राजस्थान हाईकोर्ट ने पॉक्सो जज के खिलाफ जांच के लिए मामला चीफ जस्टिस को भेजा; रिकॉर्ड में “हेरफेर” कर डिफॉल्ट बेल रोकने का आरोप

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) और अपीलीय अदालत के आदेशों को रद्द करते हुए एक किशोर आरोपी को डिफॉल्ट बेल (Default Bail) प्रदान की है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि आरोपी को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित करने के लिए निचली अदालत के रिकॉर्ड में कथित तौर पर हेरफेर किया गया था।

जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए रजिस्ट्री को निर्देश दिया है कि न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) के आचरण के संबंध में उचित कार्रवाई के लिए इस मामले को आदेश की प्रति के साथ मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के समक्ष रखा जाए। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि रिकॉर्ड देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि 90 दिनों की वैधानिक अवधि के भीतर चार्जशीट दाखिल दिखाने के लिए दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की गई है, जबकि कालक्रम (Chronology) कुछ और ही बयां कर रहा है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता किशोर को 28 अगस्त, 2025 को पुलिस थाना लूणी, जोधपुर में दर्ज एफआईआर संख्या 193/2025 के सिलसिले में हिरासत में लिया गया था। उस पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 64(2)(m) और 308(2) तथा पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धाराओं के तहत आरोप लगाए गए थे।

कानून के अनुसार जांच पूरी करने के लिए निर्धारित 90 दिनों की अवधि समाप्त होने पर, किशोर ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 187 के तहत डिफॉल्ट बेल के लिए आवेदन किया। हालांकि, 29 नवंबर, 2025 को किशोर न्याय बोर्ड ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि चार्जशीट 21 नवंबर, 2025 को ही दाखिल कर दी गई थी। इसके बाद पॉक्सो मामलों के विशेष न्यायाधीश ने भी अपील खारिज कर दी।

याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए तर्क दिया कि वैधानिक अवधि के भीतर कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई थी और कोर्ट के रिकॉर्ड में भारी विसंगतियां हैं।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस फरजंद अली ने निचली अदालत की कार्यवाही का बारीकी से कालक्रमिक (Chronological) परीक्षण किया और कई “गंभीर और स्पष्ट गलतियां” पाईं।

1. कथित चार्जशीट दाखिल करने की तारीख पर कोई ऑर्डर शीट नहीं: हाईकोर्ट ने नोट किया कि हालांकि मजिस्ट्रेट ने दावा किया कि चार्जशीट 21 नवंबर, 2025 को दाखिल की गई थी, लेकिन उस तारीख की कोई भी समकालीन न्यायिक ऑर्डर शीट (Order Sheet) रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं थी। एकमात्र सबूत चार्जशीट के पीछे किया गया एक पृष्ठांकन (Endorsement) था, जो कार्यालय क्लर्क द्वारा नहीं बल्कि स्वयं पीठासीन अधिकारी द्वारा किया गया था, जिसे हाईकोर्ट ने संदेहजनक माना।

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2. 24 नवंबर की ऑर्डर शीट में “असंभव” विवरण: कोर्ट ने 24 नवंबर, 2025 की एक ऑर्डर शीट पर सवाल उठाए, जिसमें दर्ज था कि जमानत अर्जी खारिज कर दी गई है। जबकि रिकॉर्ड से पता चला कि जमानत अर्जी वास्तव में 28 नवंबर, 2025 को पेश की गई थी और 29 नवंबर को खारिज हुई थी।

कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा: “कोई भी न्यायिक आदेश उस घटना से पहले नहीं आ सकता जो उसका आधार हो… भविष्य में होने वाले न्यायिक कार्य को पहले ही रिकॉर्ड में शामिल करना और इसे केवल ‘टाइपोग्राफिकल त्रुटि’ बताना प्रथम दृष्टया पूरी तरह से अस्वीकार्य है।”

3. विरोधाभासी कार्यवाही: रिकॉर्ड के अनुसार, 28 नवंबर, 2025 को मजिस्ट्रेट ने सरकारी वकील को केस डायरी मंगाने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि यदि चार्जशीट वास्तव में 21 नवंबर को दाखिल कर दी गई थी, तो एक सप्ताह बाद केस डायरी मंगाने का कोई औचित्य नहीं था।

4. निचली अदालत का स्पष्टीकरण खारिज: जब हाईकोर्ट ने स्पष्टीकरण मांगा, तो निचली अदालत ने प्रविष्टियों को लिपिकीय त्रुटि बताया। इसे खारिज करते हुए जस्टिस अली ने कहा: “दिया गया स्पष्टीकरण विश्वास पैदा नहीं करता… ऐसा प्रतीत होता है कि अपने स्टैंड को सही ठहराने के लिए झूठे दस्तावेज (False Document) तैयार किए गए हैं।”

निर्णय

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि एक बार वैधानिक अवधि समाप्त होने के बाद, धारा 187(3) BNSS के तहत डिफॉल्ट बेल का अधिकार एक अविभाज्य अधिकार (Indefeasible Right) बन जाता है।

न्यायिक अधिकारी के खिलाफ सख्त टिप्पणियों के संबंध में, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि जजों की आलोचना में संयम बरतना चाहिए, लेकिन “न्यायिक संयम को इस हद तक नहीं खींचा जा सकता कि स्पष्ट और प्रत्यक्ष गलतियों पर आंखें मूंद ली जाएं… यह मामला केवल न्यायिक त्रुटि का नहीं है, बल्कि इसमें दोषसिद्धि (Culpability) की छाप दिखाई देती है।”

हाईकोर्ट ने किशोर न्याय बोर्ड और अपीलीय अदालत के आदेशों को रद्द कर दिया। कोर्ट ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता को 50,000 रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि की जमानत पेश करने पर रिहा किया जाए। साथ ही, न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता बनाए रखने के लिए मामले को आगे की कार्रवाई हेतु मुख्य न्यायाधीश को संदर्भित किया गया है।

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