सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसने कंपनी अधिनियम, 1956 के तहत लंबित ‘स्कीम ऑफ अरेंजमेंट’ (SOA) के आधार पर एक कॉर्पोरेट देनदार के खिलाफ दिवाला कार्यवाही (Insolvency Proceedings) पर रोक लगा दी थी।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने कहा कि “न्यायिक अनुशासन” का उपयोग “सुस्त मुकदमेबाजों” (tardy litigators) द्वारा सार्वजनिक धन को खतरे में डालने के लिए ढाल के रूप में नहीं किया जा सकता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्ट्सी कोड (IBC), 2016 की धारा 238 के तहत इसके अधिभावी प्रभाव (overriding effect) के कारण, दिवाला समाधान प्रक्रिया पुराने कंपनी अधिनियम के तहत निष्क्रिय पड़ी योजनाओं पर प्राथमिकता लेती है।
मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या कंपनी अधिनियम, 1956 की धारा 391 से 394 के तहत हाईकोर्ट में लंबित ‘स्कीम ऑफ अरेंजमेंट’ (SOA) की कार्यवाही, IBC की धारा 7 के तहत कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) को रोक सकती है।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि विचाराधीन SOA अत्यधिक प्रक्रियात्मक देरी के कारण “निष्प्रभावी और अप्रभावी” (defunct and inoperative) हो गया था। इसके साथ ही IBC की धारा 238 की सर्वोच्चता को देखते हुए, अदालत ने ‘ओमकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड’ की अपील स्वीकार कर ली और NCLT द्वारा शुरू की गई CIRP को बहाल कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 1999 और 2000 में उत्तरदाता नंबर 2 (कॉर्पोरेट देनदार) को दिए गए ₹10.60 करोड़ के सावधि ऋण (term loans) से शुरू हुआ था। जनवरी 2003 में चूक (default) शुरू हुई। जब तक बैंक के उत्तराधिकारी (अपीलकर्ता) ने NCLT का दरवाजा खटखटाया, तब तक ऋण राशि बढ़कर ₹154 करोड़ से अधिक हो गई थी।
जब बैंक ने IBC के तहत CIRP की मांग की, तो कॉर्पोरेट देनदार ने विरोध करते हुए 2008 से पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित एक ‘स्कीम ऑफ अरेंजमेंट’ का हवाला दिया। हालांकि हाईकोर्ट ने 2019 में इस योजना को मंजूरी दे दी थी, लेकिन अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि यह केवल एक “कागजी व्यवस्था” थी जिसे कभी भी वैधानिक समय सीमा के भीतर लागू नहीं किया गया।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (ओमकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री नीरज किशन कौल ने तर्क दिया कि SOA निष्प्रभावी था क्योंकि उत्तरदाता कंपनी नियम, 1959 के तहत निर्धारित समय के भीतर “सेकंड मोशन” (द्वितीय प्रस्ताव) लाने में विफल रहा। उन्होंने जोर दिया कि धारा 238 के माध्यम से IBC का अधिभावी प्रभाव है। उन्होंने कहा कि IBC कार्यवाही पर रोक लगाने का अर्थ “डगमगाते उद्योग को वापस उसी प्रबंधन के हाथों में सौंपना है जो इसके पतन के लिए जिम्मेदार था।”
उत्तरदाता (अमित चतुर्वेदी और अन्य): उत्तरदाता की ओर से अधिवक्ता सुश्री पूर्ति गुप्ता ने तर्क दिया कि NCLAT का आदेश न्यायिक अनुशासन को बढ़ावा देता है। उन्होंने कहा कि चूंकि कंपनी अधिनियम के तहत लेनदारों की सहमति से एक योजना स्वीकृत की गई थी, इसलिए अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) की नियुक्ति करके प्रबंधन को बेदखल नहीं किया जाना चाहिए।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने कंपनी अधिनियम और IBC के समयबद्ध अधिदेशों की विस्तृत समीक्षा की।
1. प्रक्रियात्मक खामियां और निष्क्रियता: अदालत ने पाया कि SOA के लिए “सेकंड मोशन” लगभग एक साल की देरी से दायर किया गया था, और 2019 में अंतिम मंजूरी प्रारंभिक प्रस्ताव के दस साल बाद आई। इसके अलावा, आदेश को निर्धारित 30 दिनों के भीतर रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज (RoC) के पास जमा नहीं किया गया था। पीठ ने कहा:
“वैधानिक समय सीमा का पालन नहीं किया गया है… SOA, जिसकी शर्तें वर्ष 2008 के अनुसार थीं, अब तक निष्प्रभावी और अप्रभावी हो गई होगी।”
2. कार्यवाही का अनिवार्य हस्तांतरण: अदालत ने देखा कि ‘कंपनी (लंबित कार्यवाही का स्थानांतरण) नियम, 2016’ के तहत, इस मामले को हाईकोर्ट से NCLT में स्थानांतरित किया जाना चाहिए था, क्योंकि नए नियम लागू होने के समय यह आदेश के लिए सुरक्षित नहीं रखा गया था।
3. न्यायिक अनुशासन बनाम वित्तीय शुद्धता: पीठ ने आर्थिक सुधार को रोकने के लिए न्यायिक अनुशासन का हवाला देने पर कड़ी टिप्पणी की:
“न्यायिक अनुशासन, हालांकि न्याय, इक्विटी और निष्पक्षता का आधार है… लेकिन इसका उपयोग उन सुस्त मुकदमेबाजों द्वारा नहीं किया जा सकता है जो सार्वजनिक धन को जोखिम में डालने और अर्थव्यवस्था को बंधक बनाने के उद्देश्य से मुकदमों में लगे हुए हैं।”
4. IBC की प्राथमिकता: ए. नवीनचंद्र स्टील्स (पी) लिमिटेड बनाम श्रेई इक्विपमेंट फाइनेंस लिमिटेड मामले का हवाला देते हुए, अदालत ने दोहराया कि IBC की धारा 7 एक स्वतंत्र कार्यवाही है। पीठ के अनुसार:
“IBC एक विशेष कानून है जो उन कंपनियों के पुनरुद्धार से संबंधित है जो घाटे में हैं, समापन (winding up) का सहारा केवल तभी लिया जाता है जब पुनरुद्धार के सभी प्रयास विफल हो जाते हैं।”
निर्णय
अदालत ने कहा कि NCLAT द्वारा IBC आवेदन को स्थगित रखने के फैसले को बरकरार रखने का “बिल्कुल कोई कारण नहीं” है। सुप्रीम कोर्ट ने NCLT के आदेश को बहाल कर दिया और उस अंतरिम निर्देश को भी रद्द कर दिया जिसमें प्रबंधन को दैनिक कार्यों में शामिल रहने की अनुमति दी गई थी। अब IRP कानून के अनुसार दिवाला समाधान प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का हकदार है।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: ओमकारा एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड बनाम अमित चतुर्वेदी और अन्य
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 11417/2025

