धारा 319 CrPC | अतिरिक्त आरोपी को तलब करने के लिए ‘प्रथम दृष्टया’ से अधिक सबूत जरूरी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या मामले में ससुराल वालों को तलब करने से किया इनकार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 319 के तहत अतिरिक्त आरोपी को तलब करने की शक्ति ‘असाधारण’ है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को अतिरिक्त आरोपी के रूप में बुलाने के लिए केवल ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) मामला बनना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि इसके लिए सबूतों का स्तर उससे अधिक मजबूत होना चाहिए।

इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में मृतका के ससुर, सास और देवर को आरोपी बनाने की मांग वाली आपराधिक निगरानी याचिका (Criminal Revision) को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला जिला कौशांबी के थाना मोहब्बतपुर पैन्सा में दर्ज मुकदमा अपराध संख्या 01/2020 से संबंधित है। शिकायतकर्ता मान सिंह ने एफआईआर में आरोप लगाया था कि उन्होंने अपनी बेटी राधिका की शादी मनोज के साथ की थी। आरोप के मुताबिक, शादी के बाद पति मनोज, ससुर भैया लाल, सास और देवर अशोक कुमार ने अतिरिक्त दहेज के रूप में भैंस और सोने की अंगूठी की मांग को लेकर राधिका को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। यह भी आरोप लगाया गया कि मनोज के अपनी भाभी सुनीता के साथ अवैध संबंध थे।

7 जनवरी 2020 को राधिका मृत पाई गई। आरोप था कि ससुराल वालों ने उसकी हत्या कर फांसी पर लटका दिया। पुलिस ने आईपीसी की धारा 498-A, 304-B और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज किया। विवेचना के बाद पुलिस ने केवल पति मनोज के खिलाफ आरोप पत्र (Charge Sheet) दाखिल किया और बाकी ससुराल वालों को क्लीन चिट दे दी। ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों के आधार पर वादी ने धारा 319 CrPC के तहत अर्जी दाखिल कर बाकी ससुराल वालों को भी आरोपी बनाने की मांग की, जिसे ट्रायल कोर्ट ने 8 नवंबर 2024 को खारिज कर दिया था।

पक्षों की दलीलें

निगरानीकर्ता (वादी) के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि मृतका की हत्या दहेज की मांग पूरी न होने के कारण की गई थी। उन्होंने कहा कि ट्रायल के दौरान गवाह PW-1 और PW-2 ने अभियोजन की कहानी का समर्थन किया है और विपक्षियों की भूमिका के बारे में बताया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के असीम अख्तर बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2024) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि धारा 319 की अर्जी तय करने के लिए जिरह (Cross-examination) का पूरा होना जरूरी नहीं है।

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दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष और सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि शादी साधारण तरीके से हुई थी और दहेज की कोई मांग नहीं थी। उन्होंने तर्क दिया कि माता-पिता और भाई अलग रहते थे, जिसकी पुष्टि विवेचना के दौरान स्वतंत्र गवाहों ने भी की थी। बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि जिरह के दौरान मुख्य गवाहों ने स्वीकार किया है कि भैंस और अंगूठी की मांग केवल पति मनोज ने की थी। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के हरदीप सिंह बनाम पंजाब राज्य के फैसले का हवाला दिया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

जस्टिस चवन प्रकाश की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए धारा 319 CrPC के दायरे पर विस्तार से चर्चा की। कोर्ट ने हरदीप सिंह मामले का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि धारा 319(1) में प्रयुक्त शब्द “साक्ष्य” (Evidence) का अर्थ केवल ट्रायल के दौरान दर्ज किए गए साक्ष्य से है, न कि विवेचना के दौरान एकत्र की गई सामग्री से।

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कोर्ट ने ओमी बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2025) और शिव बरन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के फैसलों का भी हवाला दिया और कहा:

“ट्रायल कोर्ट धारा 319 CrPC के तहत अतिरिक्त आरोपी को केवल अपने समक्ष पेश किए गए साक्ष्यों के आधार पर ही तलब कर सकता है, न कि चार्जशीट या केस डायरी में उपलब्ध सामग्री के आधार पर।”

सबूतों के मानक पर जोर देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“धारा 319 CrPC के तहत आरोपी को तलब करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है, जिसका प्रयोग संयम और सावधानी से किया जाना चाहिए। आदेश पारित करते समय कोर्ट को यह विचार करना चाहिए कि क्या ‘प्रथम दृष्टया’ (Prima Facie) से अधिक का मामला बनता है या नहीं। अतिरिक्त आरोपी को बुलाने के लिए केवल प्रथम दृष्टया मामला पर्याप्त नहीं है।”

तथ्यों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि गवाह PW-1 (मान सिंह) ने अपनी जिरह (Cross-examination) में स्पष्ट रूप से कहा है कि भैंस और सोने की अंगूठी की मांग मनोज (पति) ने की थी। इसके अलावा, विवेचक (IO) ने भी बयान दिया था कि मनोज अपनी पत्नी के साथ अलग रहता था। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने इन तथ्यों पर विचार करते हुए सही निर्णय लिया है।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री धारा 319 के तहत आवश्यक कड़े मानकों को पूरा नहीं करती है और रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया।

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केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: मान सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल रिवीजन नंबर 6573 ऑफ 2024
  • कोरम: जस्टिस चवन प्रकाश
  • याची के वकील: फूल सिंह यादव, वैभव यादव
  • विपक्षी के वकील: देव राज सिंह, जी.ए. (सरकारी वकील)

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