सबरीमला मंदिर स्वर्ण गबन मामला: एसआईटी ने केरल हाईकोर्ट से तंत्री कंदरारु राजीवारु की जमानत रद्द करने की मांग की

सबरीमला मंदिर के पवित्र आभूषणों और स्वर्ण-आवरण वाले अवशेषों के कथित गबन की जांच कर रही विशेष जांच टीम (SIT) ने केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। एसआईटी ने मंदिर के तंत्री (मुख्य पुजारी) कंदरारु राजीवारु को दी गई जमानत को चुनौती देते हुए कहा है कि निचली अदालत द्वारा दिया गया यह आदेश “न्याय का गंभीर हनन” है और जांच में सामने आए महत्वपूर्ण साक्ष्यों को नजरअंदाज करता है।

यह याचिका उस आदेश के खिलाफ दायर की गई है, जिसमें कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी कमिश्नर एवं विशेष न्यायाधीश (विजिलेंस), कोल्लम ने 18 फरवरी को राजीवारु को जमानत प्रदान की थी। जमानत देते समय अदालत ने कहा था कि मंदिर के स्वर्ण आभूषणों के कथित नुकसान से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ “जरा भी साक्ष्य” नहीं है।

एसआईटी सबरीमला मंदिर के द्वारपालक (द्वारपाल देवता) की प्रतिमाओं और श्रीकोविल (गर्भगृह) के द्वारों पर लगे स्वर्ण आवरण के कथित दुरुपयोग की जांच कर रही है।

इस मामले में राजीवारु को द्वारपालक प्रकरण में 16वां आरोपी और श्रीकोविल प्रकरण में 13वां आरोपी बनाया गया है। विजिलेंस अदालत ने दोनों मामलों में उन्हें जमानत दे दी थी।

विशेष जांच टीम ने अतिरिक्त लोक अभियोजक पी. नारायणन के माध्यम से केरल उच्च न्यायालय में दायर याचिका में द्वारपालक मामले में दी गई जमानत रद्द करने की मांग की है। अभियोजन पक्ष ने यह भी संकेत दिया है कि श्रीकोविल मामले में दी गई जमानत को भी जल्द ही चुनौती दी जाएगी।

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एसआईटी ने अपनी याचिका में न केवल जमानत रद्द करने की मांग की है, बल्कि जांच के संबंध में विजिलेंस अदालत द्वारा की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को भी हटाने का अनुरोध किया है। जांच एजेंसी का कहना है कि ऐसी टिप्पणियां चल रही जांच को प्रभावित कर सकती हैं।

याचिका में कहा गया है कि विजिलेंस अदालत ने जमानत देते समय उपलब्ध साक्ष्यों, घटनाक्रम की परिस्थितियों, आरोपी की भूमिका और अभियोजन द्वारा उठाए गए गंभीर आपत्तियों को नजरअंदाज किया।

एसआईटी ने अदालत से कहा कि आदेश में की गई “अनावश्यक और अनुचित टिप्पणियां” जांच प्रक्रिया में हस्तक्षेप का कारण बन सकती हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि जमानत देने का आदेश “गंभीर कानूनी त्रुटियों से ग्रस्त है और जांच में एकत्रित महत्वपूर्ण साक्ष्यों की अनदेखी करता है।”

जांच एजेंसी के अनुसार, संबंधित समय पर राजीवारु मंदिर में धार्मिक अनुष्ठानों और पवित्रता से जुड़े मामलों में सर्वोच्च अधिकार रखते थे। जांच में सामने आया है कि उन्होंने 18 जून 2019 को एक टाइप किया हुआ मत प्रस्तुत किया था, जिसमें मंदिर के स्वर्ण-आवरण वाले अवशेषों को दोबारा प्लेटिंग कराने के प्रस्ताव से सहमति जताई गई थी। यह प्रस्ताव मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी द्वारा दिया गया था।

एसआईटी का कहना है कि इसी मत के आधार पर त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने उक्त अवशेषों को पोट्टी को सौंपने का निर्णय लिया।

जांच में यह भी सामने आया है कि 19 जुलाई 2019 को जब पहला महाजर तैयार किया गया, उस समय राजीवारु सबरीमला के सन्निधानम में मौजूद थे। उन्होंने उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए, जिसमें स्वर्ण-आवरण वाले अवशेषों को केवल तांबे की प्लेट बताया गया था, जिससे उन्हें मंदिर परिसर से बाहर ले जाना संभव हो गया।

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एसआईटी का दावा है कि राजीवारु को यह जानकारी थी कि वर्ष 1998 में सन्निधानम में ही इन अवशेषों पर स्वर्ण आवरण चढ़ाया गया था। इसके बावजूद उन्होंने दस्तावेज में की गई कथित गलत जानकारी पर कोई आपत्ति नहीं जताई और न ही अधिकारियों को इसकी जानकारी दी।

याचिका में आगे कहा गया है कि 20 जुलाई 2019 को तैयार किए गए दूसरे महाजर पर राजीवारु ने हस्ताक्षर नहीं किए, जबकि वह उस समय भी सन्निधानम में मौजूद थे। एसआईटी के अनुसार ऐसा करके उन्होंने सीधे तौर पर अपनी भूमिका से दूरी बनाने की कोशिश की, जबकि अवशेषों को मंदिर से बाहर ले जाने की प्रक्रिया को जारी रहने दिया।

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जांच एजेंसी का कहना है कि गवाहों के बयान, दस्तावेजी साक्ष्य और अन्य रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि यह केवल निष्क्रियता नहीं बल्कि सक्रिय सहयोग और मिलीभगत का मामला है।

एसआईटी ने यह भी दावा किया कि मुख्य आरोपी उन्नीकृष्णन पोट्टी और अन्य आरोपियों के लिए कथित गबन को अंजाम देना संभव नहीं होता यदि तंत्री का समर्थन न मिलता। जांच एजेंसी के अनुसार, मंदिर में उनके प्रभाव और पद के कारण अन्य आरोपियों को अपराध करने में मदद मिली।

हालांकि, जमानत देते समय विजिलेंस अदालत ने कहा था कि आपराधिक साजिश का आरोप इस कारण कमजोर पड़ता है क्योंकि राजीवारु ने 20 जुलाई 2019 के महत्वपूर्ण महाजर पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।

अदालत ने यह भी कहा था कि 19 जुलाई 2019 के महाजर पर हस्ताक्षर करना मात्र, अन्य किसी आपराधिक परिस्थिति के अभाव में, इस चरण पर आरोपी को मामले में फंसाने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब वह दस्तावेज देवस्वोम बोर्ड के औपचारिक निर्णय के बाद तैयार किया गया था।

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