सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में उत्तर प्रदेश राज्य को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को उनके गैर-न्यायिक (Non-judicial) स्टांप पेपर्स के बदले 3,99,100 रुपये की राशि वापस करे, भले ही रिफंड के लिए वैधानिक समय सीमा समाप्त हो चुकी हो।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने धर्मेंद्र शर्मा द्वारा दायर अवमानना याचिका का निपटारा करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि न्यायालय के 6 सितंबर, 2024 के पिछले फैसले का अनुपालन नहीं किया गया है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के धर्मेंद्र शर्मा बनाम आगरा विकास प्राधिकरण (2025) 1 SCC 422 के फैसले से जुड़ा है। उस फैसले में, कोर्ट ने आगरा विकास प्राधिकरण (ADA) को याचिकाकर्ता द्वारा जमा की गई राशि वापस करने और मुआवजे का भुगतान करने का निर्देश दिया था। स्टांप पेपर्स के संबंध में, कोर्ट ने विशेष रूप से आदेश दिया था:
“हम एडीए (ADA) को यह भी आदेश देते हैं कि वह 3,99,100 रुपये मूल्य के गैर-न्यायिक स्टांप याचिकाकर्ता को वापस करे।”
इस आदेश के बाद, याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका (C) संख्या 703-704/2025 दायर की। उनका कहना था कि हालांकि एडीए ने जमा राशि और 15 लाख रुपये के मुआवजे के भुगतान के निर्देशों का पालन किया, लेकिन स्टांप पेपर्स की राशि का प्रभावी रिफंड नहीं हुआ। याचिकाकर्ता ने बताया कि 7 दिसंबर, 2024 को एडीए ने केवल 22 मूल स्टांप पेपर्स डाक के माध्यम से लौटा दिए, जिनकी वैधता अवधि (Validity) तब तक समाप्त हो चुकी थी।
रिफंड आवेदन का खारिज होना
भौतिक स्टांप पेपर्स प्राप्त करने के बाद, याचिकाकर्ता ने सहायक स्टांप आयुक्त, आगरा के समक्ष उनके मूल्य के रिफंड के लिए आवेदन किया। हालांकि, 21 जुलाई, 2025 को सहायक महानिरीक्षक निबंधन (Assistant Inspector General of Registration), आगरा ने इस अनुरोध को खारिज कर दिया।
अधिकारी ने रिफंड के लिए समय सीमा (Limitation Period) समाप्त होने का हवाला दिया। आदेश में नोट किया गया:
“भौतिक गैर-न्यायिक स्टांप पेपर्स के रिफंड के संबंध में, खेदपूर्वक सूचित किया जाता है कि भौतिक गैर-न्यायिक स्टांप पेपर्स को उनकी खरीद की तारीख से अधिकतम आठ वर्षों की अवधि के भीतर ही रिफंड किया जा सकता है।”
विभाग ने स्पष्ट किया कि 20 दिसंबर, 2017 से प्रभावी अधिसूचना के तहत समय सीमा सख्त थी। चूंकि स्टांप खरीदे हुए लगभग 10 वर्ष बीत चुके थे, इसलिए अधिकारियों ने माना कि रिफंड का अधिकार “समय सीमा से बाधित” (Barred by limitation) हो गया है। इसके अलावा, विभाग का तर्क था कि सुप्रीम कोर्ट के सितंबर 2024 के आदेश ने केवल एडीए को स्टांप वापस करने का निर्देश दिया था और निबंधन विभाग (Registration Department) को रिफंड देने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था, जो मूल अपील में पक्षकार भी नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष कार्यवाही
रिफंड खारिज होने से क्षुब्ध होकर याचिकाकर्ता ने अवमानना याचिका दायर की। मामले की “विशिष्ट तथ्यात्मक स्थिति” को देखते हुए, कोर्ट ने 14 अक्टूबर, 2025 के आदेश के जरिए उत्तर प्रदेश राज्य (कलेक्टर, आगरा के माध्यम से) को प्रतिवादी संख्या 2 के रूप में पक्षकार बनाने की अनुमति दी।
राज्य की ओर से दायर हलफनामे में यह प्रस्तुत किया गया कि रिफंड की अस्वीकृति यूपी स्टांप नियम, 1942 (संशोधित) के नियम 218 पर आधारित थी, जो आठ साल की अवधि समाप्त होने के बाद भौतिक स्टांप पेपर्स के रिफंड पर रोक लगाता है।
हालांकि, राज्य ने “स्पष्ट रूप से स्वीकार” किया कि यह कार्रवाई नियमों की “सद्भावनापूर्ण व्याख्या” (Bona fide interpretation) पर की गई थी। प्रतिवादी ने बिना शर्त माफी मांगी और कहा कि राज्य “न्याय के हित में इस न्यायालय द्वारा जारी निर्देशों को लागू करने के लिए कर्तव्यबद्ध है।”
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने मूल अपीलों के निपटारे के बाद उत्पन्न हुए मुद्दों के गुण-दोष (Merits) में जाए बिना, राज्य के अधिकारियों को सीधे निर्देश देकर मामले को सुलझाने का निर्णय लिया।
पीठ ने अपने आदेश में कहा:
“इसलिए, मूल दीवानी अपीलों के निपटारे के बाद बाद में उत्पन्न हुए मुद्दों के गुण-दोष में प्रवेश किए बिना, हम प्रतिवादी संख्या 2 को याचिकाकर्ता को 3,99,100 रुपये की राशि वापस करने का एक साधारण निर्देश (Direction simpliciter) जारी करके वर्तमान अवमानना याचिकाओं का निपटारा करने के इच्छुक हैं…”
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह रिफंड आज से दो महीने की अवधि के भीतर किया जाए, बशर्ते याचिकाकर्ता एडीए से प्राप्त गैर-न्यायिक स्टांप पेपर्स वापस कर दे। इसके साथ ही, आगरा विकास प्राधिकरण के खिलाफ अवमानना याचिकाएं बंद कर दी गईं।
केस डिटेल
- केस टाइटल: धर्मेंद्र शर्मा बनाम एम. अरुणमोझी और अन्य
- केस नंबर: अवमानना याचिका (C) संख्या 703-704/2025 (दीवानी अपील संख्या 2809-2810/2024 में)
- कोरम: जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता

