सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड अपने साथ वैधता और विश्वसनीयता की एक मजबूत धारणा (Presumption) लेकर चलता है। अदालतों को ऐसे दस्तावेजों को “हल्के में या लापरवाही से” केवल “फर्जी” (Sham) घोषित नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने जोर देकर कहा कि इस धारणा को गलत साबित करने का भारी बोझ चुनौती देने वाले पक्ष पर होता है, जिसके लिए “चालाकी से तैयार की गई ड्राफ्टिंग” या अस्पष्ट आरोपों के बजाय ठोस सबूतों की आवश्यकता होती है।
22 जनवरी, 2026 को दिए गए एक फैसले में, जस्टिस मनमोहन और जस्टिस राजेश बिंदल की पीठ ने मूल प्रतिवादी हेमलता के कानूनी प्रतिनिधियों द्वारा दायर अपील को स्वीकार कर लिया। शीर्ष अदालत ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने 1971 के एक रजिस्टर्ड सेल डीड और किराया समझौते को नाममात्र और लागू न करने योग्य (not intended to be acted upon) घोषित किया था।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि किसी रजिस्टर्ड सेल डीड को “फर्जी” लेनदेन घोषित करने के लिए किस स्तर के प्रमाण की आवश्यकता होती है और क्या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 92 के तहत पंजीकृत दस्तावेज की लिखित शर्तों के विपरीत मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य हैं।
शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को पलटते हुए प्रथम अपीलीय न्यायालय के आदेश को बहाल कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप प्रतिवादी-वादी (तुकाराम) द्वारा दायर मुकदमा खारिज हो गया। कोर्ट ने माना कि विवादित लेनदेन एक “सीधी बिक्री” (Outright Sale) थी, न कि सशर्त बिक्री द्वारा बंधक (Mortgage by Conditional Sale)।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद 12 नवंबर, 1971 का है, जब प्रतिवादी-वादी तुकाराम (अब मृत) ने अपीलकर्ता-प्रतिवादी नंबर 1, हेमलता के पक्ष में बीदर स्थित एक घर के लिए 10,000 रुपये के प्रतिफल (Consideration) के बदले एक रजिस्टर्ड सेल डीड निष्पादित की थी। उसी दिन, एक पंजीकृत किराया समझौता भी किया गया था, जिसके तहत तुकाराम उस घर में किराएदार बन गए थे।
इससे पहले, 1966 में तुकाराम ने इस संपत्ति को सदानंद गर्जे के पास गिरवी रखा था। हेमलता को संपत्ति बेचने का उद्देश्य इस पुराने गिरवी को छुड़ाना था।
14 महीने तक किराया देने के बाद, तुकाराम ने भुगतान बंद कर दिया। 1974 में, अपीलकर्ताओं ने बकाया किराया और कब्जा वापस लेने की मांग करते हुए कानूनी नोटिस जारी किया। 5 अक्टूबर, 1974 को अपने जवाब में, तुकाराम ने चूक स्वीकार की और भुगतान के लिए समय मांगा। हालांकि, जब 1975 में बेदखली की कार्यवाही शुरू हुई, तो तुकाराम ने 1977 में एक दीवानी मुकदमा (O.S. No. 39 of 1977) दायर किया। इसमें उन्होंने घोषणा की मांग की कि सेल डीड और किराया समझौता “नाममात्र, फर्जी और लागू न करने योग्य” थे, और यह आरोप लगाया कि यह लेनदेन वास्तव में एक ऋण/बंधक था।
ट्रायल कोर्ट ने तुकाराम के पक्ष में फैसला सुनाया। हालांकि, 1999 में बीदर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश ने इस फैसले को पलट दिया और सेल डीड को वास्तविक माना। दूसरी अपील में, कर्नाटक हाईकोर्ट ने गंगाबाई बनाम छबुबाई मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए ट्रायल कोर्ट के डिक्री को बहाल कर दिया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं (हेमलता पक्ष) के वकील ने तर्क दिया कि रजिस्टर्ड सेल डीड की शर्तें स्पष्ट और संदिग्धता से परे थीं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 92 का हवाला देते हुए, उन्होंने कहा कि लिखित अनुबंध की शर्तों को बदलने के लिए बाहरी मौखिक साक्ष्य स्वीकार नहीं किए जा सकते। उन्होंने यह भी बताया कि प्रतिवादी ने 1974 में कानूनी नोटिस के जवाब में किराएदार के रूप में अपनी स्थिति स्वीकार की थी और उस समय दस्तावेज के “फर्जी” होने की कोई दलील नहीं दी थी।
प्रतिवादियों (तुकाराम पक्ष) के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि इस लेनदेन का उद्देश्य कभी भी बिक्री नहीं था, बल्कि यह ऋण के लिए सुरक्षा के रूप में था। उन्होंने दावा किया कि संपत्ति का मूल्य 10,000 रुपये से कहीं अधिक था और कब्जा प्रतिवादी के पास ही रहा। उन्होंने गंगाबाई के फैसले का सहारा लेते हुए तर्क दिया कि यह दिखाने के लिए मौखिक साक्ष्य स्वीकार्य हैं कि दस्तावेज का उद्देश्य कभी भी लागू किया जाना नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों और पक्षों के आचरण की कड़ाई से जांच की।
1. पंजीकृत दस्तावेजों की वैधता की धारणा: फैसला लिखते हुए, जस्टिस मनमोहन ने टिप्पणी की:
“यह कानून की एक तय स्थिति है कि एक रजिस्टर्ड सेल डीड अपने साथ वैधता और असलियत की एक मजबूत धारणा लेकर चलती है। पंजीकरण केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि एक गंभीर कृत्य है जो दस्तावेज को उच्च स्तर की पवित्रता प्रदान करता है। नतीजतन, अदालत को पंजीकृत दस्तावेज को हल्के में या लापरवाही से ‘फर्जी’ (Sham) घोषित नहीं करना चाहिए।”
2. दलीलों का सख्त मानक: अदालत ने अस्पष्ट आरोपों के आधार पर पंजीकृत दस्तावेजों को चुनौती देने की प्रथा की आलोचना की।
“जो व्यक्ति यह आरोप लगाता है कि एक पंजीकृत डीड फर्जी है, उसे अपनी दलीलों में स्पष्ट, ठोस और विश्वसनीय कथन देने होंगे… केवल कारण का भ्रम पैदा करने वाली चालाकी से तैयार की गई ड्राफ्टिंग (Clever Drafting) की अनुमति नहीं दी जाएगी।”
3. साक्ष्य अधिनियम की धारा 92: पीठ ने इस मामले को गंगाबाई मामले से अलग माना। कोर्ट ने कहा कि तुकाराम एक “समझदार व्यक्ति” थे, जिन्होंने पहले भी बंधक और बिक्री दोनों निष्पादित की थीं, इसलिए वे दोनों के बीच का अंतर समझते थे। चूंकि सेल डीड की शर्तें स्पष्ट थीं, इसलिए इरादा सीधी बिक्री का ही था।
4. सशर्त बिक्री द्वारा बंधक नहीं: कोर्ट ने नोट किया कि संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882 की धारा 58(c) के तहत सशर्त बिक्री द्वारा बंधक मानने के लिए, पुनः खरीद (Reconveyance) की शर्त उसी दस्तावेज में होनी चाहिए। वर्तमान सेल डीड में ऐसी कोई शर्त नहीं थी।
“नतीजतन, इस न्यायालय का मत है कि 12 नवंबर 1971 की सेल डीड सशर्त बिक्री द्वारा बंधक (Mortgage by Conditional Sale) नहीं है।”
5. प्रतिवादी का आचरण: कोर्ट ने इस बात पर प्रकाश डाला कि तुकाराम ने एक साल से अधिक समय तक किराया दिया था और 1974 के नोटिस के जवाब में अपनी देनदारी स्वीकार की थी। 1977 में दायर मुकदमे को बेदखली की कार्यवाही के खिलाफ एक “पलटवार” (Counterblast) करार दिया गया।
6. प्रणालीगत सुधार का सुझाव (Systemic Reforms): जालसाजी या निष्पादन से इनकार करने वाले मुकदमों को रोकने के लिए, कोर्ट ने प्रौद्योगिकी के उपयोग का सुझाव दिया।
“विदा होने से पहले, यह न्यायालय केंद्र और राज्य सरकारों को सुझाव देना आवश्यक समझता है कि सुरक्षित, छेड़छाड़-रोधी तकनीकों जैसे कि ब्लॉकचेन (Blockchain) का उपयोग करके पंजीकृत दस्तावेजों और भूमि रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण की तत्काल आवश्यकता है।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली, हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और प्रथम अपीलीय न्यायालय के फैसले को बहाल कर दिया। प्रतिवादी-वादी द्वारा दायर मुकदमा लागत (Costs) के साथ खारिज कर दिया गया।
केस डिटेल्स:
- केस का नाम: हेमलता (मृत) द्वारा कानूनी प्रतिनिधि बनाम तुकाराम (मृत) द्वारा कानूनी प्रतिनिधि व अन्य
- केस संख्या: सिविल अपील संख्या 6640 ऑफ 2010
- बेंच: जस्टिस मनमोहन और जस्टिस राजेश बिंदल

