धारा 138 NI Act | यदि चेक जारी करने की अवधि में निदेशक पद पर नहीं था, तो उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

कर्नाटक हाईकोर्ट ने परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881 की धारा 138 के तहत शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी के पूर्व निदेशक को उन चेक के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता जो उस अवधि के दौरान जारी किए गए थे जब वह कंपनी के साथ जुड़ा नहीं था।

न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने सुजीत सुधाकरन द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए कहा कि उनके खिलाफ कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, क्योंकि आधिकारिक रिकॉर्ड यह साबित करते हैं कि चेक जारी होने की तारीखों पर वह निदेशक नहीं थे।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला प्रतिवादी, लालू जैकब मैमन द्वारा दायर एक शिकायत से उत्पन्न हुआ था। शिकायत 27.09.2014 और 29.09.2014 दिनांकित दो चेक के अनादरण (dishonour) से संबंधित थी। इन चेक के आधार पर 29.11.2014 को शिकायत दर्ज की गई और ट्रायल कोर्ट ने अपराध का संज्ञान लेते हुए आपराधिक मामला (C.C. No. 32008/2014) दर्ज किया।

आरोपी नंबर 3 के रूप में नामित सुजीत सुधाकरन ने कार्यवाही को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनका मुख्य तर्क यह था कि जिन तारीखों पर चेक जारी किए गए थे, उस समय वह मैसर्स ड्रीमज़ इंफ्रा इंडिया प्रा. लिमिटेड के निदेशक या पदाधिकारी नहीं थे।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील, श्री प्रकाश बी.एन. ने दलील दी कि 27.09.2014 और 29.09.2014 को याचिकाकर्ता किसी भी क्षमता में कंपनी के मामलों में शामिल नहीं था। उन्होंने तर्क दिया कि यदि वह उस समय निदेशक या अतिरिक्त निदेशक होते और व्यवसाय के मामलों में शामिल होते, तो स्थिति अलग होती। लेकिन चूंकि वह उन तारीखों पर किसी पद पर नहीं थे, इसलिए उनके खिलाफ कार्यवाही अनुचित है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील श्री नचे गौड़ा बी.एच. ने याचिका का विरोध किया। उनका कहना था कि याचिकाकर्ता 2012 में निदेशक थे और बाद में अतिरिक्त निदेशक बने। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता “पूरे समय कंपनी के मामलों में शामिल रहे और उन्होंने कई लोगों को धोखा दिया है।” उन्होंने तर्क दिया कि ये तथ्य ट्रायल का विषय हैं और इसे सीआरपीसी की धारा 482 के तहत याचिका में तय नहीं किया जाना चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

हाईकोर्ट ने कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) के डेटा की जांच की, जिससे कंपनी के साथ याचिकाकर्ता के कार्यकाल की स्पष्ट स्थिति सामने आई:

  • निदेशक के रूप में नियुक्ति: 16.01.2012
  • निदेशक पद से हटे: 08.04.2013
  • अतिरिक्त निदेशक के रूप में नियुक्ति: 14.09.2015
  • अतिरिक्त निदेशक पद से हटे: 22.03.2016

न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने पाया कि 08.04.2013 को बाहर निकलने और 14.09.2015 को दोबारा प्रवेश करने के बीच एक “शून्य” (vacuum) अवधि थी। विवादित चेक 27.09.2014 और 29.09.2014 को जारी किए गए थे, जो पूरी तरह से इस अंतराल के भीतर आते हैं।

कोर्ट ने कहा:

“उन तारीखों पर, कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय की आधिकारिक वेबसाइट की नोटिंग के अनुसार भी याचिकाकर्ता कंपनी के मामलों में शामिल नहीं था… याचिकाकर्ता स्वीकार्य रूप से चेक का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, और प्रत्यक्ष रूप से वह हस्ताक्षरकर्ता हो भी नहीं सकता था क्योंकि वह कंपनी के मामलों में शामिल नहीं था।”

अपने निर्णय के समर्थन में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया:

  1. अशोक मल बाफना बनाम अपर इंडिया स्टील मैन्युफैक्चरिंग एंड इंजीनियरिंग कंपनी लिमिटेड (2018): शीर्ष अदालत ने कहा था कि एक निदेशक जिसने कॉज ऑफ एक्शन से पहले इस्तीफा दे दिया था, उसे बिना इस सबूत के कि वह दिन-प्रतिदिन के मामलों का प्रभारी था, परोक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
  2. अनिल खडकीवाला बनाम राज्य (NCT of Delhi) (2019): चेक जारी होने से पहले इस्तीफा देने वाले निदेशक के खिलाफ कार्यवाही रद्द की गई थी।
  3. राजेश विरेन शाह बनाम रेडिंगटन इंडिया लिमिटेड (2024): कोर्ट ने माना कि इस्तीफा देने वाले निदेशकों को उनके इस्तीफे के बाद के व्यवसाय संचालन के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
  4. अधिराज सिंह बनाम योगराज सिंह (2024): यह दोहराया गया कि इस्तीफा देने वाले निदेशक को उनके इस्तीफे के बाद जारी किए गए चेक के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
  5. कमलकिशोर श्रीगोपाल तापड़िया बनाम इंडिया एनर-जेन (प्रा) लिमिटेड (2025): कोर्ट ने कहा कि धारा 141 के तहत दायित्व सक्रिय भागीदारी प्रदर्शित करने वाले विशिष्ट आरोपों पर निर्भर है, और अपराध से पहले इस्तीफा देने वाले गैर-कार्यकारी निदेशक को उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
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निर्णय

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों को लागू करते हुए, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता प्रासंगिक तारीखों पर न तो निदेशक था और न ही कंपनी के मामलों में शामिल था।

न्यायमूर्ति नागप्रसन्ना ने कहा:

“यदि चेक उस अवधि के दौरान जारी किए गए होते जब याचिकाकर्ता कंपनी का निदेशक या अतिरिक्त निदेशक था, तो यह पूरी तरह से अलग परिस्थिति होती। जबकि ऐसा नहीं है, याचिकाकर्ता-आरोपी नंबर 3 के खिलाफ कार्यवाही को समाप्त करते हुए याचिका सफल होने योग्य है।”

परिणामस्वरूप, कोर्ट ने आपराधिक याचिका को स्वीकार कर लिया और 19वें अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, बेंगलुरु की फाइल पर लंबित मामले (C.C. No. 32008/2014) में याचिकाकर्ता के खिलाफ कार्यवाही को रद्द (Quash) कर दिया।

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केस विवरण:

  • केस टाइटल: सुजीत सुधाकरन बनाम लालू जैकब मैमन
  • केस नंबर: आपराधिक याचिका संख्या 10408/2023
  • कोरम: न्यायमूर्ति एम. नागप्रसन्ना
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री प्रकाश बी.एन.
  • प्रतिवादी के वकील: श्री नचे गौड़ा बी.एच. (श्री जॉर्ज जोसेफ के लिए)

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