते हुए 5 लाख रुपये प्रति अपील का जुर्माना लगाया, जिसे चार सप्ताह के भीतर ‘सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकॉर्ड एसोसिएशन’ (SCAORA) में जमा करने का आदेश दिया गया।

केस का शीर्षक: एस. राजेंद्रन बनाम आयकर उपायुक्त (बेनामी निषेध) एवं अन्य

केस संख्या: सिविल अपील संख्या 7140/2022 (संबद्ध अपीलों के साथ) 

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