समय सीमा समाप्त होने के बाद संज्ञान लेना प्रक्रिया का दुरुपयोग: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘सामान्य प्रथा’ की दलील खारिज कर आपराधिक कार्यवाही रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चोरी के एक मामले में दो आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 468 के तहत निर्धारित वैधानिक समय सीमा (Limitation Period) समाप्त होने के बाद अपराध का संज्ञान लेना कानूनन गलत था।

अदालत ने मजिस्ट्रेट के उस स्पष्टीकरण को भी सख्ती से खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि संज्ञान लेते समय समय-सीमा की गहराई से जांच न करना अदालतों में एक “सामान्य प्रथा” (Usual Practice) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रथा कानून के अनिवार्य प्रावधानों का स्थान नहीं ले सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 13 अप्रैल, 2019 को हुई एक मोटरसाइकिल चोरी की घटना से जुड़ा है। इस संबंध में 16 अप्रैल, 2019 को फिरोजाबाद उत्तर पुलिस स्टेशन में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 379 के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी।

विवेचना के दौरान सात आरोपियों के नाम सामने आए। पुलिस ने 14 जून, 2019 को पांच आरोपियों—अमन शाक्य, अनुज गौतम, आदर्श यादव, विशाल उर्फ राजा और राहुल उर्फ भगौना—के खिलाफ पहली चार्जशीट दाखिल की, जिस पर मजिस्ट्रेट ने समय रहते संज्ञान ले लिया था।

हालाँकि, दो अन्य आरोपियों—अवनीश कुमार (आवेदक) और सूरज ठाकुर—के खिलाफ जांच लंबित रही। इनके खिलाफ धारा 379 और 411 आईपीसी के तहत दूसरी चार्जशीट 26 जून, 2021 को तैयार कर ली गई थी, लेकिन इसे अदालत में पेश नहीं किया गया। क्षेत्राधिकारी (CO), फिरोजाबाद के अनुसार, यह चार्जशीट “24 नवंबर, 2024 तक कार्यालय में ही रखी रही।” अंततः इसे घटना के 5 साल से अधिक समय बाद, 25 नवंबर, 2024 को अदालत में पेश किया गया।

फिरोजाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 27 नवंबर, 2024 को इस पर संज्ञान लिया। इसके खिलाफ अवनीश कुमार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षकारों की दलीलें

आवेदक के अधिवक्ता पवन सिंह पुंडीर ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 379 (चोरी) और 411 (चोरी की संपत्ति प्राप्त करना) के तहत अधिकतम सजा तीन वर्ष है। सीआरपीसी की धारा 468(2)(c) के अनुसार, ऐसे अपराधों का संज्ञान लेने की समय सीमा तीन वर्ष है।

चूंकि घटना 2019 की है और संज्ञान 2024 में लिया गया, इसलिए यह कार्यवाही सीआरपीसी की धारा 468 और 469 (जो अब BNSS की धारा 514 और 515 के अनुरूप है) द्वारा बाधित थी। यह दलील दी गई कि मजिस्ट्रेट का आदेश कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का उल्लंघन है और अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकारों के विपरीत है।

पुलिस ने अपनी गलती स्वीकार करते हुए बताया कि चार्जशीट कार्यालय में रुकी हुई थी और इसके लिए जिम्मेदार हेड कांस्टेबल के खिलाफ विभागीय कार्यवाही शुरू कर दी गई है।

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मजिस्ट्रेट का स्पष्टीकरण और कोर्ट की नाराजगी

हाईकोर्ट ने इससे पहले तत्कालीन सीजेएम (जो अब सहारनपुर में तैनात हैं) से स्पष्टीकरण मांगा था। अपने जवाब में, न्यायिक अधिकारी ने कहा कि सहायक लोक अभियोजक या स्टाफ ने समय सीमा के मुद्दे पर उनका ध्यान आकर्षित नहीं किया। उन्होंने कहा:

“उत्तर प्रदेश और शायद अन्य राज्यों की मजिस्ट्रियल अदालतों में यह एक सामान्य प्रथा है कि पुलिस रिपोर्ट प्राप्त होने पर संज्ञान लेने के उद्देश्य से रिकॉर्ड की कोई गहन जांच नहीं की जाती है और केवल केस डायरी में मौजूद सामग्री के आधार पर प्रथम दृष्टया विचार बनाया जाता है।”

न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने इस स्पष्टीकरण पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट का स्पष्टीकरण दर्शाता है कि वे अपने न्यायिक दायित्वों को हल्के में ले रही हैं।

हाईकोर्ट का निर्णय

पीठ ने कहा कि “ऐसी प्रथा कानून का विकल्प नहीं हो सकती जो दंड प्रक्रिया संहिता में उल्लिखित नहीं है।” कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (पी.के. चौधरी बनाम कमांडर और स state of Punjab बनाम सरवन सिंह) का हवाला देते हुए कहा कि जहां कानून का प्रावधान अनिवार्य (mandatory) है, वहां अदालत को कानून के जनादेश के विपरीत संज्ञान नहीं लेना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि तीन साल तक की सजा वाले अपराधों के लिए तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बाद संज्ञान लेना “कानून के प्रावधानों के खिलाफ था और अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग था।”

निष्कर्ष और निर्देश

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हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निम्नलिखित आदेश दिए:

  1. कार्यवाही रद्द: आवेदक अवनीश कुमार और सह-आरोपी सूरज ठाकुर के खिलाफ केस संख्या 94500/2024 की पूरी कार्यवाही, जिसमें 27 नवंबर, 2024 का संज्ञान आदेश और 26 जून, 2021 की चार्जशीट शामिल है, को रद्द कर दिया गया।
  2. अन्य आरोपियों पर केस चलेगा: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन पांच अन्य आरोपियों के खिलाफ 2019 में समय सीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल हो गई थी, उनके खिलाफ मुकदमा जारी रहेगा।
  3. न्यायिक अधिकारियों का प्रशिक्षण: कोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे न्यायिक प्रशिक्षण और अनुसंधान संस्थान (JTRI), लखनऊ को इस आदेश से अवगत कराएं ताकि न्यायिक अधिकारियों को प्रशिक्षित किया जा सके कि “संज्ञान आपराधिक मामले का आधार है, इसलिए संज्ञान आदेश कानून के अनुसार ही पारित किया जाना चाहिए।”

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: अवनीश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
  • केस नंबर: एप्लीकेशन यू/एस 528 बीएनएसएस नंबर 7072 ऑफ 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि
  • आवेदक के वकील: पवन सिंह पुंडीर, एस.एम. अयाज़ अली
  • विपक्षी के वकील: जी.ए. (शासकीय अधिवक्ता)

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