सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) और केंद्र सरकार से उस जनहित याचिका पर जवाब मांगा जिसमें प्रैक्टिस कर रही महिला वकीलों पर कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न से संरक्षण अधिनियम, 2013 (PoSH अधिनियम) लागू करने की मांग की गई है।
यह याचिका अधिवक्ता सीमा जोशी ने दायर की है, जिसमें बॉम्बे हाईकोर्ट के हालिया फैसले को चुनौती दी गई है। हाईकोर्ट ने बार काउंसिल्स में स्थायी आंतरिक शिकायत समितियां (Internal Complaints Committees – ICCs) गठित करने का निर्देश देने से इंकार किया था। हाईकोर्ट का मानना था कि PoSH अधिनियम केवल वहां लागू होता है जहां नियोक्ता–कर्मचारी संबंध मौजूद हो, जबकि बार काउंसिल्स अधिवक्ताओं की नियोक्ता नहीं हैं।
जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने हालांकि इस बात पर सवाल उठाया कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सीधे अनुच्छेद 32 के तहत जनहित याचिका कैसे दायर की जा सकती है। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “आप बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर स्थगन और उसे निरस्त करने की मांग कर रहे हैं। अगर आप कुछ हासिल करना चाहते हैं तो प्रक्रिया का पालन करें। यह अनुच्छेद 32 की याचिका नहीं हो सकती।”

याचिकाकर्ता के वकील ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट के आदेश पर स्थगन का आग्रह अब नहीं किया जा रहा है। इसके बाद कोर्ट ने BCI और केंद्र को नोटिस जारी किया। बॉम्बे हाईकोर्ट में पक्षकार रही बार काउंसिल ऑफ महाराष्ट्र एंड गोवा को इस मामले में प्रतिवादी सूची से हटा दिया गया।
याचिका में दलील दी गई है कि कानूनी पेशे को PoSH अधिनियम से बाहर रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के मेदा कोटवाल लेले बनाम भारत संघ फैसले का हवाला दिया गया है, जिसमें BCI को सभी बार संस्थाओं में विशाखा दिशा-निर्देश लागू करने का निर्देश दिया गया था। याचिका के अनुसार, इस बाध्यकारी मिसाल की अनदेखी करके बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला per incuriam है और यह महिला अधिवक्ताओं के संवैधानिक अधिकारों और कानूनी सुरक्षा को कमजोर करता है।
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि वह घोषित करे कि PoSH अधिनियम राज्य बार काउंसिल में नामांकित और अदालतों में प्रैक्टिस कर रही महिला अधिवक्ताओं पर लागू होता है, हाईकोर्ट का आदेश रद्द करे जहां यह अधिनियम को केवल कर्मचारियों तक सीमित करता है, और सभी बार काउंसिल्स व बार एसोसिएशनों को आंतरिक समितियां गठित करने का निर्देश दे। साथ ही, विशाखा और मेदा कोटवाल लेले दिशा-निर्देशों को आगे बढ़ाते हुए कानूनी पेशे में लैंगिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए नए दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है।
इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता रितिका वोहरा, एम्बर टिक्कू और नमन जोशी ने सुप्रीम कोर्ट में पेशी दी।