‘प्लांटेड’ गवाह के आधार पर हत्या के मामले में बरी करने के आदेश को पलटने पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट को गलत ठहराया, आरोपियों की रिहाई का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें उसने निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) द्वारा हत्या के एक मामले में बरी किए गए आरोपियों को दोषी करार दिया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की पूरी कड़ी को साबित करने में विफल रहा और मामले के एकमात्र चश्मदीद गवाह को “प्लांटेड” (बनावटी) करार दिया।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने आरोपियों द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए कहा कि हाईकोर्ट इस तथ्य पर विचार करने में विफल रहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा लिया गया दृष्टिकोण सबूतों के आधार पर एक “संभावित दृष्टिकोण” (plausible view) था।

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला तुलासरेड्डी उर्फ मुदकप्पा और अन्य द्वारा दायर अपीलों पर सुनाया, जिसमें कर्नाटक हाईकोर्ट, धारवाड़ बेंच के 28 नवंबर, 2023 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने गदग के अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा दिए गए बरी करने के आदेश को रद्द कर दिया था और अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 120-बी, 201 और 506 के साथ धारा 34 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने 16 जनवरी, 2026 के फैसले में हाईकोर्ट की दोषसिद्धि को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के बरी करने के आदेश को बहाल कर दिया और अपीलकर्ताओं को तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष का मामला मृतक मार्तंडगौड़ा के बेटे द्वारा 16 दिसंबर, 2011 को दर्ज कराई गई गुमशुदगी की शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता ने बताया कि उसके पिता 11 दिसंबर, 2011 से लापता थे। शुरुआत में इसे गुमशुदगी के मामले के रूप में दर्ज किया गया था, लेकिन 3 जनवरी, 2012 को जांच ने तब नया मोड़ लिया जब शिकायतकर्ता ने भूमि संपत्ति को लेकर पिछले दीवानी विवादों के कारण अपने चाचा, वीरुपक्षगौड़ा (आरोपी नंबर 1) पर संदेह जताया।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि आरोपियों ने आपराधिक साजिश रची, मृतक का अपहरण किया, उसकी हत्या कर दी और सजा से बचने के लिए शव को नहर में फेंक दिया। जांच के बाद छह आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया गया।

30 मार्च, 2019 को ट्रायल कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया था। कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की एक अटूट कड़ी स्थापित करने में विफल रहा। कोर्ट ने मकसद (motive) को “कमजोर और काल्पनिक” तथा साजिश के सिद्धांत को “निराधार” बताया था।

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बरी किए जाने से असंतुष्ट होकर राज्य और शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने अपीलों को स्वीकार कर लिया और आरोपी नंबर 1 से 4 को दोषी ठहराया, जबकि आरोपी नंबर 5 और 6 को बरी करने के फैसले की पुष्टि की।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता: अपीलकर्ताओं के वकील ने तर्क दिया कि आरोपी नंबर 1 के खिलाफ “अंतिम बार देखे जाने” (last seen) या अपहरण या हत्या में भाग लेने का कोई आरोप नहीं था। यह प्रस्तुत किया गया कि विवाद पूरी तरह से दीवानी प्रकृति का था। आरोपी नंबर 2 और 3 के संबंध में, वकील ने तर्क दिया कि अभियोजन का मामला काफी हद तक पीडब्लू-5 (PW-5) पर निर्भर था, जिसे चश्मदीद गवाह बताया गया था, लेकिन उसका बयान घटना के 21 दिन बाद दर्ज किया गया था।

बचाव पक्ष ने इस बात पर प्रकाश डाला कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर (PW-14) ने राय दी थी कि मौत पोस्टमार्टम (जो 4 जनवरी, 2012 को किया गया था) से 10 दिन पहले हुई होगी। यह अभियोजन के इस दावे का खंडन करता है कि मृतक की हत्या 11 दिसंबर, 2011 को की गई थी। इसके अलावा, यह तर्क दिया गया कि शव की बरामदगी विधिवत साबित नहीं हुई क्योंकि शव निकालने वाले व्यक्तियों (CW-22 और CW-23) से पूछताछ नहीं की गई।

प्रतिवादी (राज्य और शिकायतकर्ता): राज्य ने तर्क दिया कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत आरोपी नंबर 2 से 4 के स्वैच्छिक खुलासे से मामला संदेह से परे साबित हुआ है, जिससे नहर में शव की खोज हुई। वकील ने कहा कि यह जानकारी विशेष रूप से आरोपियों को थी। राज्य ने पीडब्लू-5 के बयान पर भरोसा जताया और तर्क दिया कि रिपोर्ट करने में देरी आरोपियों की धमकियों के कारण हुई थी।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

सुप्रीम कोर्ट ने सबूतों, विशेष रूप से पीडब्लू-5 की गवाही और चिकित्सा साक्ष्यों की बारीकी से जांच की।

एकमात्र चश्मदीद गवाह (PW-5) पर: कोर्ट ने पाया कि जिस वाहन का इस्तेमाल कथित अपराध में किया गया था, उसके चालक (PW-5) ने 21 दिनों तक पुलिस को सूचित नहीं किया। कोर्ट ने नोट किया:

“यह आश्चर्यजनक है कि यद्यपि पीडब्लू-5 को चश्मदीद गवाह के रूप में पेश किया गया है, लेकिन उसने 21 दिनों तक पुलिस को उक्त घटना के बारे में सूचित नहीं किया। इतनी देरी के लिए उसने केवल यह स्पष्टीकरण दिया है कि आरोपियों ने उसे धमकी दी थी।”

पीठ ने आगे बताया कि पीडब्लू-5 ने स्वीकार किया कि वह आरोपियों को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता था और जब शव कथित तौर पर फेंका गया था, तो उसने कोई शोर नहीं मचाया या पुलिस से संपर्क नहीं किया। कोर्ट ने कहा:

“इस प्रकार, उपरोक्त पहलुओं को देखते हुए, यह कहा जा सकता है कि पीडब्लू-5 एक ‘प्लांटेड गवाह’ (planted witness) है।”

चिकित्सा साक्ष्य पर: कोर्ट को चिकित्सा राय और अभियोजन की समयसीमा के बीच एक महत्वपूर्ण विसंगति मिली। फैसले में नोट किया गया:

“पीडब्लू-14, जिस डॉक्टर ने मृतक के शव का पोस्टमार्टम किया, ने विशेष रूप से कहा है कि मृत्यु 10 दिन पहले हुई होगी। हालांकि, अभियोजन का मामला है कि मृतक 11.12.2011 को लापता हो गया था और उसी दिन आरोपियों ने उसकी हत्या कर दी थी। इस प्रकार, हमारा विचार है कि चिकित्सा साक्ष्य भी अभियोजन के मामले का पूरी तरह से समर्थन नहीं करते हैं और संदेह पैदा करते हैं।”

बरामदगी और साजिश पर: कोर्ट ने कहा कि केवल इकबालिया बयानों और शव की खोज (जो “विधिवत साबित नहीं हुई”) पर भरोसा करना दोषसिद्धि के लिए अपर्याप्त है। इसने नोट किया कि हाईकोर्ट ने स्वयं आरोपी नंबर 5 और 6 से जुड़ी साजिश की कहानी पर विश्वास नहीं किया था।

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अपीलीय हस्तक्षेप पर: बाबू साहेबगौड़ा रुद्रगौड़ा बनाम कर्नाटक राज्य (2024), रमेश बनाम उत्तराखंड राज्य (2020), और बसप्पा बनाम कर्नाटक राज्य (2014) जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने बरी करने के खिलाफ अपील को नियंत्रित करने वाले सिद्धांतों को दोहराया। पीठ ने जोर दिया:

“यदि लिया गया दृष्टिकोण एक संभावित दृष्टिकोण है, तो अपीलीय अदालत इस आधार पर बरी करने के आदेश को नहीं पलट सकती है कि कोई अन्य दृष्टिकोण भी संभव था।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट यह विचार करने में विफल रहा कि ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण प्रशंसनीय था और सबूतों पर आधारित था।

“अपीलीय अदालत बरी करने के आदेश में तभी हस्तक्षेप कर सकती है जब वह इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों के आधार पर केवल एक ही निष्कर्ष दर्ज किया जा सकता था कि आरोपी का अपराध उचित संदेह से परे साबित हुआ था और कोई अन्य निष्कर्ष संभव नहीं था।”

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष परिस्थितियों की कड़ी को पूरा करने में विफल रहा है। तदनुसार, कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार कर लिया, हाईकोर्ट के 28 नवंबर, 2023 के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के 30 मार्च, 2019 के बरी करने के आदेश को बहाल कर दिया।

मामले का विवरण

  • मामले का नाम: तुलासरेड्डी उर्फ मुदकप्पा और अन्य बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (संबद्ध अपील के साथ)
  • मामला संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2120-2121 ऑफ 2024 और 2542-2543 ऑफ 2024
  • कोरम: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम. पंचोली

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