सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक वसीयत को हैंडराइटिंग एक्सपर्ट के पास भेजने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने स्पष्ट किया कि जब मामले में हस्ताक्षर की प्रमाणिकता पर कोई विवाद ही नहीं है, तो ऐसी स्थिति में विशेषज्ञ की राय लेना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुख्य विचारणीय प्रश्न यह था कि क्या किसी वसीयत की फॉरेंसिक जांच तब भी आवश्यक है जब अपीलकर्ता हस्ताक्षरों को स्वीकार करता है, लेकिन वसीयत की वैधता को “स्वतंत्र इच्छा और सहमति” (free will and consent) के अभाव के आधार पर चुनौती देता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला केरल हाईकोर्ट के 30 जून 2023 के उस आदेश के विरुद्ध अपील से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए वसीयत पर स्वर्गीय ई.जे. थॉमस के हस्ताक्षरों की जांच के लिए उसे हैंडराइटिंग एक्सपर्ट के पास भेजने का निर्देश दिया था। मूल मुकदमा (O.S. No. 258/2020) मारडु के एस.आर.ओ. में पंजीकृत एक दस्तावेज़ से संबंधित है।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता एनी थॉमस के वकील ने अदालत को सूचित किया कि उन्हें इस तथ्य पर कोई आपत्ति नहीं है कि वसीयत पर उनके पिता, स्वर्गीय ई.जे. थॉमस के ही हस्ताक्षर हैं।
अदालत का ध्यान अपीलकर्ता द्वारा मूल वाद (Plaint) के पैराग्राफ 4 में दिए गए बयान की ओर आकर्षित किया गया, जिसमें कहा गया था:
“वादी के पिता ई.जे. थॉमस ने अपनी स्वतंत्र इच्छा और सहमति से एस.आर.ओ., मारडु की फाइल पर दर्ज दस्तावेज़ संख्या 89/3/2008 जैसा कोई दस्तावेज़ निष्पादित या निर्मित नहीं किया था।”
उत्तरदाताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वी. चिताम्बरेश ने पक्ष रखा। अदालत ने इन बयानों के आधार पर यह मूल्यांकन किया कि क्या हाईकोर्ट द्वारा विशेषज्ञ की राय लेने का निर्देश अब भी प्रासंगिक है।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने वादपत्र के कथनों और अपीलकर्ता की दलीलों का विश्लेषण करते हुए पाया कि विवाद हस्ताक्षरों के भौतिक कृत्य (physical act) पर नहीं, बल्कि निष्पादन के समय वसीयतकर्ता की मानसिक स्थिति और इच्छाशक्ति पर केंद्रित था।
पीठ ने टिप्पणी की:
“वादपत्र में दिए गए कथनों के आलोक में यह स्पष्ट है कि केवल वसीयतकर्ता की स्वतंत्र इच्छा और सहमति ही विवाद का विषय थी, न कि उनके हस्ताक्षर। अपीलकर्ता के वकील की दलीलों से भी इसकी पुष्टि होती है कि वसीयत पर पिता के हस्ताक्षर विवादित नहीं हैं।”
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि हस्ताक्षरों की स्वीकृति के बावजूद, वसीयत को कानूनी रूप से सिद्ध किया जाना आवश्यक है। पीठ ने उल्लेख किया कि वसीयत को अभी भी “साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68 और भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63(सी) के तहत सिद्ध किया जाना आवश्यक है।”
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील को स्वीकार करते हुए केरल हाईकोर्ट के विवादित आदेश को खारिज कर दिया। अदालत ने निर्देश दिया कि पक्षकार वसीयत के निष्पादन और उसकी वैधता से संबंधित अन्य सभी मुद्दों पर निचली अदालत (Trial Court) के समक्ष अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र हैं।
अदालत ने निष्कर्ष निकाला:
“हाईकोर्ट द्वारा पारित निर्णय/आदेश को तदनुसार रद्द किया जाता है और अपील को स्वीकार किया जाता है। सभी अन्य मुद्दों पर पक्षों को निचली अदालत के समक्ष बहस करने की अनुमति दी जाती है।”
केस विवरण
- केस का नाम: एनी थॉमस बनाम रानी थॉमस एवं अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या /2026 (@SLP (C) No. 4361/2024)
- पीठ: न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन

