राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें गवाहों की अनुपस्थिति का हवाला देते हुए एक मुस्लिम दंपत्ति के आपसी सहमति से हुए तलाक को मान्यता देने से इनकार कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुन्नी मुस्लिम कानून के तहत तलाक के लिए गवाहों की मौजूदगी अनिवार्य नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने यह भी माना कि ‘मुबारत’ (आपसी सहमति से तलाक) ‘डिस्सॉल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939’ के तहत विवाह विच्छेद का एक वैध आधार है।
जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित की खंडपीठ ने पत्नी द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए टिप्पणी की कि यह मामला “मियां बीवी राजी, नहीं मान रहा काजी” (पति-पत्नी सहमत हैं, लेकिन न्यायाधीश नहीं मान रहे) वाली कहावत का सटीक उदाहरण है।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता पत्नी और प्रतिवादी पति, जो दोनों सुन्नी मुस्लिम हैं, का निकाह 27 फरवरी, 2022 को मेड़ता सिटी में हुआ था। इस शादी से उनकी कोई संतान नहीं थी। विचारों में मतभेद और स्वभाव के न मिलने के कारण दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गए। विवाह के दौरान ही पति ने तीन अलग-अलग अवसरों पर—8 जून, 8 जुलाई और 8 अगस्त, 2024 को—तीन अलग-अलग ‘तुहर’ (मासिक धर्म के बीच की पवित्रता की अवधि) में तलाक की घोषणा की। पत्नी ने इन घोषणाओं को स्वीकार कर लिया।
इसके बाद, 20 अगस्त, 2024 को दोनों पक्षों ने 500 रुपये के गैर-न्यायिक स्टाम्प पेपर पर आपसी सहमति से तलाक का लिखित समझौता (‘मुबारत’) निष्पादित किया। पत्नी ने ‘डिस्सॉल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939’ की धारा 2(viii)(a) के तहत अपनी वैवाहिक स्थिति की घोषणा के लिए मेड़ता की फैमिली कोर्ट में वाद दायर किया। पति द्वारा तलाक और आपसी समझौते को स्वीकार करने के बावजूद, फैमिली कोर्ट ने 3 अप्रैल, 2025 को याचिका खारिज कर दी। ट्रायल कोर्ट का तर्क था कि पत्नी क्रूरता साबित करने में विफल रही और तलाक अमान्य था क्योंकि यह दो वयस्क पुरुष गवाहों की उपस्थिति में नहीं दिया गया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि फैमिली कोर्ट का फैसला अत्यधिक तकनीकी आधारों और कानूनी सिद्धांतों के गलत प्रयोग पर आधारित था। उन्होंने कहा कि पक्षकार सुन्नी मुस्लिम कानून द्वारा शासित हैं, जिसके तहत तलाक, चाहे वह मौखिक हो या लिखित, की वैधता के लिए गवाहों का होना अनिवार्य नहीं है। वकील ने स्पष्ट किया कि गवाहों की अनिवार्यता शिया कानून में होती है। इसके अलावा, चूंकि दोनों पक्ष तलाक की घोषणा और ‘मुबारत’ समझौते को स्वीकार कर रहे हैं, इसलिए याचिका खारिज करना कानूनी रूप से गलत है।
प्रतिवादी पति के वकील ने भी अपील का समर्थन किया। उन्होंने विवाह, तलाक की घोषणा और आपसी तलाक समझौते के तथ्यों को स्वीकार किया और तलाक की डिक्री दिए जाने पर कोई आपत्ति नहीं जताई।
कोर्ट का विश्लेषण
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के तर्क का विश्लेषण किया, जिसने बंबई हाईकोर्ट (बानू बनाम कुतुबुद्दीन सुलेमानजी विमानवाला) और जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट (दिलशादा मसूद बनाम गुलाम मुस्तफा) के फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि गवाहों के बिना तलाक अमान्य है।
खंडपीठ ने पाया कि फैमिली कोर्ट द्वारा उद्धृत फैसले उन मामलों से संबंधित थे जहां पक्षकार शिया मुस्लिम कानून के तहत आते थे। कोर्ट ने कहा:
“इसलिए, उक्त फैसले वर्तमान मामले के पक्षकारों पर लागू नहीं होते हैं।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुन्नी कानून के तहत गवाहों की आवश्यकता अनिवार्य नहीं है। भले ही गवाहों की बात हो, उनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि तलाक स्वेच्छा से दिया गया है। कोर्ट ने नोट किया:
“अपीलकर्ता और प्रतिवादी दोनों ने स्पष्ट रूप से अदालत के समक्ष कहा कि विवाह के दौरान पति ने वादी को तलाक दिया… और वादी ने उक्त घोषणाओं को स्वीकार कर लिया।”
मुबारत की मान्यता: कोर्ट ने जोर देकर कहा कि फैमिली कोर्ट ‘मुबारत’ समझौते को समझने में विफल रही। पीठ ने ‘डिस्सॉल्यूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज एक्ट, 1939’ की धारा 2(ix) का हवाला दिया, जो मुस्लिम कानून द्वारा मान्यता प्राप्त किसी भी आधार पर विवाह विच्छेद की अनुमति देती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (जोहरा खातून बनाम मो. इब्राहिम) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने पुष्टि की कि ‘मुबारत’ एक्स्ट्रा-जुडिशियल (न्यायेतर) तलाक का एक वैध रूप है जहां दोनों पक्ष आपसी सहमति से विवाह समाप्त करते हैं।
कोर्ट ने माना कि फैमिली कोर्ट ने ‘मुबारत’ समझौते के आधार पर पक्षकारों की वैवाहिक स्थिति घोषित करने के लिए फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग न करके “तात्विक अनियमितता” (Material Irregularity) बरती है।
फैसला और दिशानिर्देश
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 3 अप्रैल, 2025 के फैसले को रद्द कर दिया और यह घोषणा करते हुए डिक्री पारित की कि पक्षकारों के बीच विवाह विच्छेद हो चुका है।
यह देखते हुए कि राजस्थान में फैमिली कोर्ट नियमित रूप से समान याचिकाओं को खारिज कर रही हैं, हाईकोर्ट ने राज्य की फैमिली कोर्ट्स के लिए निम्नलिखित दिशानिर्देश जारी किए:
- व्यक्तिगत उपस्थिति: यदि याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम कानून के तहत एक्स्ट्रा-जुडिशियल तरीके से विवाह भंग कर दिया गया है, तो फैमिली कोर्ट को पक्षकारों की व्यक्तिगत उपस्थिति सुनिश्चित करनी चाहिए ताकि उनके बयान दर्ज किए जा सकें और यह संतुष्टि की जा सके कि तलाक बिना किसी दबाव के स्वेच्छा से हुआ है।
- दस्तावेजों का सत्यापन: यदि तलाक लिखित रूप में हुआ है (जैसे ‘मुबारतनामा’, ‘तलाकनामा’, या ‘खुलानामा’), तो सत्यापन के लिए दस्तावेज कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाने चाहिए।
- अधिकार क्षेत्र का प्रयोग: संतुष्ट होने पर, कोर्ट को फैमिली कोर्ट एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए विवाह की स्थिति की घोषणा करने वाला उचित आदेश या डिक्री पारित करनी चाहिए।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: आयशा चौहान बनाम वसीम खान
केस नंबर: डी.बी. सिविल मिसलेनियस अपील नंबर 1319/2025
कोरम: जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस योगेंद्र कुमार पुरोहित

