आरक्षित वर्ग के मेधावी उम्मीदवार सामान्य श्रेणी की सीटों के हकदार: सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि आरक्षित वर्ग (SC/ST/OBC) का कोई उम्मीदवार अपनी योग्यता के बल पर सामान्य श्रेणी (Unreserved Category) के उम्मीदवारों से अधिक अंक प्राप्त करता है, तो उसे सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार के रूप में माना जाएगा और अनारक्षित पद पर समायोजित किया जाएगा। कोर्ट ने कहा कि “ओपन कैटेगरी (खुली श्रेणी) सभी के लिए खुली है,” और इसमें शामिल होने के लिए केवल योग्यता ही एकमात्र मानदंड है, चाहे उम्मीदवार किसी भी सामाजिक वर्ग से आता हो।

जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने केरल हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AAI) को एक ऐसे सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्देश दिया गया था, जो चयन सूची (मेरिट लिस्ट) में स्थान बनाने में विफल रहा था। हाईकोर्ट ने यह आदेश इस आधार पर दिया था कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को अनारक्षित सूची में शामिल करना गलत था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (अपीलकर्ता) द्वारा वर्ष 2013 में जूनियर असिस्टेंट (फायर सर्विस) के पद के लिए की गई भर्ती से जुड़ा है। कुल 245 पद विज्ञापित किए गए थे, जिनका विवरण इस प्रकार था:

  • अनारक्षित (UR): 122
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): 78
  • अनुसूचित जाति (SC): 22
  • अनुसूचित जनजाति (ST): 23 (जिसमें 1 बैकलॉग रिक्ति शामिल थी)

चयन प्रक्रिया में लिखित परीक्षा, शारीरिक माप परीक्षण, ड्राइविंग टेस्ट, शारीरिक सहनशक्ति परीक्षण और साक्षात्कार शामिल थे। प्रक्रिया पूरी होने के बाद 158 उम्मीदवारों को नियुक्त किया गया।

प्रथम प्रतिवादी (Respondent), शाम कृष्णा बी., जो एक सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार थे, ने चयन प्रक्रिया में भाग लिया और कुल 128.08 अंक प्राप्त किए। हालांकि, उनका नाम अंतिम चयन सूची में शामिल नहीं था। सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI), 2005 के तहत प्राप्त जानकारी से पता चला कि अनारक्षित श्रेणी के तहत 122 उम्मीदवारों का चयन किया गया था, लेकिन प्रतिवादी का नाम अनारक्षित श्रेणी के गैर-चयनित उम्मीदवारों की सूची में 10वें स्थान पर था।

प्रतिवादी ने केरल हाईकोर्ट में चयन को चुनौती दी और तर्क दिया कि आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को गलत तरीके से अनारक्षित सूची में शामिल किया गया है, जिससे उन्हें अवसर से वंचित होना पड़ा।

हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याचिका स्वीकार करते हुए AAI को आरक्षण रोस्टर के अनुसार रैंक सूची को पुनर्व्यवस्थित करने और प्रतिवादी को नियुक्त करने का निर्देश दिया। इस निर्णय को 19 फरवरी, 2020 को हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी बरकरार रखा। हाईकोर्ट का मानना था कि रोस्टर का सही ढंग से पालन नहीं किया गया था।

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सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दलीलें

एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने कानून की गलत व्याख्या की है। उन्होंने कहा:

  • यह एक स्थापित कानूनी सिद्धांत है कि यदि कोई आरक्षित वर्ग का उम्मीदवार अपनी योग्यता के आधार पर सामान्य श्रेणी की मेरिट सूची में स्थान बनाता है, तो उसे सामान्य श्रेणी का उम्मीदवार माना जाना चाहिए और अनारक्षित पद पर समायोजित किया जाना चाहिए।
  • आरक्षण रोस्टर एक प्रशासनिक उपकरण है जिसका उपयोग कैडर संरचना को रिकॉर्ड करने और भविष्य की भर्तियों के लिए रिक्तियों की पहचान करने के लिए किया जाता है, न कि मेधावी उम्मीदवारों को हटाने के लिए।
  • भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह से भर्ती नियमों और आरक्षण रोस्टर के अनुसार आयोजित की गई थी।

दूसरी ओर, प्रतिवादी के वकील ने तर्क दिया कि:

  • अनारक्षित पदों को विशेष रूप से अनारक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों द्वारा ही भरा जाना चाहिए था।
  • AAI ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के 2 जुलाई, 1997 के कार्यालय ज्ञापन में निर्धारित मॉडल रोस्टर का पालन नहीं किया।
  • आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों को सामान्य श्रेणी की रिक्तियों में स्थानांतरित नहीं किया जाना चाहिए था, विशेषकर जब आरक्षित पद खाली रह गए हों।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के DoPT कार्यालय ज्ञापन और मेरिट सूची तैयार करने की विधि का परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि केरल हाईकोर्ट यह समझने में विफल रहा कि “आरक्षण रोस्टर केवल चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही तस्वीर में आता है।”

पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने स्पष्ट किया:

