कंपनियों के एक्ट के तहत ‘नॉमिनेशन’ कोई वसीयत नहीं; बेटा रहेगा क्लास-I उत्तराधिकारी, पिता की संपत्ति में हिस्से का हकदार: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कंपनी एक्ट, 2013 के तहत किया गया ‘नामांकन’ (नॉमिनेशन) न तो शेयरों का पूर्ण स्वामित्व प्रदान करता है और न ही उत्तराधिकार के कानूनों को दरकिनार कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि किसी नॉमिनी के पक्ष में शेयरों का ‘वेस्टिंग’ (निहित होना) केवल एक अस्थायी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य कानूनी औपचारिकताओं को तब तक सुगम बनाना है जब तक कि मृतक के कानूनी वारिस संपत्ति का निपटारा न कर लें।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद ओसवाल एग्रो मिल्स लिमिटेड (OAML) और ओसवाल ग्रीनटेक लिमिटेड (OGL) जैसी प्रमुख कंपनियों में महत्वपूर्ण हिस्सेदारी रखने वाले एक शेयरधारक की मृत्यु के बाद शुरू हुआ। मृतक के बड़े बेटे (वादी) ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत क्लास-I कानूनी उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए संपत्ति के विभाजन (पार्टिशन) की मांग की थी।

मामले की मुख्य प्रतिवादी मृतक की पत्नी थीं, जिन्होंने दावा किया कि वह उन शेयरों की एकमात्र नॉमिनी हैं। उन्होंने तर्क दिया कि दो गवाहों द्वारा हस्ताक्षरित वह नामांकन फॉर्म एक ‘लिखित वसीयत’ के समान था। साथ ही, उन्होंने यह भी दावा किया कि 2006 में हुए एक ‘मौखिक पारिवारिक समझौते’ के माध्यम से वादी को संपत्ति से बेदखल कर दिया गया था।

पक्षों के तर्क

वादी का पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री जयंत भूषण ने वादी की ओर से दलील देते हुए ऑर्डर XII रूल 6 CPC के तहत ‘जजमेंट ऑन एडमिशन’ (स्वीकृति पर निर्णय) की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि मृतक एक हिंदू थे और उनकी कोई लिखित वसीयत नहीं थी, इसलिए उनकी संपत्ति उनके क्लास-I वारिसों के बीच विभाजित होनी चाहिए। वादी ने कहा कि हिंदुओं के लिए ‘मौखिक वसीयत’ का कानून में कोई स्थान नहीं है और सुप्रीम कोर्ट ने शक्ति यजदानी (2024) के फैसले में स्पष्ट किया है कि एक नॉमिनी केवल एक भरोसेमंद संरक्षक (फिडुशियरी) होता है, मालिक नहीं।

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प्रतिवादी का पक्ष: प्रतिवादी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्री संजीव काकरा ने तर्क दिया कि इस मामले में पूर्ण सुनवाई (ट्रायल) की आवश्यकता है। उन्होंने दावा किया कि मृतक द्वारा इस्तेमाल किया गया नामांकन फॉर्म विशेष था क्योंकि इसमें दो गवाहों के हस्ताक्षर थे, जो इसे एक वसीयत दस्तावेज की श्रेणी में लाता है। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने दलील दी कि पिता के जीवनकाल में ही वादी का नाम HUF खाते से हटा दिया गया था, जो इस बात का सबूत है कि एक मौखिक समझौते के तहत उसे उत्तराधिकार से वंचित कर दिया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

जस्टिस विकास महाजन ने उत्तराधिकार कानून और सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों के आलोक में दोनों प्रमुख बचाव तर्कों का विश्लेषण किया।

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1. मौखिक बेदखली की वैधता पर: हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि मौखिक पारिवारिक समझौता किसी क्लास-I वारिस को उत्तराधिकार से वंचित कर सकता है। कोर्ट ने कहा कि मृत्यु के बाद संपत्ति के वितरण को नियंत्रित करने की कोई भी कोशिश ‘वसीयती प्रकृति’ (testamentary nature) की होती है। जस्टिस महाजन ने टिप्पणी की:

“कानून किसी सैनिक, नाविक या वायुसैनिक के अलावा किसी अन्य व्यक्ति द्वारा इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 65 और 66 के तहत ‘मौखिक वसीयत’ की अनुमति नहीं देता है… इस अधिनियम की धारा 63 के तहत एक हिंदू केवल ‘अनप्रिविलेज्ड वसीयत’ ही बना सकता है, जिसका अर्थ है कि यह एक लिखित दस्तावेज होना चाहिए जिस पर मृतक के हस्ताक्षर और दो गवाहों के प्रमाण हों।”

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि HUF खाते से नाम हटाने का प्रभाव किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति के उत्तराधिकार पर नहीं पड़ता है।

2. नॉमिनेशन का कानूनी प्रभाव: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शक्ति यजदानी और अन्य बनाम जयानंद जयंत सालगांवकर और अन्य (2024) मामले के फैसले पर गहरा भरोसा जताया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“नॉमिनी के पक्ष में प्रतिभूतियों (securities) का निहित होना एक सीमित उद्देश्य के लिए है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि शेयरधारक की मृत्यु पर कानूनी औपचारिकताओं को लेकर कोई भ्रम न हो और कानूनी वारिसों द्वारा उचित कदम उठाए जाने तक संपत्ति को लंबे मुकदमेबाजी से बचाया जा सके।”

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हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि कंपनी एक्ट का उद्देश्य कॉर्पोरेट मामलों का प्रबंधन करना है, न कि उत्तराधिकार कानूनों पर हावी होने वाला कोई ‘वैधानिक वसीयतनामा’ तैयार करना।

फैसला

ऑर्डर XII रूल 6 CPC के तहत आवेदन को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने घोषित किया:

  1. वादी मृतक का क्लास-I कानूनी उत्तराधिकारी है।
  2. मृतक की मृत्यु ‘इंटेस्टेट’ (बिना वसीयत के) हुई थी।
  3. वादी संपत्ति में हिस्से का हकदार है, जिसमें OAML और OGL के शेयर भी शामिल हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हालांकि वादी की वारिस के रूप में स्थिति घोषित कर दी गई है, लेकिन हिस्से की सटीक मात्रा एक अन्य लंबित आवेदन (IA No. 12380/2025) के परिणाम पर निर्भर करेगी। कोर्ट ने इसके अनुसार प्रारंभिक डिक्री (preliminary decree) तैयार करने का निर्देश दिया।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: पंकज ओसवाल बनाम अरुणा ओसवाल और अन्य
  • केस नंबर: CS(OS) 53/2017 और I.A. 1737/2024
  • बेंच: जस्टिस विकास महाजन
  • तारीख: 27 मार्च, 2026

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