जब स्वामित्व और कब्जे को लेकर विवाद हो, तब केवल अनिवार्य निषेधाज्ञा का वाद विचारणीय नहीं; स्पेसिफिक रिलीफ एक्ट की धारा 41(h) के तहत उपाय वर्जित: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि जब किसी संपत्ति के स्वामित्व (Title) और कब्जे (Possession) को लेकर गंभीर विवाद हो, तो केवल अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) का मुकदमा पोषणीय (maintainable) नहीं होता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि प्रतिवादी ने विवादित भूमि पर निर्माण कर लिया है, जो वादी को बेदखल करने के समान है, तो वादी को अनिवार्य रूप से कब्जे की मांग करनी चाहिए। ऐसा न करने पर विशिष्ट अनुतोष अधिनियम (Specific Relief Act), 1963 की धारा 41(h) के तहत मुकदमा बाधित माना जाएगा, क्योंकि वादी के पास कानून में एक ‘समान रूप से प्रभावशाली उपाय’ (Equally Efficacious Remedy) उपलब्ध था।

जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह की पीठ ने संजय पालीवाल और अन्य द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के उन फैसलों को रद्द कर दिया था जिनमें भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL) के खिलाफ वादी के पक्ष में डिक्री पारित की गई थी।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद हरिद्वार जिले के ज्वालापुर में स्थित 15 बिस्वा भूमि के एक टुकड़े से संबंधित है। वादी (संजय पालीवाल) का दावा था कि उन्होंने 6 जनवरी 1992 को एक पंजीकृत बिक्री विलेख (Sale Deed) के माध्यम से लक्ष्मीनारायण झा और बशीर खान से यह भूमि खरीदी थी। उनका आरोप था कि प्रतिवादी (BHEL) ने एक चारदीवारी का निर्माण कर दिया है, जिससे सार्वजनिक सड़क तक जाने का उनका रास्ता अवरुद्ध हो गया है।

वादी ने दीवार को हटाने के लिए ‘अनिवार्य निषेधाज्ञा’ (Mandatory Injunction) की मांग करते हुए एक मुकदमा दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया और माना कि वादी ने अपना स्वामित्व और कब्जा साबित कर दिया है। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले की पुष्टि की।

हालांकि, जब मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तो हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को पलट दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि दीवार का निर्माण करना अतिचार (Trespass) और बेदखली (Dispossession) की श्रेणी में आता है, जिसके लिए उचित कानूनी उपाय ‘कब्जे का मुकदमा’ (Suit for Possession) होना चाहिए था। चूंकि वादी ने कब्जे की मांग किए बिना केवल निषेधाज्ञा मांगी थी, इसलिए धारा 41(h) के तहत यह मुकदमा बाधित था।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (वादी) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस.आर. सिंह ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट को सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 100 के तहत तथ्यों के समवर्ती निष्कर्षों (Concurrent Findings) में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए था। उन्होंने संत लाल जैन बनाम अवतार सिंह और जोसेफ सेवरेंस बनाम बेनी मैथ्यू के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि कब्जे की मांग किए बिना भी अनिवार्य निषेधाज्ञा का मुकदमा चलाया जा सकता है।

प्रतिवादी (BHEL) की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेश मड़ियाल ने तर्क दिया कि विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 41(h) के तहत मुकदमा स्पष्ट रूप से बाधित है क्योंकि वादी के पास कब्जे के लिए मुकदमा दायर करने का बेहतर और प्रभावशाली उपाय मौजूद था। उन्होंने यह भी कहा कि वादी विवादित दीवार या भूमि की सटीक पहचान और माप साबित करने में विफल रहे हैं। उन्होंने अनाथुला सुधाकर बनाम पी. बुची रेड्डी मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जब स्वामित्व पर बादल (Cloud over title) हो, तो कब्जे और घोषणा का व्यापक मुकदमा दायर करना आवश्यक है।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने यह जांच की कि क्या हाईकोर्ट द्वारा मुकदमे को खारिज करना उचित था। पीठ ने पाया कि इस मामले में “विवादित संपत्ति के स्वामित्व को लेकर गंभीर विवाद” था, साथ ही कब्जे और भूमि की “सटीक स्थिति और पहचान” को लेकर भी विवाद था।

विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 41(h) पर: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के तर्क को सही ठहराया। धारा 41(h) यह प्रावधान करती है कि यदि कोई अन्य सामान्य कानूनी कार्यवाही के माध्यम से समान रूप से प्रभावशाली राहत प्राप्त की जा सकती है, तो निषेधाज्ञा नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने नोट किया:

“हाईकोर्ट ने पाया कि यदि प्रतिवादी द्वारा उस विवादित संपत्ति पर दीवार का निर्माण किया जाता है जिस पर वादी स्वामित्व का दावा करता है, तो ऐसा निर्माण अतिचार (Trespass) है जिसके परिणामस्वरूप संपत्ति के उस हिस्से से वादी की बेदखली होती है। ऐसी परिस्थितियों में, वादी के लिए उपलब्ध उपयुक्त उपाय यह था कि वह निषेधाज्ञा के अलावा या उसके स्थान पर कब्जे के लिए मुकदमा (Suit for Possession) दायर करे।”

नजीरों (Precedents) में अंतर: पीठ ने अपीलकर्ताओं द्वारा उद्धृत संत लाल जैन और जोसेफ सेवरेंस के मामलों को वर्तमान मामले से अलग बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वे फैसले उन मामलों पर लागू होते हैं जहां प्रतिवादी लाइसेंसधारी (Licensee) था या उसका कब्जा अनुमति पर आधारित था और स्वामित्व को लेकर कोई गंभीर विवाद नहीं था।

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“इसके विपरीत, वर्तमान मामले में… स्वामित्व और कब्जे दोनों के संबंध में गंभीर विवाद मौजूद है, साथ ही विचाराधीन भूमि की पहचान के बारे में भी गंभीर विवाद है… परिणामस्वरूप, उपरोक्त निर्णयों का सिद्धांत वर्तमान तथ्यात्मक मैट्रिक्स पर लागू नहीं किया जा सकता।”

संपत्ति की पहचान पर: सुप्रीम कोर्ट ने भूमि की पहचान के सबूतों की कमी के संबंध में हाईकोर्ट की टिप्पणी से सहमति व्यक्त की। कोर्ट ने कहा कि वाद के नक्शे या निचली अदालत की डिक्री में विवादित दीवार का कोई माप नहीं था, और ऐसे बुनियादी सबूतों के अभाव में निषेधाज्ञा देना कानूनी रूप से अस्थिर था।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा की गई गंभीर कानूनी त्रुटियों को सुधारने के लिए सीपीसी की धारा 100 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का सही प्रयोग किया है। पीठ ने माना कि स्वामित्व और कब्जे पर विवाद होने के बावजूद कब्जे की राहत न मांगने के कारण वादी का मुकदमा विशिष्ट अनुतोष अधिनियम की धारा 41(h) के तहत बाधित था।

तदनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और मुकदमा खारिज करने के हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

केस डिटेल्स:

केस टाइटल: संजय पालीवाल और अन्य बनाम भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड (BHEL)

केस संख्या: सिविल अपील संख्या 6075/2016

कोरम: जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस नोंगमीकापम कोटेश्वर सिंह

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