पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चेक बाउंस (Cheque Bounce) के मामलों में सजा के निलंबन (Suspension of Sentence) के लिए मुआवजे की 20% राशि जमा करने की शर्त को लेकर निचली अपीलीय अदालतों को फिर से निर्णय लेने के लिए मामलों को रिमांड (Remand) किया है। जस्टिस संजय वशिष्ठ की पीठ ने निर्देश दिया है कि जब तक अपीलीय अदालतें नए सिरे से आदेश पारित नहीं करतीं, तब तक 20% राशि जमा करने की शर्त प्रभावी नहीं रहेगी और याचिकाकर्ताओं की जमानत रद्द नहीं की जाएगी।
हाईकोर्ट ने हाल ही में मैसर्स कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम श्री अंबिका सेल्स कॉरपोरेशन मामले में बड़ी पीठ (Larger Bench) द्वारा दिए गए निर्णय का हवाला दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि 20% राशि जमा करने की शर्त कानूनी रूप से सही है, लेकिन यदि कोई वाजिब कारण मौजूद है, तो केवल इस शर्त का पालन न करने के आधार पर किसी के जमानत के अधिकार को छीना नहीं जा सकता। साथ ही, यह जमा राशि अपील पर निर्णय लेने के लिए पूर्व-शर्त (Pre-condition) नहीं है।
कार्यवाही की पृष्ठभूमि (Background of the Proceedings)
हाईकोर्ट छह अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जो भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न अपीलीय अदालतों (हिसार, संगरूर, फाजिल्का, कुरुक्षेत्र और गुरुग्राम के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीशों) के उन आदेशों को चुनौती दी थी, जिनमें परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत उनकी सजा को इस शर्त पर निलंबित किया गया था कि वे ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित मुआवजे की 20% राशि जमा करें।
इन मामलों में, अपीलीय अदालतों ने अपीलकर्ताओं को एक निश्चित समय के भीतर राशि जमा करने का निर्देश दिया था और यह कहा था कि ऐसा न करने पर सजा का निलंबन रद्द कर दिया जाएगा। उदाहरण के लिए, CRM-M-38097-2025 (हरविंदर सिंह सग्गू बनाम सुशील कुमार) में, याचिकाकर्ता को 5,25,000 रुपये के मुआवजे का 20% जमा करने का निर्देश दिया गया था। याचिकाकर्ता ने अपनी मासिक आय 40,000 रुपये बताते हुए वित्तीय असमर्थता जताई थी, लेकिन अपीलीय अदालत ने यह कहते हुए राहत देने से इनकार कर दिया था कि भुगतान से छूट देने के लिए कोई “असाधारण परिस्थितियां” नहीं हैं।
इसी तरह, CRM-M-42330-2025 मामले में, अपीलीय अदालत ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 362 (BNSS की धारा 403) के तहत निर्णय में बदलाव पर रोक का हवाला देते हुए शर्त माफी की अर्जी खारिज कर दी थी।
कोर्ट की टिप्पणी और कानूनी विश्लेषण (Observations of the Court and Legal Analysis)
जस्टिस संजय वशिष्ठ ने 24 सितंबर, 2025 को मैसर्स कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड बनाम श्री अंबिका सेल्स कॉरपोरेशन मामले में हाईकोर्ट की बड़ी पीठ/खंडपीठ द्वारा दिए गए निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें NI Act की धारा 148 से संबंधित विशिष्ट कानूनी सवालों का जवाब दिया गया था।
कोर्ट ने बड़ी पीठ द्वारा स्पष्ट किए गए निम्नलिखित बिंदुओं को दोहराया:
- शर्त की वैधता: सजा के निलंबन के आवेदन पर निर्णय लेते समय मुआवजे की 20% राशि जमा करने की शर्त लगाना सही है।
- अनुपालन न करने का प्रभाव: हालांकि शर्त का पालन न करने पर सजा का निलंबन रद्द किया जा सकता है, लेकिन यदि “न्यायोचित कारण” (Justifiable reasons) मौजूद हैं, तो अपील लंबित रहने तक केवल अनुपालन न करने के आधार पर अपीलीय अदालत द्वारा जमानत का अधिकार नहीं छीना जा सकता।
- अपील निर्णय के लिए पूर्व-शर्त नहीं: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मुआवजे का 20% जमा करना अपील पर फैसला सुनाने के लिए पूर्व-शर्त नहीं है।
निर्णय में बड़ी पीठ की टिप्पणी को उद्धृत किया गया:
“जब भी जमा राशि स्वतंत्रता (Liberty) से अधिक महंगी हो, और अपीलीय अदालतें इस बात से आश्वस्त हों कि दोषी राशि जमा करने की स्थिति में नहीं हैं और अपनी स्वतंत्रता खो सकते हैं, भले ही पहली अपील पर निर्णय होना बाकी हो, तो अपीलीय अदालतों को धारा 148 एनआई एक्ट के तहत दोषसिद्धि के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई को प्राथमिकता देने का प्रयास करना चाहिए और उन्हें अधिमानतः फाइलिंग के साठ दिनों के भीतर निपटाना चाहिए।”
कोर्ट ने नोट किया कि NI Act की धारा 148 स्पष्ट रूप से अनुपालन न करने पर सजा के निलंबन को प्रतिबंधित नहीं करती है, और BNSS, 2023 की धारा 430 (पुरानी धारा 389 Cr.P.C.) अपील का निर्णय होने तक स्वतंत्रता बहाल करने के लिए लागू होती है।
फैसला और निर्देश (Decision and Directions)
हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निपटारा करते हुए जमा राशि की शर्त को सख्ती से लागू करने पर अंतरिम रोक लगा दी और निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- पुनर्विचार के लिए रिमांड: मामलों को संबंधित अपीलीय अदालतों के पास वापस भेजा गया है ताकि वे मैसर्स कोरोमंडल इंटरनेशनल लिमिटेड मामले में निर्धारित कानून के अनुरूप नए सिरे से निर्णय ले सकें।
- समय सीमा: अपीलीय अदालतों को यह प्रक्रिया आदेश की प्रति प्राप्त होने के 15 दिनों के भीतर पूरी करनी होगी।
- अंतरिम संरक्षण: जब तक नया आदेश पारित नहीं किया जाता, तब तक मुआवजे की 20% राशि जमा करने की शर्त “अप्रभावी रहेगी, और इसके परिणामस्वरूप जमानत रद्द नहीं की जाएगी।”
- अपील को प्राथमिकता: यदि अपीलीय अदालत को लगता है कि दोषी राशि जमा करने में असमर्थ है और अपनी स्वतंत्रता खो सकता है, तो उसे अपील की सुनवाई को प्राथमिकता देनी होगी और नया आदेश पारित करने के बाद अधिमानतः साठ दिनों के भीतर (और नब्बे दिनों से अधिक नहीं) अपील का निर्णय करना होगा।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: हरविंदर सिंह सग्गू बनाम सुशील कुमार और अन्य (तथा अन्य संबंधित मामले)
- केस नंबर: CRM-M-28757-2025 और 05 अन्य संबंधित मामले
- कोरम: न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ

