सुप्रीम कोर्ट ने ‘सीताराम कुच्छबेदिया बनाम विमल राणा और अन्य’ (क्रिमिनल अपील संख्या 1837-38/2011) के मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा है कि यदि गैर-कानूनी सभा (Unlawful Assembly) का साझा उद्देश्य हत्या करना था, तो यह पहचानना जरूरी नहीं है कि घातक चोट किस विशेष आरोपी ने मारी थी। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसने दोषियों की सजा को उम्रकैद से घटाकर मात्र 6 साल कर दिया था। शीर्ष अदालत ने सभी 19 दोषियों की उम्रकैद की सजा को बहाल कर दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 11 जुलाई 2003 की एक घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक भगगू उर्फ भग चंद नर्मदा नदी में स्नान कर लौट रहा था, तभी खैरी गांव के पास पाइप डालकर रास्ता रोक दिया गया। वहां घात लगाकर बैठे गुर्जर समुदाय के आरोपियों ने लाठियों से भगगू और उसके साथियों पर हमला कर दिया। इस हमले में भगगू को 29 चोटें आईं, जिनमें से सिर पर लगी चार चोटें काफी गहरी थीं, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। घटना के पीछे पुरानी रंजिश और उसी दिन दोपहर में हुआ एक विवाद कारण बताया गया।
ट्रायल कोर्ट (विशेष न्यायाधीश, नरसिंहपुर) ने 2006 में 19 आरोपियों को धारा 148, 323/149, 325/149 और 302/149 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हालांकि, 2010 में हाईकोर्ट ने सजा को यह कहते हुए कम कर दिया कि मौत एक ही घातक चोट से हुई थी और यह स्पष्ट नहीं है कि वह चोट किसने मारी, इसलिए इसे ‘साझा उद्देश्य’ नहीं माना जा सकता।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं (शिकायतकर्ता और राज्य) की ओर से: अपीलकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि हमला अचानक नहीं बल्कि पूरी योजना के साथ किया गया था। उन्होंने ‘चुन्नी बाई बनाम छत्तीसगढ़ राज्य’ और ‘महादेव साहनी बनाम बिहार राज्य’ जैसे मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी गैर-कानूनी सभा द्वारा शरीर के महत्वपूर्ण हिस्सों पर बार-बार वार किए जाते हैं, तो हत्या के ‘साझा उद्देश्य’ का अनुमान लगाया जाना चाहिए।
प्रतिवादियों (दोषियों) की ओर से: दोषियों के वकील ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि इस्तेमाल किए गए हथियार (लाठियां) आमतौर पर घातक नहीं होते। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपियों का इरादा केवल मृतक को “सबक सिखाना” था, न कि जान से मारना। साथ ही उन्होंने पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर की गवाही न होने पर भी सवाल उठाए।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने हत्या (धारा 300) और गैर-इरादतन हत्या (धारा 299) के बीच के अंतर को स्पष्ट करने के लिए ‘वीर सा सिंह बनाम पंजाब राज्य’ और ‘दयानंद बनाम हरियाणा राज्य’ के कानूनी सिद्धांतों का उपयोग किया।
1. इरादे और साझा उद्देश्य पर: कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को खारिज कर दिया कि हत्या का साझा उद्देश्य नहीं था। पीठ ने कहा कि आरोपियों ने रास्ता रोका था और वे हथियारों से लैस होकर इंतजार कर रहे थे।
“सिर की चोटों की स्थिति, गहराई और संख्या स्पष्ट रूप से स्थापित करती है कि काफी बल के साथ महत्वपूर्ण हिस्से पर कई वार किए गए थे… यह नहीं कहा जा सकता कि हमलावरों का इरादा ऐसी शारीरिक चोट पहुंचाने का नहीं था जो मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त हो।”
2. धारा 149 और ‘प्रतिवर्ती दायित्व’ (Vicarious Liability) पर: पीठ ने हाईकोर्ट के तर्क को “स्वयं-विरोधाभासी” और “विपरीत” (Perverse) बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब धारा 149 लागू होती है, तो व्यक्तिगत चोट का महत्व खत्म हो जाता है।
“एक बार जब यह स्थापित हो जाता है कि एक गैर-कानूनी सभा मौजूद थी और आरोपियों का साझा उद्देश्य हत्या करना था, तो यह पहचानना कि घातक चोट किसने मारी, महत्वहीन हो जाता है… धारा 149 IPC हर सदस्य को उस अपराध के लिए दोषी बनाती है जो साझा उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया गया हो।”
कोर्ट ने ‘नित्य नंद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का हवाला देते हुए कहा कि धारा 149 के तहत यह मायने नहीं रखता कि आरोपी ने सक्रिय भूमिका निभाई या नहीं, उसकी उपस्थिति ही उसे ‘प्रतिवर्ती दायित्व’ के दायरे में लाती है।
3. पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की स्वीकार्यता: डॉक्टर की गवाही न होने के तर्क पर कोर्ट ने कहा कि जब बचाव पक्ष ने स्वयं ट्रायल के दौरान पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को स्वीकार ($Exh. P/8$) कर लिया था, तो धारा 294 CrPC के तहत उसे पुख्ता सबूत माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 2010 के आदेश को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई उम्रकैद की सजा को बहाल कर दिया। पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट का यह मानना कि व्यक्तिगत हमलावर की पहचान न होना सजा कम करने का आधार है, कानूनन गलत है। कोर्ट ने सभी दोषियों को 8 सप्ताह के भीतर सरेंडर करने का आदेश दिया है।
- केस का नाम: सीताराम कुच्छबेदिया बनाम विमल राणा और अन्य (संबंधित अपील के साथ)
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1837-38/2011

