सरकारी ड्यूटी के लिए अधिग्रहित वाहनों से दुर्घटना होने पर बीमा कंपनी नहीं, बल्कि सरकार होगी उत्तरदायी: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि जब किसी निजी वाहन को चुनाव या अन्य सरकारी कार्यों के लिए सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा अधिग्रहित (Requisition) किया जाता है, तो उस अवधि के दौरान होने वाली किसी भी दुर्घटना के मुआवजे की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की नहीं, बल्कि अधिग्रहण करने वाले सरकारी विभाग की होगी।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने ग्वालियर के जिला मजिस्ट्रेट और कलेक्टर द्वारा दायर उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी जिसने दुर्घटना पीड़ितों को मुआवजा देने का दायित्व नेशनल इंश्योरेंस कंपनी से हटाकर राज्य प्रशासन पर डाल दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 23 जनवरी 2010 को हुई एक दुखद दुर्घटना से जुड़ा है, जिसमें एक बस (MP-07-MG-9897) और एक मोटरसाइकिल के बीच टक्कर हुई थी। इस हादसे में मोटरसाइकिल सवार की मृत्यु हो गई थी। दुर्घटना के समय, किड्जी कॉर्नर स्कूल, ग्वालियर के स्वामित्व वाली इस बस को जिला मजिस्ट्रेट द्वारा ग्राम पंचायत चुनाव के लिए अधिग्रहित किया गया था।

मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT), ग्वालियर ने शुरू में ₹5,13,500 का मुआवजा निर्धारित किया था। इसके बाद, मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर ₹27,01,556 कर दी और बीमा कंपनी को दायित्व से मुक्त करते हुए मुआवजे की पूरी जिम्मेदारी जिला मजिस्ट्रेट पर डाल दी। अपीलकर्ता (जिला मजिस्ट्रेट) ने इस आधार पर आपत्ति जताई कि वाहन का वैध बीमा था और सरकारी अधिकारियों का वाहन में कोई “बीमा योग्य हित” (Insurable Interest) या स्वामित्व नहीं था।

READ ALSO  वसीयत पर कब संदेह किया जा सकता है? दिल्ली हाईकोर्ट ने समझाया

पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता का तर्क था कि चूंकि दुर्घटना के समय वाहन का बीमा प्रभावी था, इसलिए बीमा कंपनी को ही भुगतान करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि सार्वजनिक कार्यों के लिए उपयोग किए जा रहे वाहनों की जिम्मेदारी सरकारी अधिकारियों पर डालना “गलत संदेश” देगा, क्योंकि वे वाहन के मालिक नहीं हैं।

दूसरी ओर, न्यायालय ने इस कानूनी पहलू की जांच की कि क्या अधिग्रहण की अवधि के दौरान राज्य “मालिक” (Owner) की परिभाषा के दायरे में आता है या नहीं।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

अदालत ने ‘अधिग्रहण’ (Requisition) शब्द की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अर्थ एक आधिकारिक आदेश है जिसमें मूल मालिक से वाहन की कस्टडी और निर्णय लेने की शक्ति छीन ली जाती है।

खंडपीठ ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम दीपा देवी (2008) के मिसाल का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था:

READ ALSO  नागरिक धर्म का प्रचार करने के हकदार: बॉम्बे हाईकोर्ट ने धर्मांतरण के आरोपी ईसाई जोड़े के खिलाफ धारा 144 का आदेश रद्द किया

“जब वाहन अधिग्रहण के अधीन होता है, तो मालिक का उस पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाता… सभी उद्देश्यों के लिए, वाहन का पंजीकृत मालिक उस पर से पूरा नियंत्रण खो देता है।”

न्यायालय ने पूर्ण कला देवी बनाम असम राज्य (2014) मामले का भी संदर्भ दिया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि मोटर वाहन अधिनियम, 1988 की धारा 2(30) के तहत “मालिक” वह व्यक्ति माना जाना चाहिए जिसके पास वाहन का नियंत्रण और कब्जा है, न कि केवल वह जिसका नाम पंजीकरण में दर्ज है।

कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:

“एक बार अधिग्रहित होने के बाद, वाहन आधिकारिक निर्देशों के तहत चलाया जाता है… इन परिस्थितियों में बीमाकर्ता (Insurer) पर दायित्व डालना अनुबंध को उस जोखिम से आगे बढ़ाना होगा जिसे कवर करने के लिए सहमति दी गई थी। बीमा कंपनी को ऐसे उपयोग के लिए जवाबदेह ठहराना अनुचित होगा जो बीमाधारक द्वारा नियंत्रित नहीं था।”

कोर्ट ने आगे गौर किया कि जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 160 के तहत ड्राइवर को अधिग्रहित करने का स्पष्ट उल्लेख नहीं है, लेकिन व्यावहारिक सुविधा के लिए राज्य अक्सर ड्राइवर सहित वाहन का उपयोग करता है। ऐसा करके राज्य “परोक्ष रूप से उस ड्राइवर की क्षमता को स्वीकार करता है” और वाहन का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है।

READ ALSO  दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू होने पर, आई.बी.सी. की धारा 14 के तहत एनआई अधिनियम की धारा 138/141 के तहत कार्यवाही पर रोक लगाने वाली रोक कंपनी के निदेशकों जैसे प्राकृतिक व्यक्तियों के खिलाफ उनके पारस्परिक दायित्व के लिए लागू नहीं होगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अधिग्रहण एक “वैधानिक प्राधिकरण के तहत जारी किया गया आदेश” था न कि कोई स्वैच्छिक समझौता, इसलिए राज्य को अपने नियंत्रण से उत्पन्न होने वाले जोखिमों की जिम्मेदारी स्वयं उठानी चाहिए।

अदालत ने इस मामले को यू.पी. एसआरटीसी बनाम कुलसुम मामले से अलग बताया, क्योंकि वह मामला वाहनों के स्वैच्छिक अनुबंध से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला एक अनिवार्य वैधानिक अधिग्रहण का है।

फैसला: सुप्रीम कोर्ट ने अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें अधिग्रहण करने वाले प्राधिकरण (राज्य) को मुआवजा राशि का भुगतान करने का आदेश दिया गया था।

केस विवरण

  • केस का नाम: जिला मजिस्ट्रेट और जिला चुनाव अधिकारी एवं कलेक्टर, ग्वालियर, म.प्र. बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड और अन्य।
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ / 2026 (@ SLP (Civil) No. 22910 of 2025)
  • बेंच: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
  • दिनांक: 23 मार्च, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles