हाईकोर्ट का कर्तव्य है कि वह रिट याचिका में उठाए गए सभी मुद्दों का निस्तारण करे, केवल एक बिंदु पर फैसला देना “मौलिक त्रुटि”: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक सेवा विवाद को केवल एक कानूनी बिंदु पर विचार करने के बाद स्कूल ट्रिब्यूनल को वापस भेज दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने केवल एक निर्णायक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके और पक्षों द्वारा उठाए गए अन्य मुद्दों को नजरअंदाज करके “गलती” की है।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने हेमलता एकनाथ पिसे द्वारा दायर अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें मामले को नए सिरे से फैसले के लिए स्कूल ट्रिब्यूनल को रिमांड (remand) किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद प्रतिवादी संख्या 1, शुभम बहु-उद्देशीय संस्था, वाधमना द्वारा अपीलकर्ता हेमलता एकनाथ पिसे के खिलाफ की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई और उनकी सेवा से बर्खास्तगी से उत्पन्न हुआ था।

अपीलकर्ता ने अपनी बर्खास्तगी को स्कूल ट्रिब्यूनल, नागपुर के समक्ष चुनौती दी थी। 8 अगस्त, 2019 को ट्रिब्यूनल ने बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया और अपीलकर्ता को सभी लाभों के साथ सेवा में बहाली का आदेश दिया।

ट्रिब्यूनल के फैसले से असंतुष्ट होकर प्रबंधन (प्रतिवादी संख्या 1) ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका (संख्या 5899/2019) दायर की। हाईकोर्ट ने 5 सितंबर, 2024 को पारित अपने आदेश में याचिका को स्वीकार कर लिया और मामले को स्कूल ट्रिब्यूनल के पास नए सिरे से विचार करने के लिए वापस भेज दिया।

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हाईकोर्ट का यह निर्णय प्रबंधन द्वारा उठाए गए केवल एक “एकल बिंदु” (solitary point) पर आधारित था: कि ट्रिब्यूनल ने सभी रिकॉर्ड और कार्यवाही, विशेष रूप से सचिव को अपीलकर्ता के खिलाफ कार्यवाही शुरू करने के लिए अधिकृत करने वाले प्रस्ताव (resolution) पर गौर नहीं किया था।

इसके बाद, अपीलकर्ता ने एक समीक्षा याचिका (Review Petition) दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि अनुशासनात्मक कार्यवाही में “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन” किया गया था। उन्होंने बताया कि उन्हें अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह (cross-examine) करने की अनुमति नहीं दी गई और जांच अधिकारी ने 1 अगस्त, 2017 को अचानक कार्यवाही बंद कर दी। हालांकि, हाईकोर्ट ने 25 सितंबर, 2024 को समीक्षा याचिका खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने केवल सचिव के प्राधिकरण (authorization) के मुद्दे पर रिट याचिका का फैसला करने के हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की आलोचना की।

पीठ ने कहा:

“हमारे विचार में, उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, हाईकोर्ट को केवल एक बिंदु पर विचार करके मामले को ट्रिब्यूनल के पास नए सिरे से निर्णय के लिए वापस नहीं भेजना चाहिए था।”

कोर्ट ने जोर देकर कहा कि भले ही सचिव को आरोप पत्र जारी करने के लिए अधिकृत किया गया हो, फिर भी अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे शेष थे। हाईकोर्ट को यह विचार करना चाहिए था कि “क्या जांच में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ था, जैसा कि दावा किया गया है, और क्या ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष उचित थे।”

सभी मुद्दों को संबोधित करने के हाईकोर्ट के कर्तव्य पर विस्तार से बताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा:

“कानून अच्छी तरह से तय है कि जब किसी मामले के तथ्यों में कोर्ट द्वारा उत्तर दिए जाने के लिए कई मुद्दे उठते हैं, तो आदर्श रूप से, निपटाने से पहले कोर्ट को केवल एक निर्णायक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, प्रत्येक मुद्दे का कारणों सहित उत्तर दर्ज करना चाहिए।”

पीठ ने कहा कि एक विस्तृत निर्णय वादियों के अधिकारों का सम्मान करता है और यदि कोई अपील दायर की जाती है तो अपीलीय अदालत को भी इससे लाभ होता है।

निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अन्य मुद्दों से निपटने में हाईकोर्ट की विफलता एक “मौलिक त्रुटि” (fundamental flaw) थी जो उसके आदेश को दूषित करती है। नतीजतन, शीर्ष अदालत ने 5 सितंबर, 2024 के आदेश और 25 सितंबर, 2024 के समीक्षा आदेश दोनों को रद्द कर दिया।

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मामले को ट्रिब्यूनल में भेजने के बजाय, सुप्रीम कोर्ट ने रिट याचिका को नए सिरे से विचार के लिए हाईकोर्ट को वापस भेज दिया।

यह देखते हुए कि अपीलकर्ता पहले ही सेवानिवृत्ति की आयु (superannuation) प्राप्त कर चुकी हैं और सेवा में बहाली अब संभव नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के लिए निर्णय लेने हेतु प्राथमिक प्रश्न तय किए:

  1. क्या ट्रिब्यूनल का प्रतिवादी द्वारा की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई में हस्तक्षेप करना उचित था?
  2. यदि पहले प्रश्न का उत्तर प्रतिवादी के खिलाफ जाता है, तो क्या अपीलकर्ता पिछले वेतन (back wages) और सेवानिवृत्ति लाभों की हकदार होंगी?
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सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि वे इस मामले को रोस्टर बेंच को सौंपें, ताकि इसका निपटारा अधिमानतः चार महीने के भीतर किया जा सके।

केस विवरण:

  • वाद शीर्षक: हेमलता एकनाथ पिसे बनाम शुभम बहु-उद्देशीय संस्था वाधमना और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या 1558-1559/2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 27266-67/2024 से उत्पन्न)
  • कोरम: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

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