पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अग्रिम जमानत के एक मामले में अपने पुराने आदेश को वापस लेने (Recall) की याचिका को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने वकील द्वारा कोर्ट में दिए गए बयान से मुकरने की कोशिश को “प्रक्रियात्मक पाखंड” (Procedural Heresy) करार दिया। जस्टिस सुमीत गोयल ने याचिकाकर्ता अंकित रावल पर 20,000 रुपये का अनुकरणीय जुर्माना लगाते हुए कहा कि किसी भी वादी को अदालत को “प्रयोगात्मक मुकदमेबाजी की प्रयोगशाला” बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
मामले का मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 528 के तहत उस न्यायिक आदेश को वापस लिया जा सकता है, जो वकील के बयान के आधार पर याचिका वापस लेने के बाद पारित किया गया था। याचिकाकर्ता का दावा था कि उसके पिछले वकील ने उसकी जानकारी या निर्देशों के बिना अदालत में पेश होने और नियमित जमानत मांगने का बयान दिया था। हाईकोर्ट ने कहा कि BNSS की धारा 403 (जो CrPC की धारा 362 के समान है) के तहत ऐसे आवेदन विचारणीय नहीं हैं और वकील के बयानों की पवित्रता को बनाए रखा जाना अनिवार्य है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला पानीपत के थाना बापोली में 30 सितंबर, 2023 को दर्ज FIR नंबर 166 से जुड़ा है। इसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 (हत्या), 341, 323, 148 और 149 के तहत आरोप लगाए गए हैं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 29 सितंबर, 2023 की रात तसवर (मृतक) और आजाद (घायल) पर लाठी, डंडों और चाकुओं से लैस हमलावरों ने हमला किया था, जिसमें तसवर की मौत हो गई थी।
जांच के दौरान CCTV फुटेज और हथियारों की बरामदगी के आधार पर कई आरोपियों की पहचान हुई। याचिकाकर्ता अंकित रावल ने अग्रिम जमानत की मांग की थी। 28 जनवरी, 2026 को उसके तत्कालीन वकील ने सात दिनों के भीतर निचली अदालत में पेश होने और नियमित जमानत मांगने की छूट के साथ याचिका वापस ले ली थी। अब रावल ने उसी आदेश को वापस लेने के लिए वर्तमान याचिका दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के तर्क: याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री गौरव ग्रोवर ने तर्क दिया कि पिछले वकील ने आत्मसमर्पण करने का बयान “बिना उचित निर्देश” के दिया था। उन्होंने दावा किया कि याचिकाकर्ता ने केवल याचिका वापस लेने की अनुमति दी थी यदि हाईकोर्ट राहत देने के पक्ष में नहीं था, लेकिन निचली अदालत में पेश होने का कोई वचन नहीं दिया था। मेरिट पर उन्होंने कहा कि FIR में याचिकाकर्ता का नाम नहीं है और उसे केवल सह-आरोपी के खुलासे के आधार पर फंसाया गया है।
राज्य सरकार के तर्क: हरियाणा सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ उप-अधिवक्ता सुश्री महिमा यशपाल सिंगला ने याचिका का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि 28 जनवरी का आदेश वकील द्वारा स्वेच्छा से दिए गए स्पष्ट बयान के बाद पारित किया गया था। उन्होंने अपराध की गंभीरता और हत्या जैसे जघन्य मामले में सच्चाई का पता लगाने के लिए हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की आवश्यकता पर जोर दिया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस सुमीत गोयल ने स्पष्ट किया कि BNSS की धारा 403 किसी भी आपराधिक अदालत को अपने अंतिम आदेश की समीक्षा करने या उसे बदलने से रोकती है।
वकील और मुवक्किल के संबंधों पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“न्यायिक प्रक्रिया इस बुनियादी धारणा पर चलती है कि बार (अदालत) में वकील द्वारा दिए गए बयान पूरी अधिकारिता के साथ दिए जाते हैं और वे मुवक्किल के वास्तविक इरादे को दर्शाते हैं।”
अदालत ने कहा कि वकालतनामा पर हस्ताक्षर करके एक वादी अपने वकील को अपनी ओर से बोलने और कार्य करने की शक्ति देता है। यदि वादी को अपने वकील के बयान से मुकरने की अनुमति दी जाती है, तो हर न्यायिक आदेश असुरक्षित हो जाएगा। याचिकाकर्ता के ‘निर्देशों की कमी’ के दावे पर हाईकोर्ट ने कहा:
“याचिकाकर्ता द्वारा ‘निर्देशों की कमी’ की आड़ में याचिका वापस लेने के फैसले को नकारने का प्रयास प्रक्रियात्मक पाखंड है, जो वकील-मुवक्किल के रिश्ते की जड़ पर प्रहार करता है… वकालतनामा पर हस्ताक्षर करने के बाद याचिकाकर्ता अपने वकील द्वारा खुली अदालत में की गई कार्रवाई से अनजान होने का नाटक नहीं कर सकता।”
जमानत के मामले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टेट बनाम अनिल शर्मा (1997)’ फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि हिरासत में पूछताछ, अग्रिम जमानत के साथ की जाने वाली पूछताछ से गुणात्मक रूप से अधिक प्रभावी होती है।
फैसला
हाईकोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर 20,000 रुपये का जुर्माना लगाया। यह राशि हरियाणा राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण में जमा की जाएगी। हाईकोर्ट ने अंत में कहा:
“इस याचिका को स्वीकार करने का अर्थ होगा याचिकाकर्ता को कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग करने और इस अदालत को प्रयोगात्मक मुकदमेबाजी की प्रयोगशाला बनाने की अनुमति देना… न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को बनाए रखने के लिए ऐसे प्रयासों का दृढ़ता से जवाब दिया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश की टिप्पणियों का मामले की जांच या ट्रायल के मेरिट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
केस विवरण:
- केस टाइटल: अंकित रावल बनाम हरियाणा राज्य
- केस नंबर: CRM-M-4433-2026 में CRM-8361-2026 और CRM-9472-2026
- जज: जस्टिस सुमीत गोयल
- फैसले की तारीख: 16 मार्च, 2026

