सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि एक ही अंतर्निहित लेनदेन (underlying transaction) के संबंध में जारी किए गए अलग-अलग चेक का अनादर नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत अलग-अलग “कॉज ऑफ एक्शन” (वाद का कारण) को जन्म देता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसे अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट्स से उत्पन्न होने वाली कई शिकायतों को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत यह मानकर रद्द नहीं किया जा सकता कि यह एक ही कर्ज के लिए समानांतर अभियोजन (parallel prosecution) है।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें हाईकोर्ट ने फर्म के चेक से संबंधित शिकायत को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि शिकायतकर्ता गारंटी के रूप में जारी किए गए व्यक्तिगत चेक के लिए पहले ही शिकायत दर्ज करा चुका था।
यह अपील सुमित बंसल (शिकायतकर्ता) और मैसर्स एमजीआई डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स व इसके प्रोप्राइटर मनोज गोयल (प्रतिवादी) के बीच एक विवाद से उत्पन्न हुई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने फर्म द्वारा जारी किए गए चेक के अनादर से संबंधित ‘कंप्लेंट केस नंबर 3298 ऑफ 2019’ को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट का मानना था कि चूंकि शिकायतकर्ता ने उसी देनदारी के लिए प्रोप्राइटर द्वारा जारी किए गए व्यक्तिगत चेक पहले ही बैंक में लगा दिए थे, इसलिए बाद में फर्म के चेक प्रस्तुत करना प्रक्रिया का दुरुपयोग था।
सुप्रीम कोर्ट ने शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए रद्द की गई शिकायत को ट्रायल के लिए बहाल कर दिया। साथ ही, कोर्ट ने अन्य तीन शिकायतों को रद्द करने से इनकार करने वाले हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ प्रतिवादियों द्वारा दायर क्रॉस-अपीलों को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
पक्षकारों ने गाजियाबाद में “एमजीआई मेंशन” प्रोजेक्ट में तीन कमर्शियल यूनिट्स के संबंध में 7 नवंबर, 2016 को एक एग्रीमेंट टू सेल (बिक्री समझौता) किया था। शिकायतकर्ता द्वारा 1,72,21,200 रुपये की तय बिक्री राशि का भुगतान किया गया था। समझौते में यह शर्त थी कि यदि 30 सितंबर, 2018 तक सेल डीड निष्पादित नहीं की जाती है, तो राशि 35,00,000 रुपये की ‘एप्रिसिएशन राशि’ (appreciation amount) के साथ वापस कर दी जाएगी।
27 जुलाई, 2018 को प्रतिवादी नंबर 2 (मनोज गोयल) ने सेल डीड निष्पादित न होने की स्थिति में राशि वापस करने के लिए एक व्यक्तिगत गारंटी दी। इसे सुरक्षित करने के लिए, उन्होंने फर्म के चेक के अनुरूप व्यक्तिगत चेक जारी किए।
सेल डीड निष्पादित करने में विफलता पर, प्रतिवादी ने निम्नलिखित चेक जारी किए:
- फर्म के चेक: चेक संख्या 057140 (1,72,21,200 रुपये) और 057141 (35,00,000 रुपये)।
- व्यक्तिगत चेक: चेक संख्या 114256 (1,72,21,200 रुपये) और 114257 (35,00,000 रुपये)।
शिकायतकर्ता ने 5 दिसंबर, 2018 को व्यक्तिगत चेक प्रस्तुत किए, जो “Exceeds Arrangement” (व्यवस्था से अधिक) रिमार्क के साथ अनादरित हो गए। इसके बाद, फर्म के चेक 15 दिसंबर, 2018 को प्रस्तुत किए गए और वे भी “Funds Insufficient” (अपर्याप्त धनराशि) के कारण बाउंस हो गए।
इसके परिणामस्वरूप दो अलग-अलग शिकायतें दर्ज की गईं:
- कंप्लेंट केस नंबर 2823 ऑफ 2019 (व्यक्तिगत चेक)।
- कंप्लेंट केस नंबर 3298 ऑफ 2019 (फर्म के चेक)।
बाद में, प्रतिवादियों द्वारा जारी किए गए नए चेक के अनादर के संबंध में तीन और शिकायतें दर्ज की गईं।
दिल्ली हाईकोर्ट का दृष्टिकोण
दिल्ली हाईकोर्ट ने 17 अप्रैल, 2025 के अपने फैसले में फर्म के चेक से संबंधित शिकायत (केस नंबर 3298/2019) को रद्द कर दिया था। हाईकोर्ट ने तर्क दिया कि व्यक्तिगत चेक फर्म के चेक के “बदले में” (in lieu of) जारी किए गए थे। कोर्ट का कहना था कि एक बार जब शिकायतकर्ता ने व्यक्तिगत चेक प्रस्तुत करने का विकल्प चुना, तो फर्म के चेक वापस कर दिए जाने चाहिए थे। हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोनों शिकायतों को जारी रखना “एक ही कॉज ऑफ एक्शन के लिए समानांतर अभियोजन” होगा।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अन्य शिकायतों (केस नंबर 2823/2019, 13508/2019 और 743/2020) को रद्द करने से इनकार कर दिया था, यह देखते हुए कि उनमें अलग तारीखें और नए कॉज ऑफ एक्शन शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष तर्क
