हिरासत में बंद आरोपी की जमानत की संभावना दर्शाए बिना निवारक निरोध आदेश जारी नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाई कोर्ट ने PITNDPS के तहत निरोध आदेश रद्द किया

दिल्ली हाई कोर्ट ने Validad Khan @ Mullah के खिलाफ Prevention of Illicit Traffic in Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1988 के तहत जारी निवारक निरोध आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने पाया कि निरोध आदेश में यह नहीं दर्शाया गया कि याचिकाकर्ता के जमानत पर रिहा होने की कोई वास्तविक संभावना है, जबकि वह पहले से ही न्यायिक हिरासत में था। साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि आदेश में ऐसे तथ्यों का उल्लेख किया गया जिनकी प्रासंगिकता स्पष्ट नहीं की गई।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत याचिका दाखिल कर 20 मार्च 2025 को जारी निरोध आदेश को चुनौती दी थी। इस आदेश के तहत उसे केंद्रीय कारागार, पुजहल (चेन्नई) में रखने का निर्देश दिया गया था।

निरोध आदेश के आधार में यह कहा गया था कि याचिकाकर्ता कई मामलों में Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1985 के तहत आरोपी रहा है। इनमें प्रमुख रूप से शामिल थे:

  • FIR No. 43/2024, थाना क्राइम ब्रांच, दिल्ली — NDPS Act की धाराएँ 21/27A/29/31/32, जिसमें याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में था।
  • FIR No. 223/2019, थाना स्पेशल सेल, दिल्ली — NDPS Act की धाराएँ 21/29/61/85, जिसमें मुकदमा लंबित था और याचिकाकर्ता को 1 दिसंबर 2023 को जमानत मिली थी।
  • FIR No. 13/2013, थाना स्पेशल सेल, दिल्ली — NDPS Act की धाराएँ 21/29/61/85, जिसमें उसे 12 वर्ष के कठोर कारावास और ₹1,00,000 जुर्माने की सजा सुनाई गई थी, हालांकि अपील के दौरान उसकी सजा स्थगित कर दी गई थी।
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निरोध आदेश में यह भी उल्लेख किया गया कि विभिन्न मामलों में कुल 21,935 ग्राम हेरोइन और अन्य मादक पदार्थ बरामद किए गए थे। साथ ही याचिकाकर्ता के परिवार के कुछ सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामलों का भी संदर्भ दिया गया था।

याचिकाकर्ता की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि निरोध आदेश में यह स्वीकार किया गया है कि वह FIR No. 43/2024 में न्यायिक हिरासत में है, फिर भी यह नहीं बताया गया कि उसके जमानत पर रिहा होने की कोई संभावना है।

यह भी बताया गया कि सह-आरोपी Furkan Khan की जमानत याचिका पहले ही खारिज हो चुकी थी और याचिकाकर्ता ने स्वयं जमानत के लिए आवेदन भी नहीं किया था। ऐसे में निवारक निरोध का आधार स्पष्ट नहीं था।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि निवारक निरोध दंडात्मक नहीं बल्कि रोकथाम के उद्देश्य से होता है, इसलिए केवल पूर्व मामलों में संलिप्तता के आधार पर निरोध आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

इसके अलावा यह भी तर्क दिया गया कि निरोध आदेश पारित करने और उसे लागू करने में अत्यधिक देरी हुई। अंतिम FIR मार्च 2024 में दर्ज हुई थी, जबकि निरोध आदेश मार्च 2025 में जारी किया गया और अप्रैल 2025 में लागू किया गया।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामलों का उल्लेख किया गया, लेकिन उनकी प्रतियां उसे उपलब्ध नहीं कराई गईं, जिससे वह प्रभावी प्रतिनिधित्व करने से वंचित रहा।

साथ ही सह-आरोपी की जमानत खारिज करने का आदेश केवल अंग्रेज़ी में दिया गया, जबकि याचिकाकर्ता का कहना था कि वह केवल उर्दू भाषा जानता है।

प्रतिवादियों की दलीलें

केंद्र सरकार और राज्य की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता की गतिविधियों से स्पष्ट है कि वह हर बार हिरासत से छूटने के बाद NDPS से जुड़े अपराधों में फिर शामिल हो जाता है।

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उनके अनुसार, 2013 के मामले में सजा निलंबित होने के बाद 2019 में उसके खिलाफ नया मामला दर्ज हुआ और 2023 में जमानत मिलने के बाद 2024 में फिर NDPS का मामला सामने आया। इससे उसकी अपराध दोहराने की प्रवृत्ति स्पष्ट होती है।

प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों के मामलों का उल्लेख यह दिखाने के लिए किया गया था कि यह गतिविधि एक संगठित नेटवर्क का हिस्सा है।

अदालत का विश्लेषण

न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा की पीठ ने मामले की सुनवाई की।

अदालत ने कहा कि निवारक निरोध का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं बल्कि भविष्य में संभावित हानिकारक गतिविधियों को रोकना है।

अदालत ने स्पष्ट किया:

“जब किसी व्यक्ति को निरोध आदेश पारित किए जाने के समय पहले से ही हिरासत में रखा गया हो, तो सक्षम प्राधिकारी को ठोस और ठोस सामग्री के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना होगा कि उस व्यक्ति के जमानत पर रिहा होने की संभावना है और रिहा होने पर वह पुनः ऐसी गतिविधियों में संलिप्त हो सकता है।”

अदालत ने पाया कि निरोध आदेश में ऐसी कोई संतुष्टि दर्ज नहीं की गई थी।

इसके अलावा अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के परिवार के सदस्यों के खिलाफ दर्ज मामलों का उल्लेख किया गया, लेकिन उनकी प्रासंगिकता स्पष्ट नहीं की गई। इससे यह संकेत मिलता है कि निरोध आदेश में अप्रासंगिक सामग्री पर भी विचार किया गया।

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अदालत ने यह भी कहा कि सह-आरोपी की जमानत खारिज करने के आदेश की उर्दू प्रति न देने से याचिकाकर्ता को प्रभावी प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं मिला।

पीठ ने यह भी पाया कि निरोध आदेश पारित करने और उसे लागू करने में पर्याप्त देरी हुई, जिसका संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

अदालत का निर्णय

इन सभी कारणों के आधार पर अदालत ने 20 मार्च 2025 का निरोध आदेश रद्द कर दिया और कहा कि याचिकाकर्ता को उस आदेश के आधार पर निरुद्ध नहीं रखा जा सकता।

हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि इस निर्णय में की गई टिप्पणियां केवल निरोध आदेश की वैधता तक सीमित हैं और लंबित आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

केस डिटेल्स

मामले का शीर्षक: वालिदाद खान @ मुल्ला बनाम भारत संघ एवं अन्य

मामला संख्या: रिट याचिका (आपराधिक) संख्या 2541/2025

पीठ: न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति रविंदर दुदेजा

निर्णय की तिथि: 12 मार्च 2026

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता: सुश्री सिया दास, सुश्री रिया दास

प्रतिवादियों की ओर से अधिवक्ता: सुश्री रुपाली बंधोपाध्याय, श्री अमोल सिन्हा एवं अन्य अधिवक्ता

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