माता-पिता विवाह का फैसला थोप नहीं सकते: ओडिशा हाईकोर्ट ने कामकाजी बालिग महिला के अलग रहने के अधिकार की रक्षा की

एक वयस्क महिला की स्वायत्तता और पसंद के अधिकार का समर्थन करते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादी के मामले में “लड़की का निर्णय ही सर्वोपरि है।” कोर्ट ने समाज की मानसिकता पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि माता-पिता द्वारा बेटी को शादी के लिए मजबूर करना “स्वस्थ समाज के लिए हितकर नहीं है।”

चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस मुरहारी श्री रमन की खंडपीठ ने एक बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका का निस्तारण करते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। मामला एक ऐसी युवती से जुड़ा था जिसने जबरन शादी के विरोध में अपना ससुराल छोड़ दिया था और अपने पति या माता-पिता के साथ रहने से इनकार कर दिया था।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला अजय कुमार साहू बनाम ओडिशा राज्य और अन्य से संबंधित है। हाईकोर्ट के 9 दिसंबर, 2025 के आदेश के अनुपालन में, काकटपुर पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर-इन-चार्ज, बसंत कुमार साहू ने 6 जनवरी, 2026 को युवती को कोर्ट के समक्ष पेश किया।

कोर्ट ने युवती से सीधे बातचीत की ताकि उसकी इच्छा जानी जा सके। युवती ने जजों को बताया कि उसकी शादी जबरदस्ती कराई गई थी, जिसके कारण उसे अपनी ससुराल में रहने में कठिनाई हो रही थी और इसी वजह से उसने अपनी मर्जी से वह घर छोड़ दिया।

आत्मनिर्भर है युवती, नहीं रहना चाहती पति के साथ

सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि युवती बालिग (Major) है और वह नौकरी करती है। उसने कोर्ट को स्पष्ट रूप से बताया कि वह अपने जीवनयापन के लिए खुद कमाती है। युवती ने दो टूक शब्दों में कहा कि वह न तो अपने तथाकथित पति के साथ रहना चाहती है और न ही अपने माता-पिता के साथ।

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इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि चूंकि वह एक बालिग है और अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है, इसलिए वह “अपने निर्णय लेने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र और सक्षम है।”

हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘समाज को आत्ममंथन की जरूरत’

माता-पिता द्वारा बेटियों पर शादी का दबाव बनाने की प्रवृत्ति पर हाईकोर्ट ने गहरी चिंता व्यक्त की। खंडपीठ ने कहा:

“अब वह समय आ गया है जब समाज को आत्ममंथन करना चाहिए कि लड़कियों को माता-पिता द्वारा शादी के लिए क्यों मजबूर किया जाता है। लड़की का निर्णय सर्वोपरि है और माता-पिता द्वारा कोई भी निर्णय लेने से पहले उसकी सहमति ली जानी चाहिए।”

कोर्ट ने आगे कहा कि जब कोई लड़की शादी के लिए तैयार न हो, तो बाहरी दबाव या जबरदस्ती का इस्तेमाल करके उसकी शादी कर देना “एक स्वस्थ समाज के लिए उचित नहीं है।”

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जजों ने प्रशासन को भी निर्देश दिया कि इस दिशा में जागरूकता और संवेदीकरण कार्यक्रम (Sensitization Programme) चलाए जाने चाहिए, ताकि बच्चों पर अपने फैसले थोपने की माता-पिता की मानसिकता को खत्म किया जा सके।

कोर्ट का फैसला और निर्देश

चूंकि युवती कोर्ट के सामने पेश हो चुकी थी और उसने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी थी, इसलिए हाईकोर्ट ने याचिका को लंबित रखना उचित नहीं समझा। युवती की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए कोर्ट ने पुलिस को निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. सुरक्षित वापसी: काकटपुर पुलिस स्टेशन के प्रभारी को निर्देश दिया गया कि वे युवती की उसके द्वारा चुने गए स्थान पर सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करें।
  2. दखलअंदाजी पर रोक: पुलिस यह सुनिश्चित करे कि युवती के जीवन में किसी भी तरह का हस्तक्षेप या बाधा न डाली जाए, चाहे वह उसके माता-पिता की तरफ से हो या तथाकथित पति की तरफ से।
  3. सुरक्षा की जिम्मेदारी: पुलिस को युवती के निवास स्थान पर उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसी भी घटना की सूचना मिलने पर तत्काल कदम उठाने का आदेश दिया गया है।
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इन निर्देशों के साथ हाईकोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

केस डिटेल्स:

  • केस का नाम: अजय कुमार साहू बनाम ओडिशा राज्य और अन्य
  • केस नंबर: WPCRL No.120 of 2025
  • कोरम: चीफ जस्टिस हरीश टंडन और जस्टिस मुरहारी श्री रमन

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