सुप्रीम कोर्ट: प्रोबेशन एक्ट के तहत रिहाई से दोषसिद्धि का दाग नहीं मिटता; नौकरी से बर्खास्तगी पर रोक नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा है कि ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958’ (Probation of Offenders Act) के तहत किसी अपराधी को प्रोबेशन (परिवीक्षा) पर रिहा करने से उसकी दोषसिद्धि का कलंक (Stigma of Conviction) समाप्त नहीं होता है। शीर्ष अदालत ने कहा कि प्रोबेशन केवल सजा का विकल्प है, लेकिन यह अपराधी के दोषी होने के तथ्य को नहीं बदलता, इसलिए संबंधित विभाग कदाचार के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र है।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि प्रोबेशन पर रिहाई के बाद दोषसिद्धि को अयोग्यता (Disqualification) नहीं माना जा सकता। हालांकि, पीठ ने प्रतिवादी कर्मचारी (वर्कमैन) की मृत्यु हो जाने के कारण उसे मिली राहत में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन कानून की गलत व्याख्या को सुधार दिया।

क्या था पूरा मामला?

यह मामला एक बिजली बोर्ड (Electricity Board) और उसके एक कर्मचारी के बीच विवाद से जुड़ा था। उक्त कर्मचारी को शुरुआत में अनुबंध (Contract) पर रखा गया था और बाद में 6 अप्रैल 1998 को ‘हेल्पर’ के पद पर समायोजित (Absorb) कर लिया गया था।

बाद में हुई जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि कर्मचारी ने नौकरी पाने के लिए फर्जी शैक्षणिक प्रमाण पत्र (Bogus Educational Certificate) का इस्तेमाल किया था। जांच में पाया गया कि कर्मचारी का असली नाम ‘थिरु पी. पलानियाप्पन’ था, लेकिन उसने अपने भाई ‘थिरु पी. थंगैयान’ का रूप धारण किया और उसी के शैक्षणिक प्रमाण पत्रों का उपयोग कर नौकरी हासिल की।

इस कदाचार के साबित होने पर, घरेलू जांच (Domestic Inquiry) के बाद 31 जनवरी 2005 को उसे सेवा से बर्खास्त (Dismiss) कर दिया गया था।

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निचली अदालतों और हाईकोर्ट का रुख

बर्खास्तगी के आदेश को कर्मचारी ने लेबर कोर्ट, मदुरै में चुनौती दी। 11 मई 2009 को लेबर कोर्ट ने बर्खास्तगी की सजा को कम करते हुए उसे “वेतन कटौती और तीन साल के लिए वेतन वृद्धि (Increment) पर रोक” में बदल दिया।

बिजली बोर्ड ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की, लेकिन एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने लेबर कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। इसके बाद मामला हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के पास गया। डिवीजन बेंच ने सजा को और संशोधित करते हुए इसे ‘अनिवार्य सेवानिवृत्ति’ (Compulsory Retirement) में बदल दिया।

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इस बात का सहारा लिया था कि आपराधिक मामले में कर्मचारी को ‘प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट, 1958’ का लाभ दिया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि चूंकि उसे जेल की सजा नहीं हुई और प्रोबेशन पर छोड़ा गया, इसलिए दोषसिद्धि को सेवा के लिए अयोग्यता नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में दलीलें

अपीलकर्ता (बिजली बोर्ड) की ओर से पेश वकील ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट ने कानून की व्याख्या करने में गलती की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले यूनियन ऑफ इंडिया बनाम बख्शी राम (1990) का हवाला देते हुए कहा कि “प्रोबेशन पर अपराधी की रिहाई दोषसिद्धि के कलंक को नहीं मिटाती।”

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बोर्ड का तर्क था कि जब तक दोषसिद्धि (Conviction) कायम है, केवल प्रोबेशन पर रिहाई के आधार पर बर्खास्तगी की सजा को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में नहीं बदला जा सकता। हालांकि, मानवीय आधार पर बोर्ड ने यह भी कहा कि चूंकि कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, वे उसके परिवार को मिले वित्तीय लाभों को वापस नहीं लेना चाहते, लेकिन भविष्य के मामलों के लिए कानून को सही किया जाना आवश्यक है।

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने बिजली बोर्ड की दलीलों को स्वीकार किया। पीठ ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट का दृष्टिकोण तयशुदा कानून के विपरीत था।

कोर्ट ने बख्शी राम मामले का उल्लेख करते हुए कहा:

“आपराधिक मुकदमे में दोषसिद्धि (Conviction) एक चीज है और सजा (Sentence) दूसरी। कदाचार के लिए विभागीय दंड तीसरी चीज है। प्रोबेशन ऑफ ऑफेंडर्स एक्ट की धारा 3 या 4 का उपयोग करते समय अदालत दोषसिद्धि को नहीं छेड़ती; यह केवल उस सजा से निपटती है जो अपराधी को भुगतनी होती है… दोषसिद्धि वैसी ही रहती है और दोषसिद्धि का कलंक नहीं मिटता।”

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अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अधिनियम की धारा 12 विभाग को कदाचार या दोषसिद्धि के आधार पर कार्रवाई करने से नहीं रोकती। यह धारा किसी व्यक्ति को विभागीय दंड से मुक्त करने के लिए नहीं बनाई गई है।

पीठ ने अपने आदेश में कहा:

“हमारा माना है कि हाईकोर्ट द्वारा की गई टिप्पणी बख्शी राम मामले में प्रतिपादित कानून के विपरीत है… इसलिए हम हाईकोर्ट की उस टिप्पणी को रद्द करते हैं जिसमें कहा गया था कि दोषसिद्धि अयोग्यता नहीं होगी।”

अंतिम आदेश

कानूनी स्थिति को स्पष्ट करने के बावजूद, सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिवादी कर्मचारी को दी गई राहत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा:

“इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि प्रतिवादी-कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, हम आक्षेपित निर्णय में हाईकोर्ट द्वारा की गई सजा के संशोधन में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं।”

इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की कानूनी त्रुटि को सुधारते हुए अपील का निपटारा कर दिया।

केस विवरण (Case Details):

  • केस टाइटल: द सुपरिटेंडिंग इंजीनियर बनाम द लेबर कोर्ट मदुरै और अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या ____ / 2026 (SLP(C) संख्या 23418/2025 से उत्पन्न)
  • कोरम: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया

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