सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को 2024 के चर्चित पुणे पोर्शे कार हादसे से जुड़े मामले में नाबालिग आरोपी के पिता विशाल अग्रवाल को जमानत दे दी। अदालत ने ध्यान दिलाया कि अग्रवाल लगभग 22 महीनों से जेल में हैं और इस मामले में अन्य सह-आरोपियों को पहले ही राहत मिल चुकी है।
न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की पीठ ने विशाल अग्रवाल की जमानत याचिका स्वीकार करते हुए उन्हें राहत प्रदान की। अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने अपने नाबालिग बेटे के रक्त नमूने बदलवाने की साजिश रची थी, ताकि दुर्घटना के बाद शराब सेवन का कोई प्रमाण सामने न आए और ‘निल अल्कोहल’ रिपोर्ट हासिल की जा सके।
यह मामला 19 मई 2024 का है, जब पुणे के कल्याणी नगर इलाके में कथित रूप से शराब के प्रभाव में पोर्शे कार चला रहे 17 वर्षीय किशोर ने एक मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी थी। इस हादसे में दो आईटी पेशेवरों की मौत हो गई थी।
जमानत देते समय सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आरोपी लंबे समय से हिरासत में है और समान परिस्थिति में अन्य आरोपियों को भी जमानत दी जा चुकी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा:
“हम नोट करते हैं कि अपीलकर्ता पिछले 22 महीनों से जेल में है। उसने जमानत के लिए मामला बना लिया है। ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित शर्तों के अधीन जमानत दी जाती है।”
महाराष्ट्र सरकार ने अग्रवाल को जमानत दिए जाने का विरोध किया और तर्क दिया कि सह-आरोपियों के साथ समानता के आधार पर उन्हें राहत नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि, शीर्ष अदालत ने जमानत देते हुए कुछ सख्त शर्तें भी लगाईं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि अग्रवाल किसी भी गवाह से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क नहीं करेंगे। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि इस शर्त का उल्लंघन हुआ तो राज्य सरकार जमानत रद्द कराने की मांग कर सकती है। साथ ही ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई शीघ्र पूरी करने का निर्देश भी दिया गया।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई आरोपियों को राहत दे चुका है। 27 फरवरी को अदालत ने ससून जनरल अस्पताल के पूर्व चिकित्सा अधीक्षक डॉ. अजय तावरे को जमानत दी थी, जिन्हें नाबालिग के रक्त नमूनों से छेड़छाड़ करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। अदालत ने उन्हें भी समानता के आधार पर राहत दी थी।
इससे पहले 2 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट ने तीन अन्य आरोपियों — कथित बिचौलिए अमर संतोष गायकवाड़ और कार में मौजूद दो अन्य किशोरों के माता-पिता आदित्य अविनाश सूद तथा आशीष सतीश मित्तल — को भी जमानत दे दी थी। अदालत ने तब कहा था कि वे करीब 18 महीने से हिरासत में थे।
सूद और मित्तल को 19 अगस्त को गिरफ्तार किया गया था। जांच एजेंसियों का आरोप था कि कार में मौजूद दो अन्य नाबालिगों के परीक्षण के लिए उनके रक्त नमूनों का इस्तेमाल किया गया।
इससे पहले 16 दिसंबर को बॉम्बे हाई कोर्ट ने गायकवाड़, सूद और मित्तल समेत आठ आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
हादसे के बाद यह मामला पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया था। प्रारंभ में जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJB) ने नाबालिग आरोपी को जमानत देते हुए उसे सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखने जैसी शर्तें लगाई थीं, जिससे व्यापक जन आक्रोश पैदा हुआ।
बाद में पुणे पुलिस के अनुरोध पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने अपना आदेश संशोधित किया और नाबालिग को ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया। इसके बाद बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे रिहा करने का आदेश दिया।
मामले में रक्त नमूने बदलने की साजिश को लेकर कुल 10 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इनमें नाबालिग के माता-पिता विशाल अग्रवाल और शिवानी अग्रवाल, डॉक्टर अजय तावरे और श्रीहरी हलनोर, ससून अस्पताल के कर्मचारी अतुल घाटकम्बले, आदित्य सूद, आशीष मित्तल और अरुण कुमार सिंह शामिल हैं।

