पत्नी की मौत के मामले में डेंटिस्ट को सुप्रीम कोर्ट से जमानत, कहा- शुरुआती बयानों में नहीं था दहेज का जिक्र

सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पत्नी की मौत के मामले में आरोपी भोपाल के एक डेंटिस्ट को नियमित जमानत दे दी है। कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि मृतका के परिजनों के शुरुआती बयानों में पैसे या दहेज की मांग का कोई जिक्र नहीं था, ये आरोप बाद के बयानों में जोड़े गए।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसके तहत अपीलकर्ता अभिजीत पांडेय की जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। शीर्ष अदालत ने इस बात पर गौर किया कि प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) शुरू में आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment to Suicide) के आरोप में दर्ज की गई थी और मृतका, जो खुद एक एनेस्थेटिस्ट (anaesthetist) थीं, की मौत एनेस्थीसिया के इंजेक्शन से हुई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता अभिजीत पांडेय, जो भोपाल में एक क्लिनिक चलाते हैं, का विवाह डॉ. रिचा पांडेय से 4 दिसंबर, 2024 को हुआ था। दोनों का विवाह डेढ़ साल के रिश्ते के बाद हुआ था और वे भोपाल की स्काई ड्रीम कॉलोनी में रह रहे थे। 21 मार्च, 2025 को डॉ. रिचा पांडेय मृत पाई गईं।

अपीलकर्ता के अनुसार, घटना की सुबह जब मृतका ने कमरे का दरवाजा नहीं खोला, तो उन्होंने दरवाजा तोड़ा। अंदर वह अचेत अवस्था में मिलीं और उनके बाएं हाथ पर सुई के निशान थे। अस्पताल ले जाने पर उन्हें मृत घोषित कर दिया गया।

24 मार्च, 2025 को दर्ज FIR में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता का ‘माही’ नाम की महिला के साथ विवाहेतर संबंध (extra-marital relationship) था, जिसके कारण मृतका ने आत्महत्या की। पुलिस ने अपीलकर्ता को 25 मार्च, 2025 को गिरफ्तार कर लिया। हालांकि एफआईआर शुरुआत में भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 108 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत दर्ज की गई थी, लेकिन बाद में चार्जशीट में धारा 108 और 80 (दहेज मृत्यु) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3 और 4 को भी शामिल किया गया। बाद में आरोप BNS की धारा 108 और 80(2) और वैकल्पिक रूप से धारा 103 (हत्या) के तहत तय किए गए।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक के. तन्खा ने तर्क दिया कि यह मामला दुर्भाग्यपूर्ण आत्महत्या का है, क्योंकि मृतका को संदेह था कि अपीलकर्ता का अपने क्लिनिक में काम करने वाली महिला ‘माही’ के साथ संबंध है। उन्होंने कहा कि “ऐसा कोई भी साक्ष्य नहीं है जो आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला बनता हो” या जिससे हत्या या दहेज मृत्यु साबित हो सके।

श्री तन्खा ने जोर देकर कहा कि “एफआईआर और गवाहों के शुरुआती केस डायरी बयानों में पैसे या दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं था। यह आरोप गवाहों के बाद के बयानों में सुधार (improvement) के तौर पर आया है।” उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अपीलकर्ता कोई आदतन अपराधी नहीं है और मार्च 2025 से हिरासत में है।

इसके विपरीत, मध्य प्रदेश राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता श्रीधर पोटाजू और शिकायतकर्ता के वकील ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि यह “एट्राक्यूरियम बेसिलेट इंजेक्शन” (Atracurium Besylate Injection) का उपयोग करके की गई हत्या का मामला है। उन्होंने पोस्टमार्टम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि मृतका के शरीर पर पांच चोटें मिली हैं, जो शारीरिक हमले का संकेत देती हैं। उन्होंने मृतका के परिवार के सदस्यों के बयानों पर भरोसा जताया, जिसमें आरोप लगाया गया था कि अपीलकर्ता पैसे की मांग करता था।

राज्य ने मृतका के फोन से बरामद सुसाइड नोट और ऑडियो रिकॉर्डिंग का भी हवाला दिया, जिसमें उन्हें यह कहते हुए सुना जा सकता था, “तुम केवल माही को महत्व देते हो, तुम उसके लिए सब कुछ करते हो, तुम मेरे लिए कुछ नहीं करते। कल सुबह तुम मेरा मरा हुआ चेहरा देखोगे।”

कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा साक्ष्यों और आरोपों के क्रम की बारीकी से जांच की। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दी गई चोटों के संबंध में कोर्ट ने कहा:

  • चोट संख्या (i), (ii), और (iii) संभवतः सुई या सिरिंज से हुई थीं और ये खुद से भी लगाई जा सकती हैं (self-inflicted)।
  • चोट संख्या (iv) (जांघ पर चोट) मौत से चार से पांच दिन पुरानी बताई गई थी।
  • चोट संख्या (v) (सिर के पीछे चोट) के समय के बारे में कोई स्पष्टता नहीं थी।
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बेंच ने कहा, “महत्वपूर्ण बात यह है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि चोट संख्या (iv) मौत से चार से पांच दिन पहले की है। चोट संख्या (i), (ii) और (iii) संभवतः सिरिंज/इंजेक्शन की सुई से हुई थीं।”

सबसे अहम बात कोर्ट ने पति के खिलाफ आरोपों में आए बदलाव को लेकर कही। बेंच ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा: “राज्य द्वारा दायर जवाबी हलफनामे में यह कहा गया है कि मृतका के पिता विनोद चंद्र पांडेय के पहले केस डायरी बयान में दहेज की मांग का कोई आरोप नहीं है। यही स्थिति मृतका की मां रेणु पांडेय और भाई हिमांशु पांडेय के बयानों की भी है। इस प्रकार, पैसे/दहेज की मांग का आरोप बाद के केस डायरी बयानों में आया।”

कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि मृतका खुद एक एनेस्थेटिस्ट थीं और जिस पदार्थ से मौत हुई वह एनेस्थीसिया की दवा थी।

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फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने इस तथ्य पर विचार किया कि एफआईआर शुरू में आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए थी, मेडिकल साक्ष्य क्या कहते हैं, और दहेज के आरोपों को लाने में देरी हुई है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा: “यह देखते हुए कि एफआईआर आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के लिए दर्ज की गई थी और मृतका को ऐसी कोई चोट नहीं लगी थी जिसे उनकी मौत का कारण कहा जा सके और प्रथम दृष्टया यह पाया गया है कि उनकी मौत एट्राक्यूरियम बेसिलेट इंजेक्शन से हुई जो एनेस्थीसिया के रूप में दी जाने वाली दवा है और मृतका स्वयं एनेस्थेटिस्ट थीं और यह कि पैसे/दहेज की मांग का आरोप पहली बार में नहीं लगाया गया था बल्कि बाद के बयानों में लगाया गया… हम मौजूदा अपील को स्वीकार करने और अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा करने के इच्छुक हैं।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत अर्जी पर विचार करने के उद्देश्य से हैं और मुख्य मुकदमे (Trial) पर इनका कोई असर नहीं पड़ेगा।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: अभिजीत पांडेय बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 446 ऑफ 2026 (अराइजिंग आउट ऑफ़ एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 16817 ऑफ 2025)
  • साइटेशन: 2026 INSC 83
  • कोरम: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया

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