सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उस गुजरात हाईकोर्ट के निर्णय की समीक्षा करने पर सहमति जताई, जिसमें यह कहा गया था कि नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) का अध्यक्ष किसी मामले को एक राज्य की बेंच से दूसरे राज्य की बेंच में स्थानांतरित नहीं कर सकता। कोर्ट ने इस विषय पर विस्तार से सुनवाई के लिए 23 फरवरी की तारीख तय की है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि यह मामला NCLT के प्रशासनिक कामकाज से जुड़ा गंभीर कानूनी प्रश्न है और इसका असर देशभर में ट्रिब्यूनल की कार्यप्रणाली पर पड़ेगा।
गुजरात हाईकोर्ट ने हाल ही में एक आदेश में NCLT नियमों के नियम 16(डी) की व्याख्या करते हुए कहा था कि ट्रिब्यूनल अध्यक्ष केवल राज्य के भीतर ही मामले स्थानांतरित कर सकते हैं। अंतरराज्यीय ट्रांसफर की शक्ति उनके पास नहीं है, क्योंकि क्षेत्राधिकार केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया है और उसे बदला नहीं जा सकता।
हाईकोर्ट ने अहमदाबाद से मुंबई ट्रांसफर किए गए आर्सेलर मित्तल से जुड़े मामलों के सभी पांचों आदेशों को रद्द कर दिया और NCLT अध्यक्ष को निर्देश दिया कि वह इन मामलों को किसी भी अहमदाबाद स्थित बेंच को पुनः आवंटित करें, या आवश्यकता होने पर अहमदाबाद में वर्चुअल बेंच गठित कर सुनवाई सुनिश्चित करें।
अहमदाबाद की दोनों NCLT बेंचों ने आर्सेलर मित्तल से जुड़े मामलों की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद दिल्ली स्थित NCLT अध्यक्ष ने प्रशासनिक आदेश द्वारा इन मामलों को मुंबई ट्रांसफर कर दिया।
इस आदेश को आर्सेलर मित्तल ने चुनौती दी और आरोप लगाया कि यह “फोरम शॉपिंग” और “बेंच हंटिंग” का नतीजा है, यानी कुछ पक्ष अपनी सुविधा अनुसार बेंच चुनना चाह रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इस व्याख्या पर “प्रथम दृष्टया संदेह” जताया और व्यावहारिक उदाहरण देते हुए पूछा, “मान लीजिए किसी स्थान पर केवल एक ही बेंच है और उस बेंच का कोई सदस्य हितों के टकराव (conflict of interest) के कारण सुनवाई नहीं कर सकता, तो फिर मामला कैसे चलेगा? क्या ऐसे में उसे दूसरे राज्य की बेंच में नहीं भेजा जा सकता?”
सीजेआई ने पूछा, “हाईकोर्ट को ट्रिब्यूनल की शक्तियों में कटौती करने का क्या अधिकार है?”
जब यह सवाल उठा कि क्या ट्रिब्यूनल के सदस्य किसी धमकी या दबाव के चलते खुद को मामले से अलग कर सकते हैं, तो CJI ने स्पष्ट कहा, “अगर कोई पार्टी ट्रिब्यूनल को धमकी देती है तो उसे छोड़ा नहीं जाना चाहिए। लेकिन अगर वास्तविक हितों का टकराव है तो सदस्य क्यों न खुद को अलग करें?”
इस विवाद का केंद्रबिंदु यह है कि क्या NCLT अध्यक्ष के पास विशेष परिस्थितियों में एक राज्य से दूसरे राज्य में मामला स्थानांतरित करने की शक्ति है, या यह शक्ति केंद्र सरकार द्वारा तय की गई क्षेत्रीय सीमाओं तक ही सीमित है?
सुप्रीम कोर्ट का आने वाला निर्णय इस सवाल को स्पष्ट करेगा और कंपनी कानून तथा दिवालिया मामलों की सुनवाई करने वाले विशेष ट्रिब्यूनलों की प्रशासनिक संरचना को लेकर महत्वपूर्ण दिशा देगा।

