सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के मामले में वन अधिकारी को बरी किया

एक महत्वपूर्ण फैसले में, सुप्रीम कोर्ट ने मीर मुस्तफा अली हाशमी, एक वन अनुभाग अधिकारी, को 5,000 रुपये की रिश्वत मांगने और स्वीकार करने के आरोप से बरी कर दिया। न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और संदीप मेहता की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जनवरी 2003 का है, जब हाशमी ने एक आरा मिल का निरीक्षण किया और बिना लाइसेंस के सागौन की लकड़ी मिलने पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। हाशमी और एक वन रक्षक ने मिल मालिक मुक्का रमेश से मासिक रिश्वत की मांग की, जिसके बाद रमेश ने एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) में शिकायत दर्ज कराई।

मुख्य कानूनी मुद्दे

1. क्या अभियोजन पक्ष ने उचित संदेह से परे रिश्वत की मांग साबित की?

2. क्या हाशमी द्वारा रिश्वत स्वीकार करने को विश्वसनीय साक्ष्यों द्वारा स्थापित किया गया?

3. क्या परिस्थितिजन्य साक्ष्य हाशमी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त थे?

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष हाशमी द्वारा रिश्वत की मांग और स्वीकार करने को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। अदालत ने यह भी देखा कि शिकायतकर्ता का बयान विरोधाभासों से भरा था और फंदा संचालन की प्रक्रिया में गंभीर संदेह उत्पन्न हुआ।

निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और उच्च न्यायालय के निर्णयों को रद्द करते हुए हाशमी को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7 और 13(1)(d) के तहत आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष हाशमी के खिलाफ विश्वसनीय प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रहा।

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