समामेलन (Amalgamation) में मिले नए शेयर यदि ‘स्टॉक-इन-ट्रेड’ हैं तो वे ‘व्यावसायिक आय’ के रूप में कर योग्य होंगे: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि किसी समामेलन (Amalgamation) योजना के तहत समामेलित होने वाली कंपनी (Amalgamating Company) के शेयर ‘स्टॉक-इन-ट्रेड’ (व्यापारिक स्टॉक) के रूप में रखे गए थे, तो उनके बदले में नई कंपनी के शेयर प्राप्त होने पर होने वाले लाभ को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 28 के तहत ‘व्यावसायिक आय’ माना जाएगा। हालांकि, कोर्ट ने यह शर्त भी जोड़ी है कि नए शेयर वसूली योग्य (Realisable) होने चाहिए और उनका एक निश्चित मूल्य होना चाहिए।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के दृष्टिकोण को सही ठहराते हुए कहा कि केवल समामेलन योजना को मंजूरी मिलना ही कर दायित्व (Tax Liability) उत्पन्न नहीं करता है, लेकिन जब वास्तव में ऐसे शेयरों का आवंटन होता है जो व्यावसायिक रूप से वसूली योग्य हैं, तो यह लाभ की “व्यावसायिक वसूली” (Commercial Realisation) मानी जाएगी।

हालांकि, कोर्ट ने मामले को तथ्यात्मक निर्धारण के लिए आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) के पास वापस भेज दिया है, ताकि यह जांचा जा सके कि शेयर वास्तव में स्टॉक-इन-ट्रेड थे या नहीं और क्या वे तत्काल वसूली योग्य थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील जिंदल ग्रुप की निवेश कंपनियों, जिसमें मेसर्स जिंदल इक्विपमेंट लीजिंग कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड शामिल है, द्वारा दायर की गई थी। अपीलकर्ताओं के पास प्रमोटर होल्डिंग के हिस्से के रूप में जिंदल फेरो अलॉयज लिमिटेड (JFAL) के शेयर थे। 1996 में आंध्र प्रदेश और पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट द्वारा अनुमोदित एक समामेलन योजना के तहत, JFAL का विलय जिंदल स्ट्रिप्स लिमिटेड (JSL) में हो गया। इस योजना के तहत, शेयरधारकों को उनके पास मौजूद JFAL के प्रत्येक 100 शेयरों के बदले JSL के 45 शेयर आवंटित किए गए।

आकलन वर्ष 1997-98 के लिए, अपीलकर्ताओं ने इन शेयरों को ‘पूंजीगत संपत्ति’ (Capital Assets) मानते हुए आयकर अधिनियम की धारा 47(vii) के तहत छूट का दावा किया। हालांकि, असेसिंग ऑफिसर ने इन शेयरों को ‘स्टॉक-इन-ट्रेड’ माना और छूट देने से इनकार कर दिया। अधिकारी ने JSL शेयरों के मूल्य और JFAL शेयरों के बुक वैल्यू के बीच के अंतर को व्यावसायिक आय के रूप में कर योग्य माना।

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ट्रिब्यूनल ने निर्धारितियों (Assessees) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा था कि जब तक शेयरों को प्रतिफल के लिए बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जाता, तब तक कोई लाभ अर्जित नहीं होता।

राजस्व विभाग (Revenue) की अपील पर, दिल्ली हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि यदि शेयर स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में रखे गए थे, तो समामेलित कंपनी में शेयर प्राप्त करना व्यापारिक संपत्ति की वसूली के समान है, जिससे उत्पन्न अंतर धारा 28 के तहत कर योग्य होगा।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि नई कंपनी में शेयर प्राप्त करना “बिक्री” या “विनिमय” (Exchange) नहीं है और जब तक शेयर वास्तव में नहीं बेचे जाते, तब तक कोई कर योग्य व्यावसायिक आय उत्पन्न नहीं होती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सीआईटी, बॉम्बे बनाम रसिकलाल मानेकलाल (HUF) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि समामेलन केवल शेयरों का प्रतिस्थापन है, हस्तांतरण नहीं।

दूसरी ओर, राजस्व विभाग ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 28 का दायरा विस्तृत है और इसमें नकद या वस्तु के रूप में प्राप्त लाभ शामिल हैं। उनका कहना था कि एक बार जब स्टॉक-इन-ट्रेड (पुरानी कंपनी के शेयर) का अस्तित्व समाप्त हो गया और उसके बदले निश्चित मूल्य वाले नई कंपनी के शेयर मिल गए, तो यह एक “व्यावसायिक वसूली” है।

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कोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस आर. महादेवन ने पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए धारा 28 के दायरे का विश्लेषण किया। कोर्ट ने कहा कि यह धारा धारा 45 (पूंजीगत लाभ) की तरह सख्त कानूनी अर्थों में “हस्तांतरण” या “बिक्री” पर निर्भर नहीं है। जैसे ही व्यवसाय या पेशे से कोई आय उत्पन्न होती है, यह प्रावधान लागू हो जाता है।

व्यावसायिक वसूली (Commercial Realisability)

पीठ ने करदेयता के लिए एक परीक्षण स्थापित किया और कहा कि शेयरों के प्रतिस्थापन के परिणामस्वरूप “व्यावसायिक वसूली” होनी चाहिए। कोर्ट ने कहा:

“कोर्ट के लिए जांच का विषय यह है कि क्या समामेलन के परिणामस्वरूप निर्धारिती ने वास्तव में व्यावसायिक अर्थों में लाभ प्राप्त किया है। यह इस पर निर्भर करेगा कि: (ए) क्या निर्धारिती की किताबों में पुराना स्टॉक-इन-ट्रेड अस्तित्व में नहीं रहा; (बी) क्या नई कंपनी में प्राप्त शेयरों का एक निश्चित और सुनिश्चित मूल्य है; और (सी) क्या निर्धारिती आवंटन के तुरंत बाद ऐसे शेयरों का निपटान करने और धन प्राप्त करने की स्थिति में है।”

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि प्रतिस्थापित शेयर वैधानिक लॉक-इन अवधि के अधीन हैं या किसी मान्यता प्राप्त स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध नहीं हैं (जिसे बेचना मुश्किल हो), तो आवंटन को व्यावसायिक वसूली नहीं माना जा सकता।

पूंजीगत संपत्ति और स्टॉक-इन-ट्रेड के बीच अंतर

निर्णय में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि जहां धारा 47(vii) विशेष रूप से समामेलन योजना में पूंजीगत संपत्ति के हस्तांतरण को पूंजीगत लाभ कर (Capital Gains Tax) से छूट देती है, वहीं धारा 28 के तहत व्यावसायिक संपत्ति (Business Assets) के लिए ऐसी कोई छूट मौजूद नहीं है।

करदेयता का समय (Timing of Taxability)

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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 28 के तहत प्रभार “केवल नए शेयरों के आवंटन पर” आकर्षित होता है, न कि कोर्ट की मंजूरी या नियुक्त तिथि (Appointed Date) पर। आवंटन के चरण में ही “वैधानिक प्रतिस्थापन एक ठोस, वसूली योग्य व्यावसायिक लाभ में बदल जाता है।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले की पुष्टि की। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि जहां स्टॉक-इन-ट्रेड के रूप में रखे गए समामेलित होने वाली कंपनी के शेयर, समामेलित कंपनी के ऐसे शेयरों से प्रतिस्थापित किए जाते हैं जो धन में वसूली योग्य हैं और जिनका निश्चित मूल्यांकन संभव है, वहां यह लेनदेन धारा 28 के तहत कर योग्य व्यावसायिक आय को जन्म देता है।

चूंकि इस सिद्धांत का वास्तविक अनुप्रयोग तथ्यों पर निर्भर करता है—जैसे कि क्या शेयर वास्तव में स्टॉक-इन-ट्रेड थे या निवेश, और क्या वे स्वतंत्र रूप से वसूली योग्य थे—कोर्ट ने मामले को नए सिरे से न्यायनिर्णयन के लिए ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: मेसर्स जिंदल इक्विपमेंट लीजिंग कंसल्टेंसी सर्विसेज लिमिटेड बनाम आयकर आयुक्त दिल्ली – II, नई दिल्ली (और अन्य जुड़ी अपीलें)
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 152/2026 [S.L.P. (C) No. 2028 of 2021 से उद्भूत]
  • कोरम: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन

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