पटना हाईकोर्ट ने रोहतास जिले में भूमि विवाद को लेकर अपने ही चाचा और दो चचेरे भाइयों की “निर्मम हत्या” करने वाले दो भाइयों, अमन सिंह और सोनल सिंह, की मौत की सजा (Death Sentence) की पुष्टि की है। न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सौर्येन्द्र पांडेय की खंडपीठ ने दोषियों द्वारा दायर आपराधिक अपील को खारिज कर दिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए मृत्युदंड के संदर्भ (Reference) को सही ठहराते हुए इस अपराध को “विरल से विरलतम” (Rarest of Rare) श्रेणी का माना है।
अपने सहमति वाले फैसले में न्यायमूर्ति पांडेय ने महाकाव्य महाभारत का उल्लेख करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “महाभारत की कहानी हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाती है कि आक्रमणकारियों (Aggressors) को उनके पाप/अपराध के लिए दंडित किया जाना चाहिए, जिन्होंने न केवल तीन मानव जीवन छीन लिए हैं, बल्कि तीन महिलाओं को भी मार दिया है, जो अपने पतियों को खोने के बाद बेजान हो गई हैं।”
मामले की पृष्ठभूमि (Background)
यह मामला रोहतास जिले के दरिहट (Darihat) थाना अंतर्गत खुदरांव गांव में 13 जुलाई 2021 को हुई एक घटना से संबंधित है। अभियोजन पक्ष का मामला मृतक विजय सिंह की पत्नी शकुंतला देवी (PW-4) के फर्दबयान पर आधारित था।
फैसले के अनुसार, आरोपी अजय सिंह (पिता) और उसके दो बेटे, अमन सिंह और सोनल सिंह ने पीड़ितों के घर से सटी एक विवादित जमीन को जोतना शुरू कर दिया। जब विजय सिंह और उनके बेटे दीपक सिंह ने इसका विरोध किया, तो उनके साथ मारपीट की गई। पीड़ित अपनी जान बचाने के लिए एक पड़ोसी के दरवाजे और फिर अपने पुराने घर की ओर भागे, लेकिन आरोपियों ने उनका पीछा किया।
अभियोजन पक्ष ने बताया कि आरोपी तलवारों से लैस थे। सोनल सिंह ने कथित तौर पर दीपक सिंह पर हमला किया, जिससे उसकी गर्दन, चेहरे और छाती पर गंभीर चोटें आईं। अमन सिंह ने छोटे बेटे राकेश सिंह पर हमला किया, जिससे उसके दोनों हाथ कट गए और गर्दन व सिर पर चोटें आईं। जब विजय सिंह अपने बेटों को बचाने आए, तो अजय सिंह ने उन पर तलवार से हमला कर दिया। तीनों पीड़ितों को अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया।
सासाराम स्थित अपर सत्र न्यायाधीश-19 (Additional Sessions Judge-19) की अदालत ने 2 मई 2024 को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत आरोपियों को दोषी ठहराया था और 9 मई 2024 को उन्हें मौत की सजा सुनाई थी।
पक्षों की दलीलें (Arguments)
बचाव पक्ष की दलीलें: अपीलकर्ताओं (दोषियों) का प्रतिनिधित्व करते हुए अधिवक्ता श्री प्रतीक मिश्रा ने कई तकनीकी आपत्तियां उठाईं:
- एफआईआर में देरी: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि एफआईआर दर्ज करने में लगभग चार घंटे की अनुचित देरी हुई, जिससे यह संकेत मिलता है कि इसे “काफी सोच-विचार और परामर्श” के बाद दर्ज कराया गया।
- प्रारंभिक संस्करण को छिपाना: वकील ने तर्क दिया कि पुलिस फर्दबयान दर्ज करने से काफी पहले घटनास्थल पर पहुंच गई थी और इनक्वेस्ट रिपोर्ट (Inquest Reports) तैयार कर ली थी, जिसका अर्थ है कि घटना के सबसे पहले संस्करण को दबा दिया गया।
- सीजर लिस्ट (Seizure List) में अनियमितताएं: यह बताया गया कि शाम 7:35 बजे तैयार की गई जब्ती सूची में पहले से ही केस नंबर और धाराएं लिखी हुई थीं, जबकि औपचारिक एफआईआर रात 11:50 बजे दर्ज की गई थी।
- महत्वपूर्ण गवाहों की परीक्षा न होना: बचाव पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि एएसआई बिमलेश कुमार, जिन्होंने फर्दबयान दर्ज किया और इनक्वेस्ट रिपोर्ट तैयार की, का परीक्षण (Examine) नहीं किया गया, जिससे बचाव पक्ष को नुकसान हुआ।
- मेडिकल साक्ष्य: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मृतकों के शरीर पर पाए गए “लैसरेटेड घाव” (Lacerated wounds) कथित हथियार (तलवार) के अनुरूप नहीं थे, जो एक धारदार हथियार है।
अभियोजन पक्ष की दलीलें: सूचक की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री अंशुल और अपर लोक अभियोजक श्री मनीष कुमार नंबर 2 ने तर्क दिया कि:
