राजस्थान हाईकोर्ट ने मातृत्व को संविधान के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा मानते हुए एक सरकारी प्राथमिक शिक्षिका को 180 दिनों का सवेतन मातृत्व अवकाश और सभी परिणामी सेवा लाभ प्रदान करने का निर्देश दिया है।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकल पीठ ने 8 अक्टूबर को तृतीय श्रेणी (लेवल-1) की एक शिक्षिका की याचिका स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि 1 सितंबर 2023 से शुरू होने वाली इस अवधि को सेवा में किसी भी तरह का व्यवधान (ब्रेक इन सर्विस) नहीं माना जाएगा और शिक्षिका को उसका पूरा बकाया वेतन दिया जाए।
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मातृत्व अवकाश केवल मां और बच्चे के स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दोनों के बीच स्नेह और भावनात्मक जुड़ाव बनाने के लिए दिया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिले जीवन के अधिकार में मातृत्व का अधिकार और बच्चे के सर्वांगीण विकास का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य महिलाओं को सामाजिक न्याय दिलाना और मातृत्व की गरिमा की रक्षा करना है, जिससे महिला कर्मचारी का रोजगार और वेतन दोनों सुरक्षित रहते हैं।
स्कूल बदलने के बाद उपजा विवाद
मामला एक स्कूल से दूसरे स्कूल में शिक्षिका के तबादले और कार्यभार ग्रहण करने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पहले बाड़मेर जिले के एक सरकारी स्कूल में पदस्थापित थीं। उन्होंने 1 सितंबर से 4 अक्टूबर 2023 तक 34 दिनों के मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था, जिसे प्रशासन ने मंजूर कर लिया था। इस बीच 27 सितंबर 2023 को उन्होंने बच्चे को जन्म दिया।
इसी दौरान उनका चयन तिजारा जिले के दूसरे स्कूल में हो गया और उन्होंने 6 अक्टूबर 2023 को नए स्कूल में कार्यभार संभाल लिया। शिक्षिका का कहना था कि उन्होंने राजस्थान सेवा नियम, 1951 के तहत 1 सितंबर 2023 से पूरे 180 दिनों के मातृत्व अवकाश की मांग की थी। लेकिन प्रशासन ने उनके आवेदन पर कोई ध्यान नहीं दिया, जिसके चलते उन्हें अपने नवजात की देखभाल के लिए तीन अलग-अलग मौकों पर चाइल्ड केयर लीव (सीसीएल) लेनी पड़ी। इसके बाद पूरे वेतन और 180 दिनों के अवकाश की मांग को लेकर उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
प्रशासन की दलील और दस्तावेजी सवाल
राज्य सरकार की ओर से याचिका का कड़ा विरोध किया गया। सरकारी वकील ने तर्क दिया कि शिक्षिका ने बाड़मेर के स्कूल में सिर्फ 34 दिनों का ही मातृत्व अवकाश मांगा था, जो उन्हें दे दिया गया था। सरकार का कहना था कि तिजारा के नए स्कूल में कार्यभार ग्रहण करने के बाद शिक्षिका ने मातृत्व अवकाश के लिए कोई आवेदन नहीं दिया, बल्कि सीधे तीन बार चाइल्ड केयर लीव मांगी, जिसे मंजूर भी कर लिया गया था। ऐसे में वह अतिरिक्त मातृत्व अवकाश की हकदार नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि यद्यपि नए स्कूल में औपचारिक रूप से मातृत्व अवकाश का आवेदन दिए जाने का कोई दस्तावेजी प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है, फिर भी शिक्षिका ने अपनी याचिका में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है।
अदालत का फैसला और निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने कहा कि जब मातृत्व अवकाश के अनुरोध पर प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो शिक्षिका के पास अपने नवजात शिशु के समुचित पालन-पोषण के लिए चाइल्ड केयर लीव लेने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था।
अदालत ने कहा कि आम बोलचाल में मातृत्व अवकाश का अर्थ बच्चे के जन्म के बाद महिला कर्मचारी को मिलने वाले उस समय से है, ताकि वह परिवार में आए नन्हे सदस्य की देखभाल कर सके और उसके साथ प्रेम व स्नेह का रिश्ता बना सके। इस दौरान उसकी नौकरी और वेतन दोनों सुरक्षित रहने चाहिए। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह शिक्षिका को 1 सितंबर 2023 से 180 दिनों का पूरा मातृत्व अवकाश, समस्त बकाया वेतन और उससे जुड़े सभी सेवा लाभ प्रदान करे।

