डिजिटल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट से क्या कमजोर हो रहा है RTI? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से मांगा जवाब

क्या नया डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट, 2005 के सूचना के अधिकार (RTI) कानून की पारदर्शिता को खत्म कर रहा है? इस गंभीर सवाल पर सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका (PIL) में आरोप लगाया गया है कि नए डेटा कानून के कुछ प्रावधान RTI अधिनियम के तहत मिलने वाली पारदर्शिता को काफी हद तक कम कर देते हैं।

चीफ जस्टिस सूर्या कांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने इस मामले में कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय (DoPT) तथा कानून एवं न्याय मंत्रालय से जवाब मांगा है। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ वकील श्याम दीवान की दलीलों को सुनने के बाद कोर्ट ने यह कदम उठाया। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने राजस्थान सरकार को भी इस कार्यवाही में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है।

इस कानूनी चुनौती के केंद्र में DPDP एक्ट, 2023 की धारा 44(3) है। यह प्रावधान RTI अधिनियम की मूल धारा 8(1)(j) की जगह लेता है। पहले की व्यवस्था के तहत, व्यक्तिगत जानकारी को केवल तभी रोका जा सकता था जब उसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या हित से कोई संबंध न हो, या उससे निजता का अनावश्यक उल्लंघन होता हो।

मजदूर किसान शक्ति संगठन (MKSS) और प्रसिद्ध कार्यकर्ता अरुणा रॉय, निखिल डे व शंकर सिंह रावत द्वारा दायर इस याचिका में तर्क दिया गया है कि नए संशोधन ने व्यक्तिगत जानकारी के नाम पर एक ‘कवच’ तैयार कर दिया है। इससे सोशल ऑडिट और सरकारी जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया बाधित हो रही है। याचिका के अनुसार, यह संशोधन संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 19(1)(a) (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करता है।

याचिकाकर्ताओं ने चिंता जताई है कि इस कानून से ‘प्रोएक्टिव डिस्क्लोजर’ यानी सरकार द्वारा खुद जानकारी साझा करने की व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। RTI की धारा 44 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि लाभार्थियों का डेटा, मस्टर रोल और सोशल ऑडिट रिकॉर्ड जनता के लिए उपलब्ध रहें।

याचिका में राजस्थान के ‘जन सूचना पोर्टल’ जैसे जवाबदेही तंत्रों का हवाला दिया गया है। याचिका में मांग की गई है कि अधिकारियों को इन पोर्टलों के माध्यम से मिलने वाली जानकारी को रोकने या सीमित करने से मना किया जाए, क्योंकि ये गरीबों और वंचितों के अधिकारों की रक्षा के लिए अनिवार्य हैं।

संशोधन को रद्द करने के अलावा, याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि:

  • RTI अधिनियम की मूल धारा 8(1)(j) को उसके प्रावधानों के साथ 13 नवंबर, 2025 से पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospective effect) के साथ बहाल किया जाए।
  • यह घोषित किया जाए कि राज्य नागरिकों के अधिकारों को प्रभावित करने वाले डेटा को सार्वजनिक करने और पारदर्शिता तंत्र को चालू रखने के लिए संवैधानिक रूप से बाध्य है।
READ ALSO  मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को जेलों में बंद कैदियों को दी जा रही कानूनी सहायता पर रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की व्यापकता को देखते हुए केंद्र और संबंधित पक्षों से अपना पक्ष रखने को कहा है।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles