ससुर की मृत्यु के बाद विधवा हुई बहू भी ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार, ‘आश्रित’ की श्रेणी में होगी शामिल: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी महिला के पति की मृत्यु उसके ससुर की मृत्यु के बाद होती है, तो भी वह महिला अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण (Maintenance) पाने की हकदार है। कोर्ट ने माना कि ऐसी बहू हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत ‘आश्रित’ (Dependant) की परिभाषा में आती है।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की पीठ ने उस दलील को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि केवल वही बहू भरण-पोषण का दावा कर सकती है जो ससुर की मृत्यु के समय विधवा हो। पीठ ने हाईकोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया जिसमें विधवा बहू की याचिका को सुनवाई योग्य माना गया था।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद स्वर्गीय डॉ. महेंद्र प्रसाद की संपत्ति से जुड़ा है, जिनका निधन 27 दिसंबर, 2021 को हुआ था। डॉ. प्रसाद के तीन बेटे थे:

  1. रंजीत शर्मा, जिनका निधन 2 मार्च, 2023 को (पिता की मृत्यु के बाद) हुआ।
  2. देवेंद्र राय, जिनका निधन पिता से पहले हो गया था (अपीलकर्ता कंचना राय इनकी पत्नी हैं)।
  3. राजीव शर्मा

विवाद तब शुरू हुआ जब रंजीत शर्मा की पत्नी गीता शर्मा (प्रतिवादी नंबर 1) ने अपने ससुर की संपत्ति से भरण-पोषण के लिए फैमिली कोर्ट में आवेदन किया। फैमिली कोर्ट ने उनकी याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी कि डॉ. महेंद्र प्रसाद की मृत्यु के समय गीता शर्मा विधवा नहीं थीं, क्योंकि उनके पति उस वक्त जीवित थे।

इसके बाद गीता शर्मा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने 20 अगस्त, 2025 को फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया और कहा कि वह ‘बेटे की विधवा’ होने के नाते आश्रित हैं। इस फैसले के खिलाफ कंचना राय और उमा देवी (मृतक की कथित लिव-इन पार्टनर) ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।

READ ALSO  498-A में पूरे परिवार को फंसाने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है :Bom HC

सुप्रीम कोर्ट के सामने कानूनी सवाल

सुप्रीम कोर्ट को मुख्य रूप से इस कानूनी प्रश्न का उत्तर देना था:

“क्या वह बहू, जो अपने ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होती है, ससुर की संपत्ति पर ‘आश्रित’ मानी जाएगी और क्या वह उस संपत्ति से भरण-पोषण पाने की हकदार है?”

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने मामले का फैसला पूरी तरह से कानून की शाब्दिक व्याख्या के आधार पर किया।

1. ‘आश्रित’ की परिभाषा में कोई समय सीमा नहीं

कोर्ट ने हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 की धारा 21(vii) का विश्लेषण किया, जो ‘आश्रित’ को परिभाषित करती है। इसमें “पुत्र की कोई भी विधवा” (any widow of his son) शब्द का प्रयोग किया गया है।

जस्टिस पंकज मिथल ने फैसले में लिखा:

“उक्त परिभाषा में कहीं भी ‘पूर्व-मृत पुत्र की विधवा’ (widow of a predeceased son) शब्दों का प्रयोग नहीं किया गया है। इसमें स्पष्ट रूप से ‘पुत्र की कोई भी विधवा’ लिखा है। विधायिका ने जानबूझकर ‘पुत्र’ से पहले ‘पूर्व-मृत’ शब्द नहीं लगाया। महिला कब विधवा हुई या पुत्र की मृत्यु कब हुई, यह तथ्य महत्वहीन है।”

2. शब्दों के साथ छेड़छाड़ संभव नहीं (Literal Rule of Interpretation)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कानून की भाषा बिल्कुल साफ हो, तो अदालतें उसमें अपनी तरफ से शब्द नहीं जोड़ सकतीं। कोर्ट ने कहा:

“अदालतें क़ानून के पाठ में कोई शब्द जोड़ या घटा नहीं सकतीं। क़ानून के प्रावधानों को फिर से नहीं लिखा जा सकता और न ही ऐसा कुछ अनुमान लगाया जा सकता है जो स्पष्ट भाषा में निहित न हो।”

3. समानता और गरिमा का अधिकार (अनुच्छेद 14 और 21)

पीठ ने कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर बहुओं के बीच भेदभाव करना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन होगा।

“पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच वर्गीकरण करना पूरी तरह अनुचित और मनमाना है। इस तरह के वर्गीकरण का अधिनियम के उद्देश्य से कोई तार्किक संबंध नहीं है।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि भरण-पोषण से इनकार करना अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) के खिलाफ होगा, क्योंकि इससे महिला को लाचारी और सामाजिक उपेक्षा का सामना करना पड़ सकता है।

4. मनुस्मृति का उल्लेख

कोर्ट ने प्राचीन हिंदू कानून और नैतिक कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए मनुस्मृति (अध्याय 8, श्लोक 389) का भी जिक्र किया, जो परिवार की महिलाओं के भरण-पोषण के दायित्व पर जोर देता है।

READ ALSO  Justice Joymalya Bagchi of Calcutta High Court Elevated to Supreme Court, Set to Become CJI in 2031

5. धारा 19 और धारा 22 में अंतर

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 19 ससुर के जीवित रहने के दौरान बहू के भरण-पोषण की बात करती है, जबकि धारा 22 मृतक की ‘संपदा’ (Estate) से आश्रितों के भरण-पोषण से संबंधित है।

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि प्रतिवादी नंबर 1 (गीता शर्मा) “पुत्र की विधवा” होने के नाते धारा 21(vii) के तहत आश्रित हैं और धारा 22 के तहत भरण-पोषण की हकदार हैं। कोर्ट ने कंचना राय और उमा देवी की अपीलों को खारिज कर दिया और हाईकोर्ट के उस निर्देश को बरकरार रखा जिसमें फैमिली कोर्ट को मेरिट के आधार पर भरण-पोषण तय करने को कहा गया था।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के क्लर्क की 16 साल बाद हुई बर्खास्तगी को रद्द किया, सेवा में बहाली व 50% बकाया वेतन का आदेश

केस विवरण

केस टाइटल: कंचना राय बनाम गीता शर्मा और अन्य (उमा देवी बनाम गीता शर्मा और अन्य के साथ)

केस नंबर: सिविल अपील (SLP(C) नंबर 1544-1545 ऑफ 2026 से उत्पन्न)

कोरम: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles