छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि ‘एग्रीमेंट टू सेल’ (बिक्री के करार) के तहत प्राप्त कब्जा प्रकृति में ‘अनुमत’ (Permissive) होता है। यह तब तक ‘प्रतिकूल कब्जे’ (Adverse Possession) में परिवर्तित नहीं हो सकता जब तक कि वास्तविक मालिक की जानकारी में मालिकाना हक का स्पष्ट और शत्रुतापूर्ण दावा (Hostile Assertion) न किया गया हो।
इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने यह भी निर्धारित किया कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 149 के तहत कोर्ट फीस की कमी जैसी प्रक्रियात्मक त्रुटियों को सुधारने के लिए अपीलीय न्यायालयों के पास ट्रायल कोर्ट के समान ही अधिकार (Co-extensive Jurisdiction) हैं। न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु की पीठ ने वादी के कानूनी वारिसों द्वारा दायर दूसरी अपील (Second Appeal) को खारिज करते हुए प्रथम अपीलीय न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा, जिसने प्रतिवादी को जमीन का कब्जा वापस दिलाने का आदेश दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद ग्राम रामहेपुर में खसरा नंबर 133/3 स्थित 0.70 डिसमिल भूमि से संबंधित था। मूल वादी लाला प्रसाद ने संविदा के विशिष्ट पालन (Specific Performance) या विकल्प के तौर पर स्वत्व की घोषणा (Declaration of Title) के लिए वाद दायर किया था।
वादी का दावा था कि प्रतिवादी नंबर 1 (सफी मोहम्मद) के पिता यूसुफ ने 20 अगस्त 1977 को विवादित भूमि को 1,951 रुपये में बेचने का करार किया था। उसी दिन 1,000 रुपये अग्रिम राशि दी गई और वादी को कब्जा सौंप दिया गया। वादी के अनुसार, शेष राशि बाद में यूसुफ के इलाज के लिए दी गई थी, लेकिन बिक्री विलेख (Sale Deed) निष्पादित नहीं किया गया। वादी ने 1977 से लगातार कब्जे और प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक का दावा किया।
प्रतिवादियों ने करार के निष्पादन से इनकार किया और तर्क दिया कि वाद परिसीमा (Limitation) द्वारा बाधित है। प्रतिवादी नंबर 1 ने प्रतिदावा (Counterclaim) दायर कर कब्जे की बहाली की मांग की, यह कहते हुए कि यदि वादी का कब्जा पाया भी जाता है, तो वह केवल अनुमति पर आधारित था।
ट्रायल कोर्ट ने वादी के पक्ष में फैसला सुनाया था, लेकिन कवर्धा के जिला न्यायाधीश (प्रथम अपीलीय न्यायालय) ने इस फैसले को पलट दिया। अपीलीय कोर्ट ने वादी का मुकदमा खारिज कर दिया और प्रतिवादी के कब्जे के प्रतिदावे को स्वीकार कर लिया।
कानून के सारभूत प्रश्न (Substantial Questions of Law)
हाईकोर्ट ने निम्नलिखित प्रश्नों पर सुनवाई की:
- क्या प्रथम अपीलीय न्यायालय का यह मानना सही था कि वादी का कब्जा शत्रुतापूर्ण (Hostile) न होकर अनुमत (Permissive) था, जबकि कब्जा 1977 से एग्रीमेंट टू सेल के आधार पर था?
- क्या 12 वर्ष से अधिक समय बाद दायर किए गए कब्जे के प्रतिदावे को स्वीकार करना उचित था?
- क्या उचित कोर्ट फीस का भुगतान न करने के कारण प्रथम अपीलीय न्यायालय के समक्ष अपील खारिज की जानी चाहिए थी?
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता (वादी पक्ष) के वकील ने तर्क दिया कि वादी को लिखित एग्रीमेंट टू सेल के तहत कब्जा दिया गया था, जो अनुबंध के आंशिक पालन (Part-performance) का हिस्सा था, इसलिए इसे अनुमत कब्जा नहीं माना जा सकता। उन्होंने यह भी कहा कि प्रतिदावा समय सीमा से बाधित था और कोर्ट फीस की कमी के कारण प्रतिवादी की अपील खारिज की जानी चाहिए थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
1. कब्जे की प्रकृति और प्रतिकूल कब्जा हाईकोर्ट ने प्रथम अपीलीय न्यायालय के इस निष्कर्ष की पुष्टि की कि 20 अगस्त 1977 का कथित एग्रीमेंट टू सेल कानूनन साबित नहीं हुआ था। इसलिए, संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 53-A के तहत आंशिक पालन में कब्जे की दलील विफल हो गई।
प्रतिकूल कब्जे के दावे पर कोर्ट ने कहा:
“यह सुस्थापित है कि अनुमत व्यवस्था से उत्पन्न कब्जा तब तक प्रतिकूल कब्जे में नहीं बदलता जब तक कि वास्तविक मालिक की जानकारी में स्वत्व (Title) का स्पष्ट और शत्रुतापूर्ण दावा न किया जाए।”
पीठ ने नोट किया कि एग्रीमेंट टू सेल के तहत कब्जे का दावा करने वाला व्यक्ति एक ही समय में प्रतिकूल कब्जे का दावा नहीं कर सकता, जब तक कि वह कब्जे की अनुमत प्रकृति का स्पष्ट रूप से खंडन न करे, जो इस मामले में अनुपस्थित था।
2. प्रतिदावे की समय सीमा कोर्ट ने प्रतिदावे को विचारणीय माना। कोर्ट का तर्क था कि कब्जे की मांग के लिए वाद का कारण (Cause of Action) तब उत्पन्न हुआ जब वादी के स्वत्व के दावे को नकार दिया गया। प्रतिदावा मूल रूप से एक बचाव था जिसके साथ परिणामी राहत की मांग जुड़ी थी।
3. कोर्ट फीस की कमी कोर्ट फीस के मुद्दे पर, हाईकोर्ट ने मनोहरन बनाम शिवराजन (2014) और तजिंदर सिंह गंभीर बनाम गुरप्रीत सिंह (2014) में सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला दिया। न्यायमूर्ति गुरु ने कहा:
“कोर्ट फीस में कमी के संबंध में, अपीलीय न्यायालय की शक्ति ट्रायल कोर्ट के समविस्तारी (Co-extensive) है और न्याय के हित में प्रथम अपीलीय न्यायालय वह सब कर सकता है जो ट्रायल कोर्ट मुकदमे की कार्यवाही में कर सकता था।”
कोर्ट ने कहा कि केवल तकनीकी आपत्तियों के आधार पर मौलिक न्याय को पराजित नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने दूसरी अपील को योग्यताविहीन मानते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कानून के सभी सारभूत प्रश्नों का उत्तर अपीलकर्ता के विरुद्ध और प्रतिवादी के पक्ष में दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया:
“जहां तक कोर्ट फीस संबंधी आपत्ति का प्रश्न है, कोर्ट फीस की कमी एक सुधारने योग्य दोष (Curable Defect) है। यह न्यायालय, सीपीसी की धारा 149 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए, प्रतिवादी को प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा तैयार डिक्री के निष्पादन से पहले कोर्ट फीस की कमी को पूरा करने की अनुमति देता है।”
केस डीटेल्स:
- केस का नाम: लाला प्रसाद (मृत) विधिक वारिसों के माध्यम से बनाम सफी मोहम्मद व अन्य
- केस संख्या: एस.ए. नंबर 406 ऑफ 2005
- पीठ: न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु

