सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि प्रदूषण-मुक्त जल का अधिकार अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है और वर्ष 2021 में नदियों के प्रदूषण की सफाई से संबंधित स्वतः संज्ञान कार्यवाही को बंद करते हुए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की प्रधान पीठ को मामले को पुनः खोलकर निरंतर निगरानी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने कहा कि पर्यावरणीय मामलों में सतत अनुपालन और निगरानी के लिए NGT जैसा विशेषीकृत निकाय अधिक उपयुक्त है।
सुनवाई की शुरुआत में पीठ ने पूछा कि जब NGT पहले से ही इसी विषय पर सुनवाई कर रहा था तो 2021 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा समानांतर स्वतः संज्ञान कार्यवाही शुरू करने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
पीठ ने कहा, “क्या इस न्यायालय के लिए सभी प्रदूषित नदियों को देख पाना संभव है? हम एक-एक करके देख सकते हैं… ऐसे मामलों की बहुलता क्यों हो?”
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने बताया कि यह मुद्दा NGT के समक्ष लंबित है और सुझाव दिया कि अधिकरण को ही कार्यवाही पुनः शुरू करने दी जाए।
इस पर सहमति जताते हुए पीठ ने कहा कि निरंतर अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए NGT को ही निर्देशित किया जाना चाहिए।
“ऐसा प्रतीत होता है कि स्वतः संज्ञान लेने के बजाय इस न्यायालय को NGT से ही अनुपालन सुनिश्चित करने को कहना चाहिए था… NGT अंतिम मंच नहीं है, इस न्यायालय के पास अपीलीय न्यायिक समीक्षा की शक्ति है,” पीठ ने कहा।
सुप्रीम कोर्ट ने NGT की प्रधान पीठ को मामले को पुनः खोलने और अनुपालन की प्रगति पर नियमित स्थिति रिपोर्ट प्राप्त करने का निर्देश दिया।
पीठ ने कहा, “NGT की जिम्मेदारी केवल निर्देश जारी करने तक समाप्त नहीं होती। यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें राज्य सरकारें, केंद्र और निजी संस्थाएँ कानून का पालन करें… अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए स्थिति रिपोर्ट प्राप्त करना आवश्यक है।”
पीठ ने 2021 में NGT द्वारा अपनी कार्यवाही बंद करने पर भी आपत्ति जताई।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “अधिकरण ने 2021 में मामला बंद करके गंभीर गलती की… वे भी इसे बंद करने की जल्दी में थे,” जबकि न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि संभवतः सुप्रीम कोर्ट के संज्ञान लेने के कारण अधिकरण ने कार्यवाही जारी रखने में संकोच किया।
पीठ ने पर्यावरणीय अधिकारों को पुनः स्पष्ट करते हुए कहा:
“स्वच्छ पर्यावरण और स्वच्छ जल के साथ गरिमामय जीवन का अधिकार अनुच्छेद 21 में निहित है।”
जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि CPCB और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों का वैधानिक दायित्व है कि बिना शोधन किए सीवेज को नदियों में छोड़ा न जाए।
‘प्रदूषित नदियों का उपचार’ शीर्षक से स्वतः संज्ञान कार्यवाही जनवरी 2021 में दिल्ली जल बोर्ड की उस याचिका के बाद शुरू हुई थी जिसमें हरियाणा द्वारा यमुना में उच्च अमोनिया युक्त जल छोड़े जाने का आरोप लगाया गया था, जो क्लोरीनीकरण के बाद कैंसरकारी हो जाता है।
तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने यमुना से आगे बढ़कर सभी प्रमुख नदियों के प्रदूषण का मुद्दा उठाया था और केंद्र सहित उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश और दिल्ली को नोटिस जारी किए थे। CPCB को ऐसे नगर निकायों की पहचान करने का निर्देश दिया गया था जहाँ कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट नहीं हैं।
हालाँकि वर्तमान पीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई और यह भी स्पष्ट नहीं है कि यमुना के जल की स्थिति में सुधार हुआ है या नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान कार्यवाही बंद करते हुए NGT को नदियों के प्रदूषण पर पुनः सुनवाई और सतत निगरानी का निर्देश दिया तथा स्पष्ट किया कि पर्यावरणीय अनुपालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी विशेषीकृत अधिकरण के माध्यम से निरंतर रूप से निभाई जानी चाहिए, जबकि सुप्रीम कोर्ट अपीलीय निगरानी बनाए रखेगा।