शिकायतकर्ता की दलील: सुमित बंसल के वकील ने तर्क दिया कि प्रतिवादियों ने कभी भी चेक जारी करने, उनकी प्रस्तुति या अनादर पर विवाद नहीं किया, और न ही उन्होंने अंतर्निहित देनदारी से इनकार किया। यह कहा गया कि चेक का कोई भी सेट न तो रद्द किया गया और न ही वापस किया गया। इसलिए, एनआई एक्ट की धारा 139 के तहत देनदारी की उपधारणा (presumption of liability) बनी हुई है।
प्रतिवादियों की दलील: प्रतिवादियों के वरिष्ठ वकील ने तर्क दिया कि पांच शिकायतों में दावा की गई कुल राशि (5.19 करोड़ रुपये) मूल राशि (1.72 करोड़ रुपये) से अधिक है। उन्होंने तर्क दिया कि व्यक्तिगत चेक पर उपाय समाप्त करने के बाद फर्म के चेक पर शिकायत शुरू करने से शिकायतकर्ता को ‘एस्टोपेल’ (विबंध) द्वारा रोका गया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि कोई राशि देय नहीं थी क्योंकि भुगतान पहले ही वापस कर दिया गया था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने फर्म के चेक से संबंधित शिकायत को रद्द करने के हाईकोर्ट के तर्क को खारिज कर दिया।
1. अलग-अलग ‘कॉज ऑफ एक्शन’: कोर्ट ने कहा कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत, “चेक के प्रत्येक अनादर पर एक अलग कॉज ऑफ एक्शन उत्पन्न होता है, बशर्ते प्रस्तुति, अनादर, नोटिस और भुगतान करने में विफलता का वैधानिक क्रम पूरा हो।”
पीठ की ओर से फैसला लिखते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा:
“यह तथ्य कि एक ही लेनदेन से कई चेक उत्पन्न होते हैं, उन्हें एक ही ‘कॉज ऑफ एक्शन’ में विलय नहीं कर देगा। वर्तमान मामले में, दो शिकायतों का विषय बनने वाले चेक… अलग-अलग खातों पर आहरित (drawn) अलग-अलग इंस्ट्रूमेंट्स थे, जिन्हें अलग-अलग तारीखों पर प्रस्तुत किया गया, अलग-अलग अनादरित हुए और उनके लिए स्वतंत्र वैधानिक नोटिस दिए गए।”
2. विवादित तथ्यों का निर्णय धारा 482 CrPC के तहत नहीं हो सकता: कोर्ट ने कहा कि यह निर्धारित करना कि चेक “वैकल्पिक या पूरक इंस्ट्रूमेंट्स” के रूप में जारी किए गए थे या नहीं, यह ट्रायल (विचारण) का विषय है।
“इस तरह के प्रश्न कि क्या फर्म के चेक व्यक्तिगत चेक के प्रतिस्थापन (substitution) में जारी किए गए थे, क्या पार्टियों ने उन्हें वैकल्पिक प्रतिभूतियों के रूप में माना था, और क्या दोनों का उद्देश्य एक साथ प्रवर्तनीय (enforceable) होना था, ये सभी तथ्य के मिश्रित प्रश्न हैं। धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट के अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का उपयोग ऐसे विवादित मुद्दों को तय करने के लिए नहीं किया जा सकता है।”
3. ‘मिनी ट्रायल’ पर रोक: स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल और नीहारिका इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ महाराष्ट्र के फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि हाईकोर्ट को ट्रायल कोर्ट के कार्य को हथियाने से बचना चाहिए और प्रारंभिक स्तर पर ‘मिनी ट्रायल’ नहीं करना चाहिए।
4. धारा 139 NI Act के तहत उपधारणा: प्रतिवादियों के इस दावे के संबंध में कि कोई ऋण देय नहीं था, कोर्ट ने एम.एम.टी.सी. लिमिटेड बनाम मेडचल केमिकल्स का हवाला देते हुए नोट किया कि ऋण की अनुपस्थिति साबित करने का भार ट्रायल के दौरान आरोपी पर होता है।
“इस स्तर पर, केवल उनके द्वारा दायर याचिकाओं में दिए गए कथनों के आधार पर हाईकोर्ट यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता था कि कोई मौजूदा ऋण या देनदारी नहीं थी।”
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने कंप्लेंट केस नंबर 3298 ऑफ 2019 को रद्द करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।
- अपील स्वीकार: सुमित बंसल द्वारा दायर अपील को स्वीकार किया गया। हाईकोर्ट द्वारा शिकायत रद्द करने के आदेश को निरस्त कर दिया गया और शिकायत को ट्रायल के लिए बहाल कर दिया गया।
- अपील खारिज: अन्य शिकायतों को रद्द करने से इनकार करने के खिलाफ एमजीआई डेवलपर्स और मनोज गोयल द्वारा दायर अपीलों को खारिज कर दिया गया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पार्टियों की सभी दलीलें खुली रहेंगी, जिनका निर्णय ट्रायल कोर्ट द्वारा गुणों-दोषों (merits) के आधार पर किया जाएगा।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: सुमित बंसल बनाम मैसर्स एमजीआई डेवलपर्स एंड प्रमोटर्स व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 141 ऑफ 2026 (अराइजिंग आउट ऑफ एस.एल.पी. (क्रिमिनल) नंबर 10770 ऑफ 2025)
- कोरम: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा

