सुप्रीम कोर्ट ने ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से जूझ रहे बच्चों के अभिभावकों और चिकित्सा जगत के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि ऑटिज्म के उपचार के लिए ‘स्टेम सेल थेरेपी’ को एक सामान्य या रूटीन चिकित्सा सेवा (Routine Clinical Service) के रूप में पेश नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने 30 जनवरी, 2026 को दिए अपने फैसले में कहा कि इस तरह के उपचार को सख्ती से केवल अनुमोदित और निगरानी वाले ‘क्लीनिकल ट्रायल’ या शोध तक ही सीमित रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि क्लीनिकल ट्रायल के बाहर ऐसी असत्यापित चिकित्सा पद्धतियों को प्रदान करना चिकित्सा पेशेवरों द्वारा देखभाल के मानक (Standard of Care) में विफलता है और यह ‘पेशेवर कदाचार’ (Professional Misconduct) की श्रेणी में आता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला यश चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट का ध्यान इस ओर खींचा था कि देश भर में कई क्लीनिक ऑटिज्म के इलाज के तौर पर स्टेम सेल थेरेपी का धड़ल्ले से प्रचार, प्रिस्क्रिप्शन और प्रशासन कर रहे हैं।
याचिका में आरोप लगाया गया कि यद्यपि ऑटिज्म के लिए इस थेरेपी का कोई वैज्ञानिक प्रमाण या इलाज साबित नहीं हुआ है और यह अभी प्रयोगात्मक (Experimental) चरण में है, फिर भी क्लीनिक इसे ‘इलाज’ बताकर विज्ञापन कर रहे हैं। ऐसा करना ‘न्यू ड्रग्स एंड क्लीनिकल ट्रायल रूल्स, 2019’ (NDCT Rules) और आईसीएमआर (ICMR) के दिशानिर्देशों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जागरूकता की कमी के कारण मरीज और उनके अभिभावक इन महंगी प्रक्रियाओं का शिकार हो रहे हैं।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि स्टेम सेल थेरेपी का व्यावसायिक उपयोग गैर-कानूनी है क्योंकि इसके लिए कोई अनुमति नहीं ली गई है। उन्होंने नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के एथिक्स बोर्ड की 6 दिसंबर, 2022 की सिफारिशों का हवाला दिया, जिसमें इस थेरेपी के प्रचार को पेशेवर कदाचार माना गया था।
दूसरी ओर, केंद्र सरकार ने कहा कि यद्यपि ‘स्टेम सेल उत्पादों’ का विनियमन होता है, लेकिन ‘थेरेपी’ या उपचार पद्धतियों को विनियमित करने के लिए ड्रग्स एक्ट में कोई सीधा प्रावधान नहीं है।
वहीं, प्रतिवादी क्लीनिकों और कुछ अभिभावकों के समूहों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि वे मरीज के शरीर से ही लिए गए सेल्स (Autologous) का उपयोग करते हैं, जो ‘दवा’ नहीं बल्कि एक प्रक्रिया है। उन्होंने अनुच्छेद 21 के तहत उपचार चुनने के अधिकार की दुहाई दी और दावा किया कि कई मरीजों में इससे सुधार देखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद एक विस्तृत निर्णय दिया, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
1. देखभाल का मानक और पेशेवर कदाचार: कोर्ट ने चिकित्सा लापरवाही के सिद्धांतों (Bolam Test) को लागू करते हुए कहा कि एक डॉक्टर उचित देखभाल के मानक को पूरा करने में विफल रहता है यदि वह ऐसा हस्तक्षेप करता है जिसके सुरक्षा और प्रभावकारिता के विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं। कोर्ट ने आईसीएमआर (ICMR) की रिपोर्ट और एनएमसी (NMC) की सिफारिशों पर भरोसा जताया, जो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी की सिफारिश नहीं की जाती है।
कोर्ट ने कहा:
“इसलिए, हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि चूंकि वर्तमान ज्ञान के अनुसार एएसडी (ASD) में स्टेम सेल का चिकित्सीय उपयोग ‘एक ठोस और प्रासंगिक चिकित्सा पद्धति’ के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं है, इसलिए जो चिकित्सा पेशेवर इसे अनुमोदित और निगरानी वाले शोध/क्लीनिकल ट्रायल के बाहर एक क्लीनिकल सर्विस के रूप में पेश करते हैं, वे अपने मरीजों के प्रति उचित देखभाल के मानक को पूरा करने में विफल रहते हैं।”
2. मरीज की स्वायत्तता बनाम झूठी उम्मीद: अभिभावकों द्वारा ‘उपचार चुनने के अधिकार’ के तर्क पर कोर्ट ने कहा कि ‘सहमति’ (Consent) का आधार ‘पर्याप्त जानकारी’ होती है। चूंकि इस थेरेपी की प्रभावकारिता पर वैज्ञानिक प्रमाणों का अभाव है, डॉक्टर मरीजों को वैध सहमति प्राप्त करने के लिए पर्याप्त जानकारी प्रदान नहीं कर सकते।
कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की:
“…मरीज की स्वायत्तता का विस्तार उस हद तक नहीं किया जा सकता कि वह ऐसी प्रक्रिया की मांग करे जो वैज्ञानिक रूप से असत्यापित और नैतिक रूप से अस्वीकार्य हो।”
3. स्टेम सेल की कानूनी स्थिति: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भले ही मरीज के अपने सेल्स (Autologous) का उपयोग किया जा रहा हो और उनमें न्यूनतम बदलाव किए गए हों, फिर भी वे ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट, 1940 की धारा 3(b)(i) के तहत ‘दवा’ (Drug) की व्यापक परिभाषा में आते हैं क्योंकि वे उपचार के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘पदार्थ’ (Substances) हैं।
4. स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) के आदेश की आलोचना: सुप्रीम कोर्ट ने स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) के 3 मार्च, 2024 के उस आदेश की आलोचना की, जिसके द्वारा ‘नेशनल एपेक्स कमेटी फॉर स्टेम सेल रिसर्च एंड थेरेपी’ (NAC-SCRT) को भंग कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि डीएचआर (DHR) यह कहकर अपनी नियामक भूमिका से पीछे नहीं हट सकता कि उसकी कोई भूमिका प्रत्याशित नहीं है। कोर्ट ने इस आदेश के उस हिस्से को कानून में अमान्य (non est) करार दिया।
अंतिम निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी का प्रशासन एक रूटीन क्लीनिकल उपचार के रूप में करना ‘पेशेवर कदाचार’ है।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- क्लीनिकल ट्रायल तक सीमित: ऑटिज्म के लिए स्टेम सेल थेरेपी को एक चिकित्सा सेवा के रूप में पेश नहीं किया जा सकता है और इसे केवल अनुमोदित और निगरानी वाले क्लीनिकल ट्रायल तक ही सीमित रखा जाना चाहिए।
- कदाचार पर कार्रवाई: इस जनादेश का उल्लंघन करने वाले चिकित्सा पेशेवर आईएमसी विनियम, 2002 और क्लीनिकल एस्टैब्लिशमेंट एक्ट, 2010 के तहत कार्रवाई के लिए उत्तरदायी होंगे।
- मरीजों के लिए संक्रमणकालीन व्यवस्था: कोर्ट ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए माना कि उपचार को अचानक बंद करने से वर्तमान मरीजों पर असर पड़ सकता है। इसलिए, कोर्ट ने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) के सचिव को एम्स (AIIMS) और एनएमसी (NMC) के अधिकारियों के साथ परामर्श करके “सर्वोत्तम संभव समाधान” प्रदान करने का निर्देश दिया, ताकि ऐसे मरीज तब तक थेरेपी प्राप्त करना जारी रख सकें जब तक कि उन्हें क्लीनिकल ट्रायल आयोजित करने वाले संस्थानों में स्थानांतरित न किया जा सके।
- नियमों का समेकन: कोर्ट ने केंद्र सरकार को स्टेम सेल आधारित क्लीनिकल ट्रायल को विनियमित करने के लिए नियमों को समेकित करने और एक समर्पित प्राधिकरण स्थापित करने का सुझाव दिया।
कोर्ट ने मामले को ‘पार्ट हर्ड’ (Part-heard) मानते हुए स्वास्थ्य मंत्रालय को वर्तमान मरीजों के लिए समाधान के संबंध में चार सप्ताह के भीतर अपनी बात रखने का निर्देश दिया है।

