फिक्स्ड डिपॉज़िट से मिलने वाला ब्याज अपने-आप ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ नहीं माना जाएगा; जहाँ धोखाधड़ी के आरोपों के लिए ट्रायल की ज़रूरत हो, वहाँ उपभोक्ता शिकायत सुनवाई योग्य नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने ‘संत रोहिदास लेदर इंडस्ट्रीज एंड चर्मकार डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ द्वारा विजया बैंक के खिलाफ दायर एक उपभोक्ता शिकायत को खारिज करने के फैसले को बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जालसाजी (fraud) और दस्तावेजों के हेरफेर (forgery) से जुड़े जटिल तथ्यात्मक विवादों का निपटारा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत संक्षिप्त कार्यवाही (summary proceedings) में नहीं किया जा सकता।

जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने 19 मार्च, 2026 को यह फैसला सुनाया। यह अपील राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (NCDRC) के 13 मार्च, 2023 के उस आदेश के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें शिकायत को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि अपीलकर्ता एक ‘उपभोक्ता’ नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट NCDRC के इस तर्क से सहमत नहीं था कि ब्याज कमाने वाली FD ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ के दायरे में आती है, लेकिन कोर्ट ने शिकायत को खारिज करने के अंतिम निर्णय को सही माना क्योंकि मामला गंभीर धोखाधड़ी के आरोपों से जुड़ा था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता महाराष्ट्र सरकार का एक उपक्रम है। इसने 28 फरवरी, 2014 को विजया बैंक में ₹9 करोड़ की फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) कराई थी। बैंक ने इस पर ब्याज भी दिया और TDS भी काटा। हालांकि, जून 2014 में अपीलकर्ता को बैंक से एक पत्र मिला जिसमें कहा गया कि उक्त FDR के बदले ₹8.10 करोड़ की ओवरड्राफ्ट (OD) सुविधा मंजूर की गई है।

अपीलकर्ता ने इस लेनदेन को संदिग्ध मानते हुए आर्थिक अपराध शाखा (EOW), मुंबई में शिकायत दर्ज कराई। मार्च 2017 में बैंक ने सूचित किया कि FDR की मैच्योरिटी राशि को ओवरड्राफ्ट के बकाया कर्ज के साथ समायोजित (adjust) कर दिया गया है और केवल शेष ₹50,58,847 वापस किए गए हैं। अपीलकर्ता ने इस समायोजन को अवैध बताते हुए पूरी राशि की मांग की और उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षकारों के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि:

  • बैंक में सरप्लस फंड जमा करना ‘व्यावसायिक गतिविधि’ नहीं है।
  • बैंकिंग सेवाओं और कंपनी के मुख्य व्यवसाय (चमड़ा उद्योगों को कच्चा माल देना) के बीच लाभ कमाने का कोई सीधा संबंध (direct nexus) नहीं था।
  • एक ‘बॉडी कॉर्पोरेट’ (कंपनी) भी अधिनियम के तहत उपभोक्ता हो सकती है।

बैंक का पक्ष था कि:

  • यह निवेश मुनाफा बढ़ाने के लिए किया गया था, इसलिए यह ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ की श्रेणी में आता है।
  • अपीलकर्ता ने खुद FDR गिरवी रखकर ऋण लिया था और अब धोखाधड़ी का आरोप लगा रहा है।
  • जालसाजी और फर्जीवाड़े के आरोपों का फैसला केवल सिविल या क्रिमिनल कोर्ट ही कर सकता है, उपभोक्ता फोरम नहीं।
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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने दो प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर चर्चा की:

1. फिक्स्ड डिपॉजिट और ‘व्यावसायिक उद्देश्य’ कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल इसलिए कि एक डिपॉजिट पर ब्याज मिल रहा है, वह निवेश व्यावसायिक नहीं हो जाता। कोर्ट ने कहा:

“बैंक द्वारा ग्राहकों से नकद जमा स्वीकार करना और उस पर ब्याज देना एक बुनियादी बैंकिंग सेवा है… सिर्फ इसलिए कि फिक्स्ड डिपॉजिट रसीद पर ब्याज मिलता है, इसका मतलब यह नहीं है कि ली गई बैंकिंग सेवा व्यावसायिक उद्देश्य के लिए थी। इस हद तक, हम NCDRC के विचार से सहमत नहीं हैं।”

हालांकि, पीठ ने यह भी कहा कि यदि डिपॉजिट का उपयोग व्यावसायिक लाभ के लिए क्रेडिट सुविधा लेने हेतु किया जाता है, तो स्थिति अलग हो सकती है।

2. धोखाधड़ी के मामले और संक्षिप्त कार्यवाही कोर्ट ने जोर देकर कहा कि उपभोक्ता अदालतों का उद्देश्य विवादों का त्वरित और सरल समाधान करना है, न कि जालसाजी या धोखाधड़ी जैसे जटिल आपराधिक मामलों का ट्रायल करना।

चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर, सिटी यूनियन बैंक लिमिटेड बनाम आर. चंद्रमोहन (2023) के मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:

“आयोग के समक्ष कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, इसलिए अत्यधिक विवादित तथ्यों या धोखाधड़ी और धोखाधड़ी जैसे आपराधिक कृत्यों से जुड़े मामलों का फैसला इस अधिनियम के तहत नहीं किया जा सकता।”

वर्तमान मामले में, बैंक का दावा था कि FDR को कानूनी रूप से गिरवी रखा गया था, जबकि अपीलकर्ता इसे फर्जी बता रहा था। कोर्ट ने माना कि बिना गवाहों और सबूतों के विस्तृत परीक्षण के यह तय करना संभव नहीं है कि सेवा में कोई कमी (deficiency) थी या नहीं।

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मामला वर्तमान स्वरूप में उपभोक्ता आयोग के समक्ष चलने योग्य नहीं है क्योंकि इसमें गंभीर आपराधिक आरोप शामिल हैं।

“ऐसी परिस्थितियों में, शिकायत के आरोपों का निपटारा 1986 के अधिनियम के तहत नहीं किया जा सकता क्योंकि उन आरोपों को नियमित आपराधिक या सिविल कार्यवाही में ही ठीक से संबोधित किया जा सकता है।”

अपील खारिज करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपीलकर्ता कानून के अनुसार सक्षम न्यायालय या फोरम में जाने के लिए स्वतंत्र है।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: संत रोहिदास लेदर इंडस्ट्रीज एंड चर्मकार डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम विजया बैंक
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 4841 ऑफ 2023
  • पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा
  • फैसले की तारीख: 19 मार्च, 2026

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