- जांच अधिकारी (I.O.) की गलतियां, जैसे कि एएसआई का बयान न लेना, ऐसा प्रतीत होता है कि “जानबूझकर आरोपियों को लाभ पहुंचाने के लिए” की गई थीं और इसका लाभ दोषियों को नहीं मिलना चाहिए।
- तीन विधवाओं (PW-2, PW-3, और PW-4) का आंखों देखा हाल (Ocular evidence) सुसंगत और विश्वसनीय था।
- मेडिकल साक्ष्य अभियोजन पक्ष की कहानी की पुष्टि करते हैं, क्योंकि तलवार जैसे भारी धारदार हथियार भी ‘लैसरेटेड’ घाव पैदा कर सकते हैं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण (Court’s Analysis)
हाईकोर्ट ने साक्ष्यों और जांच में हुई खामियों का विस्तृत विश्लेषण किया।
जांच में खामियों पर: कोर्ट ने स्वीकार किया कि जांच अधिकारी ने एएसआई बिमलेश कुमार का बयान दर्ज न करके “जानबूझकर गड़बड़ी” की थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के दयाल सिंह बनाम उत्तरांचल राज्य जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि “अधिकारियों का दूषित आचरण साक्ष्यों के मूल्यांकन के रास्ते में नहीं आना चाहिए,” और अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों की जांच ऐसी खामियों के बावजूद (Dehors) की जानी चाहिए।
मेडिकल साक्ष्य पर: चोटों की प्रकृति के संबंध में बचाव पक्ष की दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा: “तलवार से भी ‘लैसरेटेड’ घाव हो सकता है जब ब्लेड की धार त्वचा और ऊतकों को चीरती है, जो अक्सर कुचलने या खींचने की क्रिया के साथ अनियमित किनारों का निर्माण करती है… पोस्टमार्टम रिपोर्ट में PW-6 द्वारा दर्ज निष्कर्षों का बारीकी से अवलोकन करने पर पता चलता है कि मृतकों के शरीर पर पाई गई चोटें हथियार यानी तलवार की प्रकृति के अनुरूप हैं।”
गवाहों पर: कोर्ट ने चश्मदीद गवाहों, विशेष रूप से सूचक शकुंतला देवी (PW-4) और उनकी बहुओं (PW-2 और PW-3) की गवाही को विश्वसनीय पाया। न्यायाधीशों ने नोट किया कि बचाव पक्ष जिरह के दौरान यह सुझाव देने में विफल रहा कि आरोपी घटना स्थल पर मौजूद नहीं थे।
सजा पर: कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस निष्कर्ष से सहमति जताई कि आजीवन कारावास की सजा इस मामले में अपर्याप्त होगी। फैसले में कहा गया: “इस मामले में एक ही परिवार के तीन निहत्थे व्यक्तियों को इन अपीलकर्ताओं द्वारा बेरहमी से काट डाला गया… मृतकों की मृत्यु के परिणामस्वरूप, अंतिम संस्कार और रस्में निभाने के लिए कोई भी वयस्क पुरुष सदस्य नहीं बचा है… जीवित परिवार के सदस्यों की खुशी और उत्सव जीवन भर के लिए खत्म हो गए हैं।”
निर्णय (Decision)
खंडपीठ ने दोषसिद्धि और मौत की सजा को बरकरार रखा।
न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद ने लिखा: “मैं डेथ रेफरेंस नंबर 2 ऑफ 2024 में मौत की सजा की पुष्टि करता हूं और अपीलकर्ताओं द्वारा दायर आपराधिक अपील (डीबी) नंबर 691 ऑफ 2024 को खारिज करता हूं।”
न्यायमूर्ति सौर्येन्द्र पांडेय ने अपनी सहमति राय में जोड़ा: “महाभारत की कहानी हमें एक ही निष्कर्ष पर ले जाती है कि अपीलकर्ता, जो आक्रामक (Aggressors) थे, उन्हें उनके पाप/अपराध के लिए दंडित किया जाना चाहिए… मैं सहमत हूं कि यह ‘विरल से विरलतम’ (Rarest of Rare) मामलों में से एक है जिसमें आजीवन कारावास की सजा देने का विकल्प विवेकपूर्ण तरीके से नहीं चुना जा सकता।”
कोर्ट ने रोहतास जिला विधिक सेवा प्राधिकार को तीनों विधवाओं को अधिकतम मुआवजा देने का भी निर्देश दिया।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: बिहार राज्य बनाम अमन सिंह और सोनल सिंह (डेथ रेफरेंस नंबर 2 ऑफ 2024 के साथ क्रिमिनल अपील (डीबी) नंबर 691 ऑफ 2024)
- कोरम: न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और न्यायमूर्ति सौर्येन्द्र पांडेय
- अपीलकर्ताओं के वकील: श्री प्रतीक मिश्रा, श्री वत्सल विशाल, श्री रोशन कुमार
- राज्य के वकील: श्री मनीष कुमार नंबर 2 (अपर लोक अभियोजक)
- सूचक के वकील: श्री अंशुल (वरिष्ठ अधिवक्ता)
- एमिकस क्यूरी: श्री अनिल सिंह, श्री मनोज कुमार नंबर 1

