“संभावना” के आधार पर धारा 498A में दोष सिद्ध नहीं किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने को एक बुजुर्ग दंपति (ससुराल वालों) को धारा 498A के तहत दोषी ठहराए जाने के आदेश को निरस्त कर दिया।

इस मामले में अपीलकर्ता नं. 1 (ससुर) 77 वर्ष के थे और अपीलकर्ता नं 2 (सास) 69 वर्ष की थी जो की बिस्तर पर पड़ी है। वे आईपीसी की धारा 498A के तहत अपनी दोषसिद्धि के खिलाफ अपील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आये थे, जिसमें उन्हें जुर्माने और एक डिफ़ॉल्ट शर्त के साथ तीन साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि के खिलाफ अपील खारिज कर दी थी।

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ वकील श्री एस. नागमुथु ने कहा कि अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि का समर्थन करने के लिए कोई सबूत नहीं है। ट्रायल कोर्ट को, वास्तव में, अपने स्वयं के तर्कों और निष्कर्षों के आधार पर अपीलकर्ताओं को संदेह का लाभ देना चाहिए था। इसलिए, दोष सिद्धि टिकाऊ नहीं है। मृतका का पति आईपीसी की धारा 304-बी और 498ए के तहत पहले से ही हिरासत में है। 

अपील का विरोध करने वाले राज्य के वकील ने प्रस्तुत किया कि वे सभी एक ही छत के नीचे रह रहे थे। मृतक के माता-पिता ने भी अपीलकर्ता से मुलाकात की थी और मृतक को प्रताड़ित किए जाने की शिकायत की थी। अपीलकर्ताओं की स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाने में विफलता उनकी संलिप्तता को बहुत स्पष्ट करती है। दो न्यायालयों द्वारा उनकी मिलीभगत के समवर्ती निष्कर्षों पर आधारित दोषसिद्धि में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट मोइन जस्टिस नवीन सिन्हा और जस्टिस आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोप सामान्य प्रकृति के हैं। अत: विचारण न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि यद्यपि वे घर के एक अलग हिस्से में रह रहे थे, लेकिन उनका आचरण मृतक के अप्रत्यक्ष उत्पीड़न के समान था। 

ट्रायल कोर्ट ने कहा था  कि अपीलकर्ताओं ने कथित तौर पर मृतक के खिलाफ अपने बेटे के कान भरे थे, और ये विवाहित जीवन के सामान्य टूट-फूट थे और अपीलकर्ताओं का यह कृत्य शायद आग में ईंधन डालने के बराबर था। 

बेंच ने कहा:

हाईकोर्ट ने अपीलकर्ताओं के खिलाफ उपलब्ध सबूतों की प्रकृति और ट्रायल कोर्ट के दोषसिद्धि के तर्क पर चर्चा करने की भी जहमत नहीं उठाई। हमारा मत है कि प्रत्यक्ष साक्ष्य के अभाव में एक संभावना के आधार पर अपीलकर्ताओं को दोषी बनाये रखना विधि सम्मत नहीं है, इस मामले में अपीलार्थी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए था। 

नतीजतन, अदालत ने अपीलकर्ताओं की दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और अपील को स्वीकार कर लिया। 

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