सुप्रीम कोर्ट ने नेपाल से भारत में 1.900 किलोग्राम चरस की तस्करी के आरोप में सजा काट रहे एक रूसी नागरिक को बड़ी राहत देते हुए उसे बरी कर दिया है। जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के उन फैसलों को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा तलाशी और जब्ती (Search and Seizure) की प्रक्रिया में गंभीर खामियां थीं और अभियोजन पक्ष आरोपी के खिलाफ मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला भारत-नेपाल सीमा पर एक तलाशी अभियान से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि रूसी नागरिक, डोनियार विल्दानोव, भारतीय सीमा के अंदर पिलर नंबर 517/2 से लगभग 15 मीटर की दूरी पर सशस्त्र सीमा बल (SSB) की टीम द्वारा रोका गया। तलाशी लेने पर उसके बैग से 1.900 किलोग्राम चरस बरामद हुई।
एसएसबी द्वारा मादक पदार्थ का पता लगाने के बाद पुलिस को मौके पर बुलाया गया। इसके बाद आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट (NDPS Act) की धारा 8, 20 और 23 के तहत मामला दर्ज किया गया। ट्रायल कोर्ट ने उसे दोषी ठहराते हुए 10 साल की सजा और 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।
बचाव पक्ष की दलीलें: पासपोर्ट और पालतू कुत्ते की कहानी
सुप्रीम कोर्ट में आरोपी की ओर से पेश वकील आर.पी. लुथरा ने पुलिस की कहानी को पूरी तरह से मनगढ़ंत बताया। बचाव पक्ष की प्रमुख दलीलें इस प्रकार थीं:
- पासपोर्ट का रहस्य: आरोपी के पासपोर्ट पर नेपाल से एग्जिट (बाहर निकलने) की तारीख 5 नवंबर, 2016 दर्ज थी, जबकि पुलिस ने उसकी गिरफ्तारी 6 नवंबर, 2016 की सुबह 7:00 बजे दिखाई। बचाव पक्ष का कहना था कि उसे पुलिस ने एक दिन पहले ही ‘नो मैंस लैंड’ (No Man’s Land) से हिरासत में ले लिया था और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के नियम से बचने के लिए गिरफ्तारी का समय बदला गया।
- पालतू कुत्ता: आरोपी का कहना था कि उसके पास एक पालतू कुत्ता था। पुलिस ने उससे रिश्वत मांगी और जब उसने मना किया, तो उसे झूठे मामले में फंसा दिया गया और उसका कुत्ता भी छीन लिया गया।
- प्लांटेड रिकवरी: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि चरस कभी भी आरोपी के पास से बरामद नहीं हुई थी, बल्कि उसे प्लांट किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण: पुलिस की जांच पर गंभीर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने गवाहों (PW1 से PW3) के बयानों और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों का बारीकी से विश्लेषण किया और पुलिस की जांच में कई “चौंकाने वाली विसंगतियां” पाईं।
1. तलाशी प्रक्रिया में उल्लंघन: कोर्ट ने पाया कि एसएसबी टीम ने आरोपी के अधिकारों की जानकारी देने से पहले ही उसके बैग की तलाशी ले ली थी और मादक पदार्थ का पता लगा लिया था। कोर्ट ने कहा, “घटनाक्रम से यह स्पष्ट है कि बैग की तलाशी पहले ली गई और मादक पदार्थ का पता लगाया गया। सहमति पत्र (Consent Letter) पर हस्ताक्षर और कबूलनामा बाद की बात है।” कोर्ट ने माना कि यह एनडीपीएस एक्ट के अनिवार्य प्रावधानों का उल्लंघन है।
2. पासपोर्ट पर एंट्री स्टैम्प न होना: कोर्ट ने पासपोर्ट की विसंगति को गंभीर माना। पासपोर्ट पर 5 नवंबर को नेपाल छोड़ने की मुहर थी, लेकिन 6 नवंबर को भारत में गिरफ्तारी दिखाई गई। सबसे अहम बात यह थी कि पासपोर्ट पर भारत में प्रवेश (Entry) का कोई स्टैम्प नहीं था, जबकि पुलिस का दावा था कि गिरफ्तारी भारतीय सीमा के भीतर हुई। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अगर उसे इमिग्रेशन काउंटर तक पहुंचने से पहले गिरफ्तार किया गया था, तो भी पुलिस का कर्तव्य था कि उसकी एंट्री दर्ज कराई जाए।
3. कुत्ते का जिक्र न होना: जांच अधिकारी (PW1) ने स्वीकार किया कि आरोपी के साथ एक कुत्ता था, लेकिन जब्ती के दस्तावेज (Mahazar) में उस कुत्ते का कोई जिक्र नहीं था। कोर्ट ने कहा कि यह चूक आरोपी की उस कहानी को बल देती है कि पुलिस की नजर उसके कुत्ते पर थी और उसे झूठा फंसाया गया।
4. बैग का ही जिक्र नहीं: हैरानी की बात यह रही कि रिकवरी मेमो (Mahazar) में उस बैग का ही जिक्र नहीं था जिसमें कथित तौर पर चरस लाई गई थी।
कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सबूतों में पाई गई विसंगतियां मामूली नहीं हैं, बल्कि इतनी गंभीर हैं कि वे आरोपी की संलिप्तता पर “उचित संदेह” (Reasonable Doubt) पैदा करती हैं।
पीठ ने अपने फैसले में कहा, “हम तलाशी और जब्ती को अनिवार्य प्रावधानों के अनुरूप नहीं पाते हैं, इसलिए आरोपी के खिलाफ लगाए गए मामले की नींव ही ढह जाती है।”
अदालत ने अपील को स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द कर दिया और आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही, उसका मूल पासपोर्ट वापस करने का निर्देश भी दिया गया।
केस डीटेल्स (Case Details):
- केस टाइटल: डोनियार विल्दानोव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2026 [@ स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 9460/2025]
- कोरम: जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन

