उत्तर-पूर्व के नागरिकों के साथ नस्लीय भेदभाव के मामलों में ‘आउट ऑफ टर्न’ सुनवाई की तैयारी, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट से नीति बनाने को कहा

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से एक “समग्र नीतिगत निर्णय” (holistic policy decision) लेने का अनुरोध किया है। इस पहल का उद्देश्य उत्तर-पूर्व के लोगों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव से जुड़े संवेदनशील मामलों के निपटारे के लिए एक प्रभावी समय-सीमा सुनिश्चित करना है।

जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और इनकी ‘आउट ऑफ टर्न’ (बारी से हटकर) सुनवाई आवश्यक है।

शीर्ष अदालत उत्तर-पूर्व के राज्यों के नागरिकों के साथ होने वाले नस्लीय भेदभाव के मामलों में समयबद्ध सुनवाई की मांग करने वाली याचिका पर विचार कर रही थी। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि जांच पूरी होने और चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद, इन संवेदनशील मामलों में ट्रायल (मुकदमा) पूरा होने में लंबा समय लगता है। इस देरी के कारण पीड़ितों और उनके परिवारों को समय पर न्याय नहीं मिल पाता।

सुनवाई के दौरान वकील ने 2014 के चर्चित ‘निडो तानिया’ मामले का उल्लेख किया। अरुणाचल प्रदेश के 19 वर्षीय छात्र निडो तानिया की दिल्ली के लाजपत नगर में पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद नस्लीय भेदभाव के खिलाफ देशव्यापी बहस छिड़ गई थी।

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अदालत ने एक अन्य हालिया घटना का भी संज्ञान लिया, जिसमें त्रिपुरा के 24 वर्षीय एमबीए छात्र अंज़ेल चकमा की मृत्यु हो गई थी। 26 दिसंबर, 2025 को देहरादून के सेलाकुई इलाके में हुए एक कथित नस्लीय हमले में चकमा को गंभीर चोटें आई थीं। अगरतला के होली क्रॉस स्कूल से स्नातक करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए देहरादून आए अंज़ेल की उनके छोटे भाई माइकल के सामने ही चाकू मारकर हत्या कर दी गई थी।

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याचिका का निपटारा करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि नस्ल, क्षेत्र, लिंग या जाति के आधार पर व्यक्तियों की पहचान करना या उनके साथ भेदभाव करना “प्रतिगामी मार्ग” (regressive path) पर चलने के समान है।

इससे पहले 18 फरवरी को एक संबंधित सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर-पूर्व और अन्य क्षेत्रों के नागरिकों के खिलाफ हिंसा और भेदभाव को रोकने के लिए दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर विचार करने से इनकार कर दिया था। तब अदालत ने महान्यायवादी (Attorney General) आर. वेंकटरमणी से इस मुद्दे को उचित प्राधिकरण के पास भेजने को कहा था।

हालांकि, वर्तमान मामले में पीठ ने प्रशासनिक पक्ष पर ध्यान केंद्रित किया। जजों ने कहा कि न्याय प्रणाली में विश्वास बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि प्रक्रियात्मक देरी को कम किया जाए और ऐसे मामलों की जल्द सुनवाई की जाए।

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सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक स्तर पर इन विषयों पर विचार करने का आग्रह किया है। उद्देश्य एक ऐसा नीतिगत ढांचा तैयार करना है जो इन संवेदनशील मुकदमों के लिए एक उत्पादक समय-सीमा (productive timeline) तय करे और उन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाने का मार्ग प्रशस्त करे।

इस नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से, शीर्ष अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि नस्लीय हिंसा के शिकार लोगों के मामले अदालतों के बैकलाग में न फंसें।

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