पटना हाईकोर्ट ने पटना विश्वविद्यालय को निर्देश दिया है कि वह तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के उन कर्मचारियों की सेवाओं को नियमित करे जो दशकों से कार्यरत थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि नियुक्ति सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत पद पर की गई है, लेकिन विज्ञापन जैसी प्रक्रियात्मक औपचारिकताओं का पालन नहीं किया गया, तो ऐसी नियुक्ति को ‘अनियमित’ (Irregular) माना जाएगा, न कि ‘अवैध’ (Illegal)।
न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा ने माधवी झा और अन्य द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया कि याचिकाकर्ता नियमितीकरण के हकदार हैं। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यह नियमितीकरण रिट याचिका दायर करने की तिथि, यानी 17.04.2015 से प्रभावी होगा। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय द्वारा जारी सेवा समाप्ति आदेशों और कुलाधिपति (Chancellor) के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसके तहत इन नियुक्तियों को रद्द किया गया था। कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय दशकों तक कर्मचारियों की सेवा लेने के बाद उन्हें तकनीकी आधार पर बाहर का रास्ता नहीं दिखा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति मगध महिला कॉलेज (पटना विश्वविद्यालय की एक अंगीभूत इकाई) में 1983 और 2001 के बीच विभिन्न तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों पर की गई थी। ये नियुक्तियां कॉलेज के तत्कालीन प्रिंसिपल द्वारा कुलपति (Vice-Chancellor) के अनुमोदन से की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का दावा था कि वे स्वीकृत पदों के विरुद्ध लगातार काम कर रहे थे।
वर्ष 2003 में, बिहार के विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति ने एक आदेश (दिनांक 19.08.2003) जारी कर इन नियुक्तियों को इस आधार पर रद्द कर दिया कि ये नियुक्तियां राज्य सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना और उचित विज्ञापन प्रक्रिया का पालन किए बिना की गई थीं। इसके परिणामस्वरूप, विश्वविद्यालय ने सेवा समाप्ति के नोटिस जारी किए।
याचिकाकर्ताओं ने पहले भी हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। विश्वविद्यालय की “सीनेट कमेटी फॉर एब्जॉर्प्शन” ने भी उनके नियमितीकरण की सिफारिश की थी, लेकिन उन्हें कोई राहत नहीं मिली। अंततः, सितंबर 2015 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं, जिसके खिलाफ यह रिट याचिका दायर की गई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से: याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने तर्क दिया कि उनकी नियुक्तियां एक सक्षम प्राधिकारी (कुलपति/प्रिंसिपल) द्वारा रिक्त स्वीकृत पदों पर की गई थीं। उन्होंने कहा कि उन्होंने 10 वर्षों से अधिक समय तक लगातार काम किया है, इसलिए उनका मामला सुप्रीम कोर्ट द्वारा कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी (3) मामले में दिए गए अपवाद के दायरे में आता है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि ‘अवैध’ और ‘अनियमित’ नियुक्तियों के बीच का अंतर महत्वपूर्ण है। चूंकि नियुक्ति करने वाले प्राधिकारियों के पास नियुक्ति की क्षमता थी, इसलिए विज्ञापन की कमी या अन्य प्रक्रियात्मक खामियां नियुक्ति को केवल ‘अनियमित’ बनाती हैं, ‘अवैध’ नहीं।
प्रतिवादियों (विश्वविद्यालय और कुलाधिपति) की ओर से: विश्वविद्यालय और कुलाधिपति के वकीलों ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि शुरुआती नियुक्तियां प्रारंभ से ही शून्य (void ab initio) थीं। उन्होंने कहा कि नियुक्ति के समय पदों को राज्य सरकार द्वारा मंजूरी नहीं दी गई थी और कोई सार्वजनिक विज्ञापन जारी नहीं किया गया था, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। उन्होंने कुलाधिपति के 2003 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि कुलपति के पास सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसी नियुक्तियां करने का कोई अधिकार नहीं था।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
हाईकोर्ट ने नियुक्तियों की प्रकृति का विश्लेषण किया ताकि यह तय किया जा सके कि वे ‘अवैध’ थीं या ‘अनियमित’। उमादेवी मामले में संविधान पीठ के फैसले और पटना हाईकोर्ट के पूर्ण पीठ के फैसले राम सेवक यादव बनाम बिहार राज्य का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की:
“अवैध और अनियमित नियुक्ति के बीच का अंतर अच्छी तरह से स्थापित है। एक नियुक्ति तब ‘अवैध’ होती है जब नियुक्ति करने वाले के पास नियुक्ति करने का अधिकार न हो या यदि नियुक्ति किसी ऐसे पद पर की गई हो जो अस्तित्व में ही न हो। दूसरी ओर, यदि नियुक्ति करने वाले के पास अधिकार है और पद मौजूद है, लेकिन प्रक्रिया का सख्ती से पालन नहीं किया गया है, तो नियुक्ति ‘अनियमित’ है।”
कोर्ट ने पाया कि पटना विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत कुलपति और प्रिंसिपल सक्षम प्राधिकारी थे। इसलिए, पदों के विज्ञापन में विफलता ने नियुक्तियों को अनियमित बना दिया, लेकिन अवैध नहीं।
कोर्ट ने कुलाधिपति के 19.08.2003 के आदेश की भी जांच की और पाया कि कुलाधिपति व्यक्तिगत मामलों के बीच अंतर करने में विफल रहे और उन्होंने एक सामान्य आदेश पारित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि कुलाधिपति का आदेश इस सामान्य धारणा पर आधारित प्रतीत होता है कि विज्ञापन और सरकारी मंजूरी के बिना की गई सभी नियुक्तियां अवैध हैं, जबकि इस तथ्य की अनदेखी की गई कि कुलपति के पास स्वीकृत पदों पर नियुक्ति करने की क्षमता थी।
बिहार राज्य और अन्य बनाम कीर्ति नारायण प्रसाद के मामले के अनुपात को लागू करते हुए, कोर्ट ने माना कि चूंकि याचिकाकर्ताओं ने उस अवधि के दौरान किसी भी न्यायालय के आदेश के हस्तक्षेप के बिना 10 वर्षों से अधिक समय तक काम किया था, इसलिए वे एक बार के उपाय (one-time measure) के रूप में नियमितीकरण के लाभ के हकदार हैं।
फैसला
हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और सेवा समाप्ति के आदेशों को रद्द कर दिया। नियमितीकरण की तिथि के संबंध में, कोर्ट ने संतुलन बनाते हुए कहा कि प्रारंभिक नियुक्ति की तारीख से पूर्वव्यापी लाभ देने से विश्वविद्यालय पर अनुचित वित्तीय बोझ पड़ेगा। इसलिए, कोर्ट ने निर्देश दिया कि नियमितीकरण उस तारीख से प्रभावी होगा जब याचिकाकर्ताओं ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट ने आदेश दिया:
“तदनुसार, याचिकाकर्ताओं को उन संबंधित स्वीकृत पदों पर समायोजित/नियमित किया जाएगा जिन पर वे अपनी सेवा समाप्ति से ठीक पहले काम कर रहे थे। ऐसा समायोजन/नियमितीकरण 17-04-2015 से प्रभावी होगा, और वे एक नियमित कर्मचारी को उपलब्ध सभी परिणामी मौद्रिक और अन्य लाभों के हकदार होंगे।”
विश्वविद्यालय को एक निर्धारित समय सीमा के भीतर परिणामी आदेश जारी करने का निर्देश दिया गया है।
केस डिटेल्स:
- केस का शीर्षक: माधवी झा और अन्य बनाम पटना विश्वविद्यालय और अन्य
- केस नंबर: सिविल रिट जूरिडिक्शन केस नंबर 18289 ऑफ 2015
- न्यायाधीश: न्यायमूर्ति आलोक कुमार सिन्हा

