झारखंड हाईकोर्ट (Jharkhand High Court) ने एक अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि शादी से पहले किसी अन्य महिला के साथ ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ (Live-in Relationship) में रहने की बात को छिपाना ‘धोखाधड़ी’ (Fraud) की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने कहा कि यदि इस तथ्य को छिपाकर विवाह के लिए सहमति प्राप्त की गई है, तो ऐसा विवाह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत शून्य करणीय (Voidable) है।
न्यायमूर्ति सुजीत नारायण प्रसाद और न्यायमूर्ति गौतम कुमार चौधरी की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें विवाह को रद्द (Annul) कर दिया गया था। इसके साथ ही, कोर्ट ने पत्नी के भविष्य को सुरक्षित करने के उद्देश्य से स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony) की राशि को 30 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2 दिसंबर 2015 को संपन्न हुए एक विवाह से संबंधित है। पत्नी (अपीलकर्ता) का आरोप था कि शादी के बाद जब वह अपनी ससुराल गई, तो उसे पता चला कि उसका पति शादी से पहले किसी अन्य महिला के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रह रहा था। पत्नी ने दावा किया कि पति और उसके परिवार ने धोखे से उसे अच्छे चरित्र वाला बताकर शादी की थी, जबकि वास्तविकता छिपाई गई थी।
इसके अलावा, पत्नी ने आरोप लगाया कि ससुराल वालों ने 15 लाख रुपये अतिरिक्त दहेज की मांग की और मांग पूरी न होने पर उसे शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया। अंततः 2 मार्च 2016 को उसे घर से निकाल दिया गया। पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत विवाह को शून्य घोषित करने और स्थायी एलिमनी के लिए फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की थी।
चूंकि पति कोर्ट में उपस्थित नहीं हुआ, इसलिए गढ़वा फैमिली कोर्ट ने एकपक्षीय (Ex-parte) सुनवाई करते हुए विवाह को रद्द कर दिया और पति को 30 लाख रुपये एलिमनी देने का आदेश दिया। पत्नी ने एलिमनी बढ़ाने के लिए और पति ने एकपक्षीय आदेश को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट में अपील की थी।
पक्षों की दलीलें
पत्नी का पक्ष: पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट ने एलिमनी तय करते समय पति की वास्तविक आय और हैसियत का सही आकलन नहीं किया। यह बताया गया कि पति एक प्रतिष्ठित कंपनी में उच्च पद पर कार्यरत है और भारी वेतन उठाता है। पत्नी ने मांग की कि उसके जीवन स्तर और भविष्य की सुरक्षा को देखते हुए एलिमनी की राशि बढ़ाई जानी चाहिए।
पति का पक्ष: पति की ओर से दलील दी गई कि उसे निचली अदालत से कोई समन या नोटिस नहीं मिला था, इसलिए एकपक्षीय आदेश कानूनन गलत है। उसने क्रूरता और लिव-इन रिलेशनशिप के आरोपों को झूठा बताया और कहा कि पत्नी के व्यवहार के कारण शादी टूटी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
एकपक्षीय आदेश पर: हाईकोर्ट ने पति की इस दलील को खारिज कर दिया कि उसे नोटिस नहीं मिला था। रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए बेंच ने कहा:
“रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि समन और नोटिस जारी होने के बावजूद पति न तो कोर्ट में पेश हुआ और न ही उसने कोई लिखित बयान दर्ज कराया। ऐसे में कोर्ट के पास एकपक्षीय कार्यवाही के अलावा कोई विकल्प नहीं था।”
धोखाधड़ी और लिव-इन रिलेशनशिप: कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयानों से यह साबित होता है कि पति के पिछले संबंधों को जानबूझकर छिपाया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
“चूंकि पति के पिछले लिव-इन रिलेशनशिप की स्थिति का खुलासा पत्नी के सामने नहीं किया गया था, इसलिए यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि विवाह के लिए पत्नी और उसके अभिभावक की सहमति धोखाधड़ी से प्राप्त की गई थी, जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 12(1)(c) के तहत आता है।”
मृत विवाह (Dead Wood Marriage): कोर्ट ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्ष 2016 से अलग रह रहे हैं और सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है। कोर्ट ने कहा कि यह शादी पूरी तरह से ‘मृत’ (Dead Wood) हो चुकी है और इसे जबरदस्ती खींचने का कोई मतलब नहीं है।
एलिमनी में बढ़ोतरी: गुजारा भत्ता निर्धारित करने के लिए कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के रजनीश बनाम नेहा (2021) के फैसले का हवाला दिया। कोर्ट ने पाया कि पति हिंदुस्तान जिंक लिमिटेड में मैनेजर के पद पर है और लगभग 1.56 लाख रुपये मासिक कमाता है, जबकि पत्नी एलएलबी पास होने के बावजूद बेरोजगार है और पिता पर निर्भर है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“पति की आय, वित्तीय खुलासे और पिछली कमाई यह स्थापित करती है कि वह अधिक राशि देने की स्थिति में है। पत्नी उस जीवन स्तर की हकदार है जो उसे शादी के दौरान मिलता और जो उसके भविष्य को सुरक्षित कर सके।”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि पति को ‘वन-टाइम सेटलमेंट’ के रूप में 50 लाख रुपये की राशि पत्नी को देनी होगी। यह भुगतान फरवरी 2026 से जून 2026 के बीच पांच समान मासिक किस्तों में किया जाएगा।

