यूएपीए मामलों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; 17 राज्यों को एक साल में ट्रायल पूरा करने का निर्देश

आतंकी गतिविधियों से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेजी लाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया है। कोर्ट ने दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र सहित 17 राज्यों को यह सुनिश्चित करने को कहा है कि यूएपीए (UAPA) के तहत दर्ज मामलों का ट्रायल एक साल के भीतर पूरा किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इन संवेदनशील मामलों के निपटारे के लिए समर्पित (डेडिकेटेड) बुनियादी ढांचे और रोजाना सुनवाई की आवश्यकता पर जोर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जिन राज्यों में एनआईए (NIA) के 10 से अधिक मामले लंबित हैं, वे संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श कर विशेष एनआईए अदालतें स्थापित करें।

अदालत ने इन कार्यवाहियों की गति के लिए कड़े मानक निर्धारित किए हैं। बेंच ने टिप्पणी की, “हम उम्मीद कर रहे हैं कि औसतन एक महीने में एक एनआईए मामले का निपटारा हो जाए।” हालांकि कोर्ट ने माना कि कुछ जटिल मामलों में एक महीने से अधिक का समय लग सकता है, लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रोजाना सुनवाई और समर्पित विशेष लोक अभियोजकों (Special Public Prosecutors) की नियुक्ति को अनिवार्य बताया गया है।

इस निर्देश के दायरे में आने वाले 17 राज्यों में कर्नाटक और तमिलनाडु भी शामिल हैं। सुनवाई के दौरान इन दोनों राज्यों के प्रतिनिधियों ने पुष्टि की कि उनके यहां लंबित मामलों की संख्या 10 से अधिक है, जिसके बाद कोर्ट ने उन्हें अतिरिक्त न्यायिक ढांचा तैयार करने का निर्देश दिया।

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अदालत ने फंडिंग मॉडल में बदलाव का भी जिक्र किया ताकि राज्यों की वित्तीय स्थिति इन अदालतों के रास्ते में बाधा न बने। केंद्र सरकार ने प्रत्येक विशेष एनआईए अदालत के लिए गैर-आवर्ती व्यय (non-recurring expenditure) के रूप में 1 करोड़ रुपये और आवर्ती व्यय (recurring expenditure) के लिए सालाना 1 करोड़ रुपये का अनुदान देने की प्रतिबद्धता जताई है।

सीजेआई (CJI) कांत ने पारंपरिक ‘मैचिंग ग्रांट’ फॉर्मूले (60% केंद्र और 40% राज्य) की विफलताओं पर चर्चा करते हुए कहा:

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“कई बार यह व्यावहारिक नहीं होता क्योंकि कुछ राज्यों के पास राजस्व की कमी होती है और उनकी अन्य प्राथमिकताएं होती हैं। इसके परिणामस्वरूप, न्यायिक बुनियादी ढांचे के लिए केंद्र द्वारा दिया गया 60 प्रतिशत अनुदान भी इस्तेमाल नहीं हो पाता या नौकरशाही की वजह से उसका गलत इस्तेमाल होता है। बुनियादी ढांचे की कमी के कारण कई राज्यों में न्यायपालिका को कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।”

आतंकवाद से जुड़े मामलों के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को एनडीपीएस (NDPS) एक्ट और मकोका (MCOCA) जैसे अन्य जघन्य अपराधों के लिए भी इसी तरह की समर्पित अदालतें बनाने के लिए प्रोत्साहित किया।

दिल्ली सरकार की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय ने बेंच को सूचित किया कि राउज एवेन्यू कोर्ट परिसर की दूसरी मंजिल पर एनडीपीएस और मकोका सहित 15 विशेष अदालतें जल्द ही काम करना शुरू कर देंगी। ये अदालतें अप्रैल 2026 तक पूरी तरह तैयार होने की उम्मीद है और दिल्ली उच्चतर न्यायिक सेवा के अधिकारियों को इनके संचालन के लिए चिन्हित कर लिया गया है।

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इन विशेष अदालतों की प्रभावशीलता सुनिश्चित करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को नोटिस जारी कर न्यायिक अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (ACR) के लिए एक ‘विशेष तंत्र’ बनाने को कहा है। बेंच ने नोट किया कि इन उच्च-तीव्रता वाले विशेष पदों पर काम करने वाले जजों के प्रदर्शन का मूल्यांकन पारंपरिक मानकों के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए।

यह आदेश केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सौंपी गई एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट के बाद आया है, जिसमें देश भर में लंबित आतंक विरोधी मुकदमों की स्थिति पर चिंता जताई गई थी।

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