तेज़ाब हमलों की बढ़ती घटनाओं को गंभीरता से लेते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे इन मामलों की संख्या, न्यायालयों में स्थिति और पीड़ितों के पुनर्वास से जुड़ी विस्तृत जानकारी चार सप्ताह में उपलब्ध कराएं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति आर. महादेवन और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने यह आदेश उस जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया जिसे एसिड अटैक पीड़िता और सामाजिक कार्यकर्ता शाहीन मलिक ने दायर किया है।
कोर्ट ने राज्यों से वर्षवार आंकड़ों के साथ जानकारी मांगी है कि कितने मामलों में चार्जशीट दाखिल हुई, कितने मामलों का निपटारा हुआ, कितने अभी भी ट्रायल कोर्ट में लंबित हैं, और कितने मामलों में उच्च न्यायालयों में अपील दायर की गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि प्रत्येक पीड़िता का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया जाए—जिसमें उसकी शैक्षणिक योग्यता, वैवाहिक स्थिति, रोजगार की स्थिति, अब तक किए गए और भविष्य में अपेक्षित इलाज और उससे जुड़ी चिकित्सा व्यय की जानकारी शामिल हो।
पीठ ने यह भी पूछा कि किन-किन मामलों में पीड़िताओं को तेज़ाब पीने के लिए मजबूर किया गया। इस विशेष प्रकार के अपराध पर चिंता जताते हुए मुख्य न्यायाधीश ने केंद्र सरकार से कहा कि वह कानून में बदलाव पर विचार करे ताकि ऐसे अपराधियों को “असाधारण सजा” दी जा सके।
याचिकाकर्ता शाहीन मलिक ने कोर्ट से आग्रह किया है कि एसिड पीड़िताओं—विशेषकर उन महिलाओं—को जो तेज़ाब पीने के कारण आंतरिक रूप से गंभीर रूप से प्रभावित हुई हैं, उन्हें कानून में ‘विकलांग व्यक्ति’ की श्रेणी में शामिल किया जाए, ताकि उन्हें मुआवजा, मुफ्त चिकित्सा और पुनर्वास योजनाओं का पूरा लाभ मिल सके।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार द्वारा समय-समय पर तेज़ाब की बिक्री और पीड़ितों के मुआवजे को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं, लेकिन उनका अनुपालन ज़मीनी स्तर पर बेहद असमान रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के इस कदम से उम्मीद है कि पूरे देश में तेज़ाब हमलों के पीड़ितों को न्याय दिलाने और पुनर्वास को सुनिश्चित करने के लिए एक समग्र और ठोस नीति बनाई जा सकेगी। कोर्ट इस मामले की अगली सुनवाई चार सप्ताह बाद करेगा।