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“आरक्षण रोस्टर का उपयोग भर्ती प्रक्रिया के दौरान चयन करने के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि केवल भर्ती के लिए विज्ञापन हेतु रिक्त पदों की संख्या को परिभाषित करने के लिए किया जाता है। हालांकि, चूंकि आरक्षण रजिस्टर या रोस्टर भर्ती के लिए उपलब्ध कोटे को परिभाषित करता है, इसका उपयोग यह तय करने के लिए किया जा सकता है कि कौन चयन का हकदार है और कौन नहीं, इस आधार पर कि संबंधित श्रेणी का कोटा उस श्रेणी में उपलब्ध अधिक मेधावी उम्मीदवारों द्वारा भरा गया है।”

कोर्ट ने अपने हालिया फैसले राजस्थान हाईकोर्ट और अन्य बनाम रजत यादव और अन्य (सिविल अपील संख्या 14112 वर्ष 2024) पर भरोसा जताया, जिसमें “माइग्रेशन” (Migration) या “मेरिट इंड्यूस्ड शिफ्ट” की अवधारणा पर विस्तार से चर्चा की गई थी।

रजत यादव मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि “ओपन कैटेगरी” कोई कोटा नहीं है, बल्कि यह सभी के लिए उपलब्ध है। निर्णय में कहा गया:

“‘ओपन कैटेगरी सभी के लिए खुली है, और किसी उम्मीदवार को इसमें दिखाए जाने की एकमात्र शर्त योग्यता (मेरिट) है, चाहे उसे किसी भी प्रकार के आरक्षण का लाभ मिल रहा हो या नहीं’।”

कोर्ट ने इस धारणा को खारिज कर दिया कि एक मेधावी आरक्षित उम्मीदवार को अनारक्षित उम्मीदवार के रूप में मानना सख्त अर्थों में “माइग्रेशन” है। इसके बजाय, यह योग्यता की मान्यता है:

“हम, हालांकि, सावधानी का एक नोट देते हैं कि हमारे उपरोक्त अवलोकन विचाराधीन चयन प्रक्रिया के प्रकार से संबंधित हैं… योग्यता परीक्षा में उनके प्रदर्शन के आधार पर उम्मीदवारों की स्क्रीनिंग/शॉर्ट-लिस्टिंग के समय और उसके बाद भी, शुरू में आरक्षित उम्मीदवारों सहित सभी इच्छुक उम्मीदवारों को सामान्य/ओपन उम्मीदवारों के रूप में देखा जाना चाहिए।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“यदि ऐसा कोई उम्मीदवार, इस तथ्य के बावजूद कि वह आरक्षित श्रेणी से संबंधित है, परीक्षा के दूसरे चरण में भी उत्कृष्टता बनाए रखता है… तो उसे किसी भी श्रेणी से संबंधित उम्मीदवार के रूप में माना जाना बंद हो जाएगा और वह एक ऐसे रिक्त पद पर नियुक्ति का हकदार होगा जिसे सामान्य/ओपन के रूप में वर्गीकृत किया गया है।”

इन सिद्धांतों को वर्तमान मामले में लागू करते हुए, कोर्ट ने पाया कि AAI द्वारा आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को अनारक्षित सूची में “माइग्रेट” करना उचित था क्योंकि उन्होंने बिना किसी रियायत या छूट का लाभ उठाए सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों से अधिक अंक प्राप्त किए थे।

“अब यह कानून का एक स्थापित प्रस्ताव है कि आरक्षित श्रेणी का कोई उम्मीदवार जिसने सामान्य श्रेणी के लिए कट ऑफ अंकों से अधिक अंक प्राप्त किए हैं, उसे खुले या अनारक्षित रिक्त पद के लिए योग्य माना जाना चाहिए।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि अनारक्षित श्रेणी के लिए अधिसूचित सभी 122 रिक्तियों को सख्ती से योग्यता के आधार पर भरा गया था। नतीजतन, प्रतिवादी का दावा, जिसने अंतिम चयनित अनारक्षित उम्मीदवार से कम अंक प्राप्त किए थे, अस्थिर था।

कोर्ट ने कहा:

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“विद्वान एकल न्यायाधीश के साथ-साथ केरल हाईकोर्ट की खंडपीठ द्वारा दिए गए निर्णय को रद्द किया जाना चाहिए और तदनुसार रद्द किया जाता है। प्रतिवादी संख्या 1 यानी शाम कृष्णा बी. या अनारक्षित श्रेणी से संबंधित किसी अन्य व्यक्ति की नियुक्ति का निर्देश देने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि अनारक्षित श्रेणी के तहत अधिसूचित सभी रिक्तियों को अपीलकर्ता प्राधिकरण द्वारा तैयार मेरिट सूची के अनुसार सख्ती से भरा गया है।”

सुप्रीम कोर्ट ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया। इसके साथ ही, एक अन्य उम्मीदवार द्वारा दायर अपील (SLP (C) No. 12937 of 2021) को खारिज कर दिया गया क्योंकि उम्मीदवार ने समय पर चयन को चुनौती नहीं दी थी।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया व अन्य बनाम शाम कृष्णा बी व अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील (SLP (Civil) No. 10686 of 2020 से उद्भूत)
  • कोरम: जस्टिस एम.एम. सुंदरेश और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा

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