पटना हाईकोर्ट: वैवाहिक संबंधों में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’ लागू करते हुए शादी भंग; फैमिली कोर्ट का विवाह को शून्य घोषित करने का फैसला रद्द

पटना हाईकोर्ट ने निचली अदालत के उस फैसले को पूरी तरह उलट दिया है, जिसमें स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 के कथित उल्लंघन के आधार पर एक विवाह को ‘शून्य’ (Void ab initio) घोषित कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब एक बार विवाह प्रमाणपत्र जारी हो जाता है, तो वह विवाह का निर्णायक प्रमाण होता है। अदालत ने वैवाहिक संबंधों के पूरी तरह से टूट जाने और एक पक्ष के पुनर्विवाह को देखते हुए ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’ (Doctrine of Frustration) के तहत शादी को भंग करने का आदेश दिया।

जस्टिस चंद्र शेखर झा और जस्टिस बिबेक चौधरी की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि प्रक्रियात्मक तकनीकी आधारों पर विवाह प्रमाणपत्र की वैधता को चुनौती नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता और प्रतिवादी ने 4 अक्टूबर 2007 को बेगूसराय के स्पेशल मैरिज ऑफिसर के समक्ष प्रेम विवाह किया था। शादी के कुछ समय बाद, प्रतिवादी (पत्नी) ने अपीलकर्ता और उसके परिवार पर क्रूरता और जातिगत अपमान करने का आरोप लगाया। इन परिस्थितियों के कारण, प्रतिवादी ने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 27 के तहत तलाक और स्थायी गुजारे भत्ते की मांग करते हुए याचिका दायर की।

28 फरवरी 2018 को बेगूसराय के प्रिंसिपल जज, फैमिली कोर्ट ने तलाक की याचिका खारिज कर दी। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने तलाक के आधारों पर विचार करने के बजाय विवाह को ‘शून्य’ घोषित कर दिया। निचली अदालत का तर्क था कि विवाह के समय धारा 12(2) के प्रावधान का पालन नहीं किया गया, जिसके तहत दोनों पक्षों को गवाहों और मैरिज ऑफिसर की मौजूदगी में एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में स्वीकार करने की घोषणा करनी होती है।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता की ओर से दलील दी गई कि फैमिली कोर्ट का फैसला कानूनन गलत है। उनके वकील ने तर्क दिया कि अधिनियम की धारा 13 के तहत जारी प्रमाणपत्र विवाह का अंतिम साक्ष्य है। एक बार प्रमाणपत्र जारी होने के बाद यह माना जाना चाहिए कि धारा 12 सहित सभी कानूनी औपचारिकताओं का पालन किया गया है।

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प्रतिवादी ने अदालत को बताया कि फैमिली कोर्ट द्वारा शादी को शून्य घोषित किए जाने के बाद, उन्होंने 18 दिसंबर 2021 को दूसरा विवाह कर लिया है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि इस दूसरे विवाह से उनका एक साल का बच्चा भी है। प्रतिवादी के वकील ने कहा कि इन “मजबूर परिस्थितियों” में अब पहले पति के साथ वैवाहिक दायित्वों को निभाना संभव नहीं है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की व्याख्या को “कानून की विकृत व्याख्या” करार दिया। खंडपीठ ने कहा कि धारा 13(2) स्पष्ट रूप से कहती है कि विवाह प्रमाणपत्र इस तथ्य का निर्णायक प्रमाण होगा कि विवाह विधिवत संपन्न हुआ है।

अदालत ने अवलोकन किया:

“हमने वर्तमान मामले जैसा कानून का इतना विकृत इंटरप्रिटेशन पहले कभी नहीं देखा। विद्वान फैमिली कोर्ट ने स्पेशल मैरिज एक्ट की धारा 13(2) के प्रावधानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया।”

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विवाह को शून्य घोषित करने के फैसले पर हाईकोर्ट ने कहा:

“मैरिज ऑफिसर द्वारा जारी विवाह प्रमाणपत्र के बावजूद यह कहना कि विवाह बाध्यकारी और पूर्ण नहीं है, फैमिली कोर्ट का एक ऐसा दृष्टिकोण है जो पूरी तरह से त्रुटिपूर्ण प्रतीत होता है।”

वैवाहिक कानून में ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’

अदालत ने माना कि हालांकि विवाह कानूनी रूप से वैध था, लेकिन समय के बीतने और बदली हुई परिस्थितियों के कारण इसका मूल आधार खत्म हो चुका है। जस्टिस झा ने फैसले में लिखा:

“विवाह, हालांकि वैध रूप से संपन्न हुआ था, लेकिन बाद की घटनाओं के कारण इसने अपना आवश्यक चरित्र खो दिया है, जिससे इसका जारी रहना असंभव हो गया है। कानूनी बंधन अब केवल एक खोल (Shell) के रूप में बचा है, जिसमें कोई सार, उद्देश्य या प्रवर्तनीयता नहीं है।”

अदालत ने आगे कहा कि पहली शादी को जबरन कायम रखने से प्रतिवादी की दूसरी शादी और बच्चे का भविष्य प्रभावित होगा:

“पक्षों को ऐसे रिश्ते में रहने के लिए मजबूर करना, ‘लीगल फिक्शन’ (कानूनी कल्पना) को थोपने जैसा होगा, जो न्याय की कीमत पर होगा।”

अलगाव और क्रूरता पर अतिरिक्त टिप्पणी

सहमति जताते हुए जस्टिस बिबेक चौधरी ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन’ को धारा 27(1)(d) के तहत ‘क्रूरता’ के आधार से जोड़ा। उन्होंने कहा कि बिना किसी संपर्क के लंबे समय तक अलग रहना मन में गहरा ‘फ्रस्ट्रेशन’ पैदा करता है, जो मानसिक क्रूरता का ही एक रूप है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के समर घोष बनाम जया घोष मामले का हवाला देते हुए कहा कि लंबा अलगाव मानसिक क्रूरता का एक पहलू है।

फैसला

हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए पक्षों के बीच विवाह को भंग कर दिया।

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इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के जज द्वारा प्रतिवादी की जाति और उनकी एमबीबीएस (MBBS) डिग्री को लेकर की गई टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई। निचली अदालत ने सुझाव दिया था कि शादी के बाद अपनी मायके की जाति का उपयोग करने के कारण प्रतिवादी की डिग्री रद्द कर दी जानी चाहिए। हाईकोर्ट ने इन टिप्पणियों को “अनुचित” और जज के “व्यक्तिगत अनुभव और राय” पर आधारित बताते हुए रिकॉर्ड से हटा (Expunge) दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: मनोज कुमार @ मुन्ना बनाम नीता भारती
  • केस नंबर: Miscellaneous Appeal No.151 of 2023 (In First Appeal No.47 of 2018)
  • बेंच: जस्टिस चंद्र शेखर झा और जस्टिस बिबेक चौधरी
  • तारीख: 17 मार्च, 2026

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