चेक बाउंस के मामलों में शिकायतकर्ता की वैधता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट (NI Act), 1881 की धारा 138 के तहत शिकायत केवल वही व्यक्ति दर्ज करा सकता है जिसके पक्ष में चेक जारी किया गया है (Payee) या जो कानूनी रूप से चेक का धारक (Holder in due course) है।
जस्टिस समित गोपाल की पीठ ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision) को स्वीकार करते हुए कानपुर नगर के मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित समनिंग आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि इस मामले में शिकायतकर्ता के पास मुकदमा दायर करने का कोई कानूनी आधार (Locus Standi) नहीं था, क्योंकि चेक किसी और संस्था के नाम पर जारी किए गए थे और शिकायत किसी और ने दर्ज कराई थी।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 11 चेकों के अनादरण (Dishonour) से जुड़ा था, जिसमें प्रत्येक चेक की राशि 2,00,000 रुपये थी और ये 15 अप्रैल 2012 को जारी किए गए थे। विवाद की जड़ यह थी कि ये सभी चेक ‘होटल पैराडाइज’ (Hotel Paradise) के पक्ष में जारी किए गए थे, लेकिन कोर्ट में शिकायत ‘मेसर्स कृष्णा होटल्स एंड डेवलपर्स’ (M/s. Krishna Hotels and Developers) ने अपनी पार्टनर श्रीमती सरोज दुबे के माध्यम से दर्ज कराई।
निचली अदालत ने शुरू में 21 नवंबर 2012 को अपने आदेश में इस विसंगति को नोट भी किया था। मजिस्ट्रेट ने देखा था कि चेक ‘होटल पैराडाइज’ के नाम पर हैं जबकि शिकायतकर्ता ‘कृष्णा होटल्स’ है। कोर्ट ने स्पष्टीकरण भी मांगा था। लेकिन इसके बावजूद, बाद में 26 जुलाई 2013 को निचली अदालत ने आरोपी (याचिकाकर्ता राजेश कुकरेजा) को धारा 138 के तहत तलब (Summon) कर लिया। इसी आदेश को राजेश कुकरेजा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अदालत में दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील श्री एल.एम. सिंह ने तर्क दिया कि पूरी कानूनी प्रक्रिया ही गलत आधार पर शुरू की गई है। उनका कहना था कि जब चेक ‘होटल पैराडाइज’ के नाम पर काटे गए थे, तो शिकायत भी उसी फर्म या उसके अधिकृत एजेंट द्वारा दर्ज कराई जानी चाहिए थी। ‘मेसर्स कृष्णा होटल्स एंड डेवलपर्स’ इस मामले में एक ‘तीसरा पक्ष’ (Third Party) है और उसे NI Act के तहत मुकदमा चलाने का कोई अधिकार नहीं है।
दूसरी ओर, विपक्षी पक्ष (शिकायतकर्ता) के वकील ने दलील दी कि ‘होटल पैराडाइज’ दरअसल ‘मेसर्स कृष्णा होटल्स एंड डेवलपर्स’ की ही एक यूनिट है। उन्होंने तर्क दिया कि दोनों के बीच एक एग्रीमेंट था और वे एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, इसलिए उन्हें शिकायत करने का अधिकार है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले (मेसर्स नरेश पॉटरीज बनाम मेसर्स आरती इंडस्ट्रीज) का हवाला देते हुए कहा कि अधिकार का यह मुद्दा ट्रायल के दौरान तय किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
जस्टिस समित गोपाल ने मामले की सुनवाई करते हुए NI Act की धारा 142 का उल्लेख किया, जो अपराधों के संज्ञान (Cognizance) से संबंधित है। धारा 142(a) स्पष्ट रूप से कहती है कि कोर्ट केवल तभी संज्ञान लेगा जब शिकायत लिखित रूप में ‘Payee’ (जिसके नाम चेक है) या ‘Holder in due course’ द्वारा की गई हो।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले का हवाला विपक्षी वकील ने दिया था, उसे इस मामले के तथ्यों से अलग बताया। कोर्ट ने कहा कि उस मामले में शिकायतकर्ता ‘Holder in due course’ था, जबकि मौजूदा मामले में शिकायतकर्ता न तो Payee है और न ही Holder in due course।
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:
“निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 की धारा 138 के तहत किसी तीसरे पक्ष (Third Party) द्वारा अपने नाम से शिकायत स्वीकार्य नहीं है। इसे केवल चेक के Payee या Holder in due course द्वारा ही दायर किया जाना चाहिए… कोई भी तीसरा व्यक्ति या अजनबी, जिसका चेक पर कोई कानूनी अधिकार नहीं है, शिकायत दर्ज नहीं कर सकता, भले ही वह उस लेनदेन से अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हो रहा हो।”
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यदि कोई अधिकृत प्रतिनिधि (Authorized Representative) शिकायत दर्ज कराता है, तो वह शिकायत ‘Payee’ की ओर से होनी चाहिए, न कि प्रतिनिधि की व्यक्तिगत क्षमता में।
अंततः, हाईकोर्ट ने माना कि ‘मेसर्स कृष्णा होटल्स एंड डेवलपर्स’ के पास ‘होटल पैराडाइज’ के पक्ष में जारी चेकों के लिए शिकायत दर्ज कराने का कोई अधिकार नहीं था। निचली अदालत ने इस महत्वपूर्ण कानूनी पहलू की अनदेखी की थी।
निष्कर्ष
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजेश कुकरेजा की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट, कानपुर नगर द्वारा 26 जुलाई 2013 को जारी किए गए समनिंग आदेश को निरस्त (Quash) कर दिया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: राजेश कुकरेजा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन नंबर – 2776 ऑफ 2013
- कोरम: जस्टिस समित गोपाल
- याचिकाकर्ता के वकील: एल.एम. सिंह
- विपक्षी के वकील: आलोक कुमार यादव, अंकुर कुशवाहा